Opinion: डॉ. राम मनोहर लोहिया का समाजवाद किसी एक परिवार, जाति या वंश की सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए था. लोहिया ने राजनीति में परिवारवाद को हमेशा लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन माना. उनका स्पष्ट मानना था कि वंशवाद असल में आधुनिक राजनीति का छिपा हुआ सामंतवाद है, जो आने वाले समय में लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देता है. लोहिया ने अपने दौर में कांग्रेस और नेहरू परिवार की राजनीतिक विरासत पर तीखे प्रहार किए थे, क्योंकि वे मानते थे कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में व्यक्ति की पहचान उसके जन्म या कुल से नहीं, बल्कि उसके विचारों, संघर्ष और जनता के प्रति समर्पण से तय होनी चाहिए.
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समय के साथ समाजवादी आंदोलन की धारा पूरी तरह बदल चुकी है. आज के राजनीतिक परिदृश्य में जब लोहिया के नाम पर राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि परिवारवाद के अपने फायदे होते हैं और परिवार के भीतर सत्ता के केंद्र होने से पार्टी टूटने से बचती है, तो यह सीधा टकराव लोहिया के बुनियादी दर्शन से दिखता है. लोहिया जिस व्यवस्था को लोकतंत्र के लिए विषैला मानते थे, आज उसी व्यवस्था को अखिलेश यादव द्वारा संगठन की स्थिरता और मजबूती की ढाल बनाकर पेश किया जा रहा है. यह केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी सोच का पतन है जिसके दम पर समाजवाद की नींव रखी गई थी.
आज समाजवादी पार्टी के स्वरूप को देखें तो वहां परिवार का प्रभाव पूरी तरह हावी नजर आता है. पार्टी के शीर्ष पद से लेकर संसद और प्रमुख राजनीतिक मंचों तक परिवार के सदस्यों की मजबूत मौजूदगी है. अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव, आदित्य यादव, अक्षय यादव और धर्मेंद्र यादव जैसे परिवार के चेहरे ही संगठन की अग्रिम पंक्ति में हैं. पार्टी के सभी अहम रणनीतिक, संगठनात्मक और नीतिगत फैसले एक ही चौखट के भीतर सिमट कर रह गए हैं. इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान उन जमीनी कार्यकर्ताओं को हुआ है जिन्होंने दशकों तक पसीना बहाया, लेकिन उनके लिए शीर्ष नेतृत्व के दरवाजे हमेशा के लिए बंद नजर आते हैं.
वह दौर अब पीछे छूट चुका है जब पार्टी में वैचारिक मंथन, असहमतियों का सम्मान और नीतिगत बहसें हुआ करती थीं. कभी लोहिया और चरण सिंह की वैचारिक परंपरा से निकले संघर्षशील नेता पार्टी की रीढ़ हुआ करते थे, जो जातिगत समीकरणों और पारिवारिक दायरों से ऊपर उठकर जनहित की राजनीति करते थे. आज वे समर्पित नेता धीरे-धीरे मुख्यधारा से गायब हो चुके हैं. कई नेताओं ने राजनीतिक हाशिये पर जाना स्वीकार कर लिया, कुछ ने खामोशी अख्तियार कर ली, तो कुछ ने सत्ता और पद के लिए परिवार की सत्ता के आगे पूरी तरह समर्पण कर दिया. आज पार्टी के भीतर वैचारिक स्वतंत्रता की जगह सिर्फ परिवार के प्रति निष्ठा ही सबसे बड़ी योग्यता बन गई है.
लोहिया ने सामाजिक न्याय का खाका खींचते हुए नारा दिया था कि 'पिछड़ा पावे सौ में साठ'. उनका उद्देश्य समाज के उपेक्षित वर्गों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को सत्ता की वास्तविक भागीदारी दिलाना था. लेकिन आज की हकीकत यह है कि यह नारा केवल चुनावी मंचों पर भीड़ जुटाने का साधन बनकर रह गया है. व्यवहार में यह व्यवस्था 'परिवार पावे सौ में सौ' की तर्ज पर काम कर रही है, जहां सत्ता, टिकट और अधिकार के सबसे मलाईदार हिस्से परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं. बाकी वर्गों के कार्यकर्ता सिर्फ झंडा उठाने और रैलियों में भीड़ बढ़ाने वाले साधन बनकर रह गए हैं.
