Opinion: अखिलेश के नए ‘पंडित प्रेम’ की राह मुश्किल? मायावती ने फिर चला 2007 वाला ये दांव

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21 Aug 2026 (अपडेटेड: 21 Aug 2026, 11:51 AM)

मायावती ने सतीश चंद्र मिश्रा को चुनाव आयो, कानूनी और मीडिया से जुड़े मामलों की अहम जिम्मेदारी देकर BSP की 2027 की अहम तैयारियों के संकेत दिए हैं. इसे बसपा की पुरानी दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग को फिर धार देने की कोशिश माना जा रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव की ब्राह्मणों को साधने की रणनीति के सामने बसपा की सक्रियता सपा के लिए नई चुनौती बन सकती है.

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Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से पुरानी तस्वीर उभरती दिख रही है. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने सतीश चंद्र मिश्रा को अपनी चुनावी टीम का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना दिया है. उन्हें चुनाव आयोग से जुड़े मामलों के साथ कानूनी और मीडिया की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसे केवल संगठन के भीतर जिम्मेदारियों का बंटवारा मानना भूल होगी. दरअसल, इसके राजनीतिक मायने कहीं बड़े हैं. संकेत साफ है कि बसपा 2027 की लड़ाई में अपनी उसी सोशल इंजीनियरिंग को नए सिरे से धार देना चाहती है, जिसने 2007 में उसे पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुंचाया था. मायावती के इस दांव का असर अगर किसी दल की रणनीति पर सबसे ज्यादा भारी पड़ सकता है तो वह समाजवादी पार्टी है. खास तौर पर इसलिए, क्योंकि अखिलेश यादव भी इन दिनों ब्राह्मणों को साधने में जुटे हैं.

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अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. उनके राजनीतिक शब्दकोश में भी बदलाव दिखाई दे रहा है. पहले पीडीए में ‘पी’ का मतलब पिछड़ा प्रमुखता से बताया गया. फिर इसकी परिधि बढ़ती गई और अब उसमें ‘पंडित’ को भी जगह दी जाने लगी है. सवाल यही है कि यह बदलाव अचानक क्यों आया? क्या यह सामाजिक भागीदारी को लेकर कोई पुरानी और सोची-समझी राजनीतिक प्रतिबद्धता है या फिर 2027 से पहले बदलते जातीय समीकरणों का दबाव? क्योंकि जैसे-जैसे बसपा की तरफ से ब्राह्मण चेहरों को आगे करने के संकेत मिले, वैसे-वैसे सपा की राजनीति में भी ब्राह्मणों को लेकर सक्रियता बढ़ती दिखाई देने लगी. ऐसे में अखिलेश का नया ब्राह्मण प्रेम सहज कम और चुनावी अवसरवाद ज्यादा नजर आता है.

यहीं मायावती और अखिलेश यादव की राजनीति में एक बड़ा फर्क भी सामने आता है. मायावती के पास ब्राह्मणों को लेकर केवल भाषण या नया चुनावी नारा भर नहीं है. उनके पास 2007 का एक राजनीतिक रिकॉर्ड भी है. उस चुनाव में मायावती ने 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा था. बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया. सरकार बनी तो मंत्रिमंडल और सत्ता के दूसरे हिस्सों में भी ब्राह्मण चेहरों को जगह मिली. सतीश चंद्र मिश्रा पार्टी की रणनीति और सत्ता, दोनों के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हुए. उस दौर में बसपा ने दलित और ब्राह्मण के बीच एक ऐसा राजनीतिक गठजोड़ खड़ा किया, जिसकी कल्पना उससे पहले आसान नहीं मानी जाती थी.

'हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं' और 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी आगे जाएगा' जैसे नारे उसी दौर की राजनीति से निकले थे. इन नारों की चर्चा आज भी इसलिए होती है, क्योंकि इनके पीछे चुनावी नतीजा था. बसपा ने 2007 में 206 विधानसभा सीटें जीतकर अपने दम पर सरकार बनाई थी. इस जीत में दलित वोट बैंक की मजबूती के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक वर्गों को जोड़ने की रणनीति की भी बड़ी भूमिका मानी गई. यानी मायावती जब आज फिर ब्राह्मण भागीदारी का संकेत देती हैं तो उनके पास अतीत का एक उदाहरण मौजूद रहता है.

समाजवादी पार्टी के सामने स्थिति अलग है. मुलायम सिंह यादव के दौर से ही पार्टी की सबसे मजबूत राजनीतिक पहचान यादव-मुस्लिम समीकरण के इर्द-गिर्द रही. पार्टी में दूसरे वर्गों के नेताओं को जगह जरूर मिली, ब्राह्मण नेता भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन सपा अपनी इस मूल राजनीतिक पहचान से पूरी तरह बाहर कभी नहीं निकल पाई. उसके शासनकाल में कानून-व्यवस्था, दबंगई और सत्ता में एक खास वर्ग के प्रभाव को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा. अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी पार्टी की छवि नहीं बदली. संगठन और सत्ता के केंद्र में परिवार तथा परंपरागत सामाजिक समीकरणों के प्रभाव का आरोप उनका पीछा करता रहा.

यही वजह है कि आज जब अखिलेश अचानक ‘पंडित’ को अपने राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता से जगह देते हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है. ब्राह्मण समाज यह जरूर देखेगा कि यह भागीदारी स्थायी सोच का हिस्सा है या केवल चुनाव से पहले की रणनीति. क्योंकि राजनीति में किसी समाज का नाम लेना और उसे वास्तविक हिस्सेदारी देना दो अलग बातें हैं. मंच से सम्मान की बात करना आसान है. टिकट वितरण, संगठन, निर्णय लेने वाली टीम और सत्ता में भागीदारी के समय उस सम्मान को निभाना कठिन होता है. 2027 की लड़ाई करीब आने के साथ अखिलेश को इसी कसौटी पर परखा जाएगा.

मायावती का हालिया फैसला इसी लिहाज से महत्वपूर्ण है. सतीश चंद्र मिश्रा को चुनाव मैनेजमेंट की बड़ी जिम्मेदारी देकर उन्होंने एक साथ कई संदेश दिए हैं. पहला संदेश पार्टी के भीतर है कि पुराने और अनुभवी चेहरों की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है. दूसरा संदेश ब्राह्मण समाज के लिए है कि बसपा में उसके सबसे चर्चित चेहरे को फिर महत्वपूर्ण भूमिका मिल रही है. तीसरा और सबसे राजनीतिक संदेश विरोधियों के लिए है कि मायावती 2027 से पहले अपने पुराने सफल सामाजिक समीकरण की संभावनाओं को फिर टटोल रही हैं.

यहीं अखिलेश यादव की मुश्किल बढ़ती है. उन्हें अब केवल भाजपा से ब्राह्मण वोट के लिए मुकाबला नहीं करना होगा. अगर बसपा अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को गंभीरता से जमीन पर उतारती है तो सपा को तीसरे मजबूत दावेदार से भी जूझना पड़ेगा. खासकर उन सीटों पर जहां ब्राह्मण मतदाता निर्णायक या प्रभावशाली संख्या में हैं. मायावती अगर टिकट वितरण में भी 2007 जैसी रणनीति की झलक दिखाती हैं तो अखिलेश के लिए केवल सम्मेलन, बयान और पीडीए की नई व्याख्या के सहारे ब्राह्मण मतदाता को अपने पाले में खींचना आसान नहीं होगा.

(लेखक रामबाबू तिवारी प्रयागराज के गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोधार्थी हैं. राजनीतिक और समसमायिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)