Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 19 अगस्त का दिन समाजवादी पार्टी के लिए असहज करने वाला रहा. एक ही दिन दो अलग-अलग हत्याकांडों में सपा से जुड़े पूर्व नेताओं को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई. रायबरेली के आदित्य प्रताप सिंह हत्याकांड में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी आरपी यादव समेत 14 दोषियों को उम्रकैद हुई. वहीं औरैया के चर्चित पंचमुखी मंदिर दोहरे हत्याकांड में पूर्व सपा एमएलसी कमलेश पाठक समेत 10 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
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दोनों मामले अलग हैं. दोनों की परिस्थितियां अलग हैं. लेकिन दोनों फैसलों के बीच एक समानता ऐसी है, जिसे समाजवादी पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती- अदालत के फैसलों में सपा से जुड़े ऐसे राजनीतिक चेहरों के नाम सामने आए हैं, जिनकी राजनीतिक पहचान के साथ गंभीर आपराधिक मामले भी जुड़े रहे. यही वजह है कि एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर सपा के नेता और कार्यकर्ता कानून को लेकर इतने बेपरवाह क्यों दिखाई देते हैं? पार्टी के भीतर ऐसे लोगों को राजनीतिक ताकत और संगठन में जगह कैसे मिलती रही?
रायबरेली से औरैया तक, फिर सामने आया वही चेहरा
रायबरेली के आदित्य प्रताप सिंह हत्याकांड में अदालत ने सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष आरपी यादव समेत 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई. यह मामला 2019 में रतापुर चौराहे स्थित सोमू ढाबे पर हुए विवाद के बाद आदित्य सिंह की हत्या से जुड़ा था. लेकिन अदालत के फैसले के बाद भी एक ऐसा दृश्य सामने आया जो सपा के कल्चर पर सवाल खड़ा करती है. कोर्ट ने आरपी यादव को सजा दी. लेकिन इसके बावजूद सपा के कार्यकर्ताओं ने आरपी यादव के पक्ष में नारेबाजी की. जेल के बाहर सपाइयों की भीड़ इकट्ठा हुई और अदालत के फैसले पर भी सवाल खड़े किए.
उधर औरैया में 15 मार्च 2020 को पंचमुखी हनुमान मंदिर परिसर में अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी चचेरी बहन सुधा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. करीब छह साल चली सुनवाई के बाद विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने पूर्व सपा एमएलसी कमलेश पाठक समेत 10 दोषियों को उम्रकैद और 50-50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.
कमलेश पाठक का मामला इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि इससे पहले गैंगस्टर एक्ट के मामले में भी उन्हें छह साल की सजा सुनाई जा चुकी है. यानी अदालत में आपराधिक मामलों को लेकर कार्रवाई का यह पहला अध्याय नहीं है.
सवाल यही है- राजनीतिक ताकत मिलती कहां से है?
जब बार-बार गंभीर आपराधिक मामलों में किसी दल से जुड़े प्रभावशाली नेताओं के नाम सामने आते हैं, तो सवाल सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. सवाल संगठन तक पहुंचता है.
आरपी यादव कभी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष रहे और विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी भी रहे. कमलेश पाठक सपा के एमएलसी रहे और पार्टी की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहे. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि राजनीति में ऐसे लोगों को प्रभावशाली जगह आखिर किस आधार पर मिलती है?
क्योंकि आम कार्यकर्ता के लिए पार्टी का झंडा उसकी पहचान होता है, लेकिन प्रभावशाली नेता के लिए वही झंडा राजनीतिक ताकत भी बन जाता है. जब यही ताकत अपराध के आरोपों से घिरती है और फिर अदालत से दोष सिद्ध होने तक पहुंचती है, तो पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
‘बेअंदाज’ होने की धारणा बार-बार क्यों बनती है?
सपा के सामने असली संकट सिर्फ यह नहीं है कि उसके कुछ नेताओं के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले रहे हैं. उससे बड़ा संकट यह है कि ऐसे मामलों के बावजूद पार्टी से जुड़े नेताओं की राजनीतिक हैसियत लंबे समय तक बनी रही. यही वजह है कि सपा के कुछ नेताओं को लेकर यह धारणा बार-बार बनती है कि वे राजनीतिक प्रभाव के कारण बेअंदाज हैं.
औरैया के मामले में कमलेश पाठक और उनके साथियों पर पहले गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हुई, फिर अब दोहरे हत्याकांड में उम्रकैद की सजा हुई. रायबरेली में भी सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और प्रत्याशी को हत्या के मामले में उम्रकैद मिली है. (
ऐसे मामलों के सामने आने के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि अदालत ने क्या फैसला दिया. सवाल यह भी होना चाहिए कि जब ये लोग राजनीतिक रूप से ताकतवर थे, तब पार्टी के स्तर पर इनके आचरण और आपराधिक छवि को लेकर क्या कार्रवाई हुई?
2027 से पहले सपा के लिए यह सवाल और बड़ा है
उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है. सपा खुद को बीजेपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती के तौर पर पेश कर रही है. ऐसे में उसे सिर्फ सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने से काम नहीं चलेगा. उसे अपने संगठन को लेकर भी जनता के सामने साफ तस्वीर रखनी होगी.
क्योंकि चुनाव के दौरान जनता सिर्फ यह नहीं देखती कि विपक्ष सरकार के बारे में क्या कह रहा है. वह यह भी देखती है कि विपक्ष सत्ता में आने की स्थिति में किन लोगों के साथ खड़ा है.
रायबरेली और औरैया के फैसले इसलिए महत्वपूर्ण हैं. एक ही दिन सपा से जुड़े दो पूर्व राजनीतिक चेहरों को हत्या के मामलों में उम्रकैद की सजा मिली है. इसे सिर्फ दो अदालती फैसलों तक सीमित करके आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन राजनीति में ऐसे फैसले पार्टी की छवि पर सवाल छोड़ जाते हैं. और यही सवाल अब अखिलेश यादव के सामने है- क्या समाजवादी पार्टी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए ऐसी स्पष्ट राजनीतिक सीमा तय करेगी, जिसके पार अपराध, दबंगई और बाहुबल के लिए कोई जगह न हो?
क्योंकि अगर हर बार किसी सपा नेता पर गंभीर आपराधिक मामला सामने आने के बाद बात सिर्फ अदालत के फैसले तक सीमित रह जाए, तो सवाल उठते रहेंगे. और जब एक के बाद एक फैसलों में पार्टी से जुड़े प्रभावशाली नेताओं को गंभीर अपराधों में सजा मिलती रहे, तो यह सवाल और तेज होगा कि आखिर सपा के कुछ नेताओं को राजनीतिक ताकत मिलने के पीछे सिर्फ संगठन था या वह पुरानी ‘दबंग’ राजनीति भी, जिससे पार्टी अब तक पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा पाई है?
(लेखक रामबाबू तिवारी प्रयागराज के गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोधार्थी हैं. राजनीतिक और समसमायिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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