Opinion: हम जब भी सनातन आस्था और मर्यादा की बात करते हैं, बरबस ही अयोध्या का नाम आ जाता है. ऐसा इसलिए कि अयोध्या वह भूमि है जिसे सदियों से मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जन्मस्थली के रूप में पूजा जाता रहा है और जो आज भी करोड़ों सनातनियों के लिए आस्था का सबसे संवेदनशील केंद्र है. राम मंदिर के निर्माण के बाद से अयोध्या पूरे हिंदू समाज के आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुकी है. इसीलिए रामनगरी में विशेष और अनुशासित आचरण की अपेक्षा की जाती है. लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने हनुमानगढ़ी मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद कांवड़ मार्ग पर ही मछली-भात भोज में शामिल होकर ऐसा आचरण किया जो सनातनियों को विचलित कर देने वाला है. सार्वजनिक जीवन जीने वाला कोई व्यक्ति अगर इस तरह का कोई कृत्य करता है तो इसे अनायास नहीं माना जा सकता. मंदिर में दर्शन करने के बाद यदि कोई मछली-भात में शामिल होता है तो यह सायास है और इसके पीछे कोई न कोई तो मंशा होगी ही.
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अपराध है जान-बूझकर किया गया पाखंड
अजय राय के समर्थन में यह तर्क दिया जा सकता है कि मछली खाना कोई पाप नहीं बल्कि भारत के कई हिस्सों की सांस्कृतिक परंपरा में शामिल है. बंगाल हो, पूर्वोत्तर हो या तटीय भारत, मछली वहां की भोजन का थाली का अभिन्न हिस्सा है.लेकिन यहां सवाल मछली खाने का नहीं है. सवाल यह है कि क्या मंदिर में ‘राम-राम’ जपने के बाद धार्मिक नगरी अयोध्या में और वह भी कांवड़ यात्रियों के मार्ग पर मांसाहार परोसना उचित है? हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जो भोजन अशुद्ध, अनुचित समय और अनुचित परिस्थिति में ग्रहण किया जाए, वह तामसिक प्रवृत्ति का सूचक है. जो व्यक्ति एक राजनीतिक दल का है, प्रदेश अध्यक्ष जैसे पद पर बैठा है, वह मंदिर जाता है, दर्शन-पूजन करता है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह देश-काल और धर्मग्रंथों का सम्मान करेगा.
यह समझना जरूरी है कि भारतीय समाज में खान-पान पर कोई सार्वभौमिक प्रतिबंध कभी नहीं रहा. समस्या मांसाहार में नहीं, बल्कि ‘अवसर के चयन’ में है. कोई व्यक्ति अपने घर में जो चाहे खाए, यह उसका अधिकार है. परंतु कोई व्यक्ति जब धार्मिक यात्रा मार्ग पर, धार्मिक अवसर पर ऐसा आयोजन करता है तो वह निजी क्षेत्र से निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र में आता है जहां उसके विवेक पर सवाल उठेगा. यह भी पूछा जाएगा कि निषाद मतों के विभाजन के लिए क्या इतना नीचे गिरा जा सकता है.
विपक्ष का पैटर्न है श्रद्धा के केंद्रों को निशाना बनाना
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के इस कृत्य के संदर्भ में कई और घटनाएं भी प्रासंगिक हो उठी हैं. कुछ महीने पहले वाराणसी में मोक्षदायिनी गंगा की लहरों पर नाव में इफ्तार पार्टी आयोजित की गई.आरोप लगा कि नॉनवेज बिरयानी खाई गई और उसके अवशेष सीधे गंगा में फेंके गए. पुलिस को इस मामले में 14 लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा. इसके कुछ ही हफ्तों बाद सरयू में नाव पर डीजे की धुन पर बीयर पार्टी का वीडियो वायरल हुआ. इन दोनों ही घटनाओं में धार्मिक अस्मिता का वैसा ही प्रश्न खड़ा होता है जैसा कि अयोध्या में मछली-भात भोज को लेकर खड़ा हुआ है. यह तीनों घटनाएं अलग-अलग व्यक्तियों और संगठनों से जुड़ी हो सकती हैं. लेकिन इनका सामूहिक प्रभाव एक जैसा है. सनातन प्रतीकों की मर्यादा को बार-बार परखा जाना. यह उस विचारधारा का विस्तार लगता है जो सनातन प्रतीकों का अपमान कर प्रतिक्रिया पाना चाहती है. यह वोट बैंक के लिए आस्था को कुचलने की साजिश है.
जायज है संत समाज का गुस्सा
इस तरह के मामलों को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का रुख किसी से छिपा नहीं है. इसीलिए उनकी तीखी प्रतिक्रिया आनी स्वाभाविक थी. यदि सीएम कहते हैं कि ऐसे लोगों के सामने गिरगिट भी शरमा जाए तो यह सिर्फ अलंकारिक तीखापन भर नहीं है. यह उस आम श्रद्धालु की भावना की अभिव्यक्ति है जो यह देखता है कि जिस नेता ने अभी-अभी बजरंग बली के सामने दंडवत किया, कुछ घंटों बाद मछली की दावत उड़ा रहा है तो उसके दिल पर चोट पहुंचती है. यह दोहरा आचरण है और दोहरे आचरण की सबसे बड़ी कीमत यह होती है कि वह आस्था को तमाशा बना देता है. संत समाज का गुस्सा भी जायज है. महामंडलेश्वर विष्णु दास, महंत सीताराम दास और सनातन रक्षक संघ जैसे संगठनों के प्रतिनिधि कोई राजनीतिक प्रवक्ता नहीं हैं. वे उस मर्यादा के रखवाले हैं जिसे हर आस्थावान भारतीय अपने भीतर संजोए रखता है. जब वे कहते हैं कि कांग्रेस और अजय राय को अपने कृत्य के लिए माफी मांगनी चाहिए तो वह किसी दल के विरुद्ध नहीं बल्कि उस मर्यादा के पक्ष में होती है जो राम की पहचान है.
जानबूझकर ऐसा किया तो मामला और गंभीर
जिस देश में करोड़ों लोग सावन के महीने में स्वेच्छा से मांसाहार त्याग देते हैं,जिस देश में कांवड़िए हफ्तों नंगे पांव चलकर गंगाजल लाते हैं और रास्ते में मिलने वाली हर छोटी-बड़ी असुविधा को श्रद्धा से स्वीकार करते हैं. वहां एक राजनीतिक दल के प्रदेश अध्यक्ष का आचरण यदि वाकई किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जैसा कि आरोप लग रहे हैं तो यह और भी गंभीर है. इसका अर्थ है कि सनातन प्रतीकों से खिलवाड़ कर जानबूझकर उकसाने का एक ढांचा तैयार किया जा रहा है. एक ऐसा ढांचा जो हर कुछ महीनों में किसी नई नदी, नए नगर या नए अवसर पर दोहराया जाता है. अगर यह लापरवाही है तो भी यह उतना ही चिंताजनक है. क्योंकि यह दिखाता है कि विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व में अयोध्या जैसी भूमि की संवेदनशीलता को लेकर बुनियादी समझ की कमी है. सार्वजनिक जीवन में पद जितना बड़ा होता है,दायित्व और सजगता की अपेक्षा भी उतनी ही बड़ी होती है.
लेखकः डॉ. विक्रमादित्य, पीतांबरा पीठाधीश एवं अध्यक्ष, विवेकानंद प्रतिष्ठान
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