Opinion: सियासत में शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते. कई बार एक बयान नेता की राजनीतिक सोच और अपने सहयोगियों को लेकर उसके नजरिए की झलक दे देता है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का जयंत चौधरी पर यह कहना कि “हमने जिस चवन्नी को रुपया बनाया, वही हमें छोड़कर चले गए” इसी वजह से चर्चा में है. सवाल सिर्फ जयंत का नहीं, बल्कि यह है कि क्या अखिलेश अपने सहयोगियों को बराबरी का साझेदार मानते हैं या अपनी राजनीति का सहारा?
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सहयोगी आते हैं, फिर दूर क्यों हो जाते हैं?
ओपी राजभर 2022 में अखिलेश के साथ चुनाव लड़े, लेकिन बाद में अलग होकर भाजपा के साथ चले गए. आज राजभर सपा और अखिलेश पर सबसे ज्यादा हमलावर नेताओं में हैं. जयंत चौधरी भी 2022 में सपा के साथ थे, लेकिन 2024 से पहले एनडीए में चले गए. स्वामी प्रसाद मौर्य और निषाद पार्टी भी सपा से अलग हो चुके हैं. गठबंधन टूटना राजनीति में सामान्य है, लेकिन जब एक के बाद एक सहयोगी दूर होते जाएं तो सवाल सिर्फ सहयोगियों से नहीं, नेतृत्व से भी पूछा जाता है- क्या हर बार गलती दूसरी तरफ ही थी?
जयंत को ‘चवन्नी’ कहना क्या अखिलेश की सियासी भूल है?
जयंत का मामला इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि चौधरी परिवार और मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक रिश्ते दशकों पुराने हैं. मुलायम सिंह 1974 में चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल के टिकट पर विधायक बने थे. 2003 में अजित सिंह के नेतृत्व वाले आरएलडी के 14 विधायकों ने मुलायम सिंह की सरकार का समर्थन किया था. यानी चौधरी परिवार और मुलायम की राजनीति के बीच सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि पुराना राजनीतिक रिश्ता रहा है.
अखिलेश और जयंत ने 2022 का विधानसभा चुनाव साथ लड़ा. आरएलडी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा और आठ सीटें जीतीं, जबकि सपा ने 111 सीटों पर जीत दर्ज की. लेकिन दो साल के भीतर दोनों के रास्ते अलग हो गए. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यादव परिवार की राजनीति को मजबूत करने और विस्तार देने में चौधरी परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
सिर्फ सहयोगी नहीं, अपने भी दूर हुए
अखिलेश की चुनौती सिर्फ गठबंधन दलों तक सीमित नहीं है. अपनों के साथ भी उनके रिश्ते कई बार तनावपूर्ण रहे हैं. शिवपाल यादव के साथ लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान चली, आजम खान की नाराजगी भी सामने आती रही और कई सपा विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं. पल्लवी पटेल भी समय-समय पर सपा नेतृत्व के खिलाफ मुखर रही हैं. जिस सपा की राजनीति मुलायम सिंह के दौर में अलग-अलग नेताओं और सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने के लिए जानी जाती थी, उसके सामने अब सवाल है कि क्या अखिलेश उस व्यापक राजनीतिक छतरी को कायम रख पाए हैं?
अब मुस्लिम वोट पर भी सवाल
सपा का सबसे मजबूत पारंपरिक आधार मुस्लिम मतदाता रहा है. लेकिन अब इसी रिश्ते में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं. सोशल मीडिया पर कई वीडियो और बयान सामने आए हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि सपा उन्हें मुख्य रूप से वोट बैंक की तरह देखती है और पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं देती.
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी लंबे समय से सपा पर मुस्लिमों के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाते रहे हैं. वह मुस्लिमों को ‘दरी बिछाने’ तक सीमित किए जाने जैसी तीखी टिप्पणी कर चुके हैं.
कांग्रेस से भी सपा की तनातनी
2024 में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं. सपा-कांग्रेस गठबंधन सफल रहा, लेकिन इसके बाद दोनों दलों के बीच सीटों और रणनीति को लेकर मतभेद भी सामने आए. 2027 के चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच जुबानी जंग भी जारी है. यानी कांग्रेस के साथ भी सपा के रिश्ते पूरी तरह सहज नहीं हैं.
गठबंधन सिर्फ सीटों का जोड़ नहीं, बल्कि भरोसे का रिश्ता होता है. सहयोगी को सम्मान और हिस्सेदारी चाहिए. अगर उसे जरूरत के वक्त साथी और जरूरत खत्म होने पर ‘चवन्नी’ समझा जाएगा, तो वह लंबे समय तक साथ क्यों रहेगा?
अब सवाल अखिलेश की सियासत से है
जयंत पर अखिलेश का बयान भले ही एक राजनीतिक हमला हो, लेकिन उसने कई पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं- सहयोगी क्यों छूटते गए, अपने नेता क्यों नाराज हुए और अब पारंपरिक मुस्लिम समर्थकों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
2027 में भाजपा से मुकाबला तो होगा ही, लेकिन अखिलेश की अपनी नेतृत्व शैली की भी परीक्षा होगी. क्योंकि सबसे बड़ा खतरा विरोधी का मजबूत होना नहीं, बल्कि तब होता है जब सहयोगी भरोसा खो दें, अपने दूर होने लगें और समर्थक पूछने लगें- हम आपके लिए सिर्फ वोट हैं या बराबर के हिस्सेदार भी?
(लेखक, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा में हिंदी विभाग के सहायक आचार्य हैं और राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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