राजनीति में प्रतीकों की बड़ी अहमियत होती है. समाजवादी पार्टी के लिए फैजाबाद लोकसभा सीट की जीत भी ऐसा ही एक राजनीतिक प्रतीक रही है. यही वजह है कि 2024 के चुनाव के बाद से सपा ने फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद को सिर्फ एक सांसद की तरह नहीं, बल्कि भाजपा के सबसे बड़े राजनीतिक नैरेटिव के जवाब के तौर पर पेश किया. संसद में कई बार अवधेश प्रसाद अखिलेश यादव की बगल वाली सीट पर बैठे दिखाई दिए. यहां तक कि सपा प्रमुख ने अवधेश प्रसाद को कई मंचों से 'अयोध्या का राजा' तक कहा.
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लेकिन राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती अपनी बनाई हुई प्रतीकात्मक राजनीति को संभालकर रखना भी होती है. दरअसल, राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर सपा संसद परिसर में विरोध जता रही है. लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के दौरान अखिलेश यादव के 'अयोध्या के राजा' अवधेश प्रसाद का एक वीडियो सामने आया है, जिसे लेकर नई बहस छिड़ गई है. वीडियो में 80 साल के अवधेश प्रसाद सिर पर दानपेटी लेकर घूमते नजर आ रहे हैं. इसे दलित समाज के नेता के अपमान से जोड़कर देखा जा रहा है. अवधेश प्रसाद की इस तस्वीर ने समाजवादी पार्टी के लिए असहज सवाल खड़े कर दिए हैं.
वीडियो में क्या है?
वीडियो में 80 वर्षीय सपा सांसद अवधेश प्रसाद सिर पर दानपेटी रखे दिखाई दे रहे हैं. उनके साथ दूसरे नेता दानपेटी में पैसे डालने का अभिनय कर रहे हैं, जिनमें राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी नजर आ रहे हैं. वीडियो में वह मुस्कुराते हुए भी दिखाई दे रहे हैं. इन सब बातों से विरोध प्रदर्शन की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
सवाल उठ रहे हैं कि अगर प्रदर्शन इसी तरह करना था, तो उम्रदराज अवधेश प्रसाद ही क्यों? क्या यह भूमिका किसी और नेता को नहीं दी जानी चाहिए थी? क्या समाजवादी पार्टी के बाकी बड़े चेहरे इस प्रतीकात्मक विरोध का हिस्सा नहीं बन सकते थे? या फिर सबसे आगे उसी नेता को खड़ा किया गया, जिसे कुछ महीने पहले तक 'अयोध्या का राजा' बताया जा रहा था? सवाल यह भी उठ रहे हैं कि एक तरफ सपा प्रमुख अवधेश प्रसाद को 'अयोध्या का राजा' कहते हैं, तो दूसरी तरफ उसी 'राजा' के सिर पर दानपेटी रखकर उन्हें मजाक का पात्र बनाते हैं?
अवधेश प्रसाद सिर्फ सांसद ही नहीं, दलित समाज के नेता भी
सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि राजनीति में सम्मान भी एक प्रतीक होता है. अवधेश प्रसाद सिर्फ सपा के सांसद नहीं हैं. वह सपा में दलित पासी समाज के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं. उनकी उम्र करीब 80 वर्ष है. ऐसे नेता को सिर पर दानपेटी रखकर विरोध का चेहरा बनाना क्या राजनीतिक रूप से उचित संदेश देता है?
संभव है कि समाजवादी पार्टी के समर्थक इसे एक सामान्य प्रतीकात्मक प्रदर्शन मानें. लेकिन राजनीति सिर्फ समर्थकों की नजर से नहीं चलती. जनता तस्वीर भी देखती है और उसका संदेश भी पढ़ती है. यही वजह है कि इस तस्वीर की चर्चा हो रही है, जिसमें अवधेश प्रसाद दानपेटी सिर पर उठाए दिखाई दे रहे हैं.
विडंबना यह भी है कि जिस नेता को सपा ने भाजपा को अयोध्या में हराने का सबसे बड़ा चेहरा बनाकर पेश किया, वही नेता अब विरोध प्रदर्शन की शैली को लेकर चर्चा के केंद्र में है. मतलब विरोध तो भाजपा के खिलाफ था, लेकिन बहस समाजवादी पार्टी के तरीकों पर शुरू हो गई है.
सपा की गंभीरता पर सवाल
दरअसल, अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोप कितने गंभीर हैं. सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी ने अपने सबसे अहम दलित चेहरे के साथ ऐसा प्रदर्शन कर अनजाने में अपनी ही बनाई हुई राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया है?
लेखक भावेश पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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