Opinion: बुंदेलखंड में अखिलेश के PDA की राह में ‘यादववाद’ की पुरानी छवि बनी सबसे बड़ी चुनौती, बीजेपी के किले में सेंध आसान नहीं

यूपी तक

• 10:38 AM • 26 Aug 2026

Opinion: यूपी में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. सपा को अपने PDA के नारे