यह एक बड़ा राजनीतिक विरोधाभास है कि पार्टी आज भी अपने नाम में समाजवाद जोड़ती है और मंचों से लोहिया के सिद्धांतों की दुहाई देती है, लेकिन उसकी कार्यशैली पूरी तरह पारिवारिक हितों की रक्षा तक सीमित हो चुकी है. पार्टी के होर्डिंग्स, पोस्टर्स और प्रचार अभियानों में विचारधारा की जगह परिवार के चेहरों को ही प्राथमिकता दी जाती है. रैलियों में भी समाजवादी सिद्धांतों की चर्चा कम और परिवार की मजबूती का बखान ज्यादा होता है. विचार जब पीछे छूट जाते हैं और व्यक्तियों का महिमामंडन आगे आ जाता है, तो कोई भी वैचारिक आंदोलन एक निजी प्रतिष्ठान में तब्दील होने लगता है.
आज पार्टी की कार्यप्रणाली किसी निजी कंपनी जैसी नजर आती है, जहां सारे अधिकार बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की तरह एक ही परिवार के हाथों में सुरक्षित हैं. पार्टी के बाहर से आए योग्य और निष्ठावान नेता केवल आदेशों का पालन करने वाले कार्यकर्ताओं की तरह काम करते हैं. संगठन के भीतर लोकतांत्रिक चुनाव, स्वतंत्र चर्चा और आंतरिक लोकतंत्र की संभावनाएं समाप्त हो चुकी हैं. जो व्यक्ति परिवार के करीबी दायरे में है, उसकी तरक्की तय है, जबकि जनता के बीच रहकर काम करने वाला वैचारिक कार्यकर्ता लगातार पीछे धकेल दिया जाता है.
लोहिया ने कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि जिस समाजवाद को उन्होंने जन-जन की मुक्ति का दर्शन बनाया था, वह आगे चलकर एक खास खानदान की जागीर बन जाएगा. लोहिया का समाजवाद व्यवस्था परिवर्तन का नाम था, लेकिन आज का समाजवाद सत्ता को एक परिवार के हाथ में केंद्रित रखने का माध्यम बन गया है. पार्टी का नाम भले ही समाजवादी बना रहे, लेकिन उसका चरित्र, उसकी आत्मा और उसकी नीतियां पूरी तरह परिवारवादी हो चुकी हैं. लोहिया के विचारों और आज की जमीनी राजनीति के बीच यह दूरी अब इतनी बढ़ चुकी है कि इसे पाटना संभव नहीं दिखता.
जब कोई भी राजनीतिक दल अपनी मूल विचारधारा का त्याग कर देता है, तो वह जनता की सेवा का माध्यम न रहकर केवल सत्ता हथियाने और उसे बचाए रखने का औजार बन जाता है. लोहिया के नाम का उपयोग अब सिर्फ भावनात्मक समर्थन जुटाने के लिए किया जाता है, जबकि उनके गैर-बराबरी और गैर-परिवारवाद के सिद्धांतों को पूरी तरह भुला दिया गया है. आज संगठन का मुख्य लक्ष्य वैचारिक क्रांति नहीं, बल्कि परिवार के राजनीतिक रसूख की हिफाजत करना है.
अब यह फैसला पूरी तरह जनता और समाजवादी सोच में विश्वास रखने वाले लोगों के हाथ में है कि वे लोहिया के उस निस्वार्थ, लोकतांत्रिक और समतामूलक समाजवाद के साथ खड़े होना चाहते हैं या फिर एक परिवार के राजनीतिक साम्राज्य के साथ. सपा खुद को लोहिया की वैचारिक वारिस कहती जरूर है, लेकिन उसके रोजमर्रा के कामकाज और संगठनात्मक संरचना लोहिया के सिद्धांतों के एकदम उलट हैं. लोहिया ने जिस परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए अभिशाप बताया था, आज समाजवादी पार्टी उसी रास्ते पर चलकर अपनी पहचान खो चुकी है, और यह लोहिया के महान दर्शन का सबसे बड़ा अपमान है.
(लेखक पंजाब सेंट्रल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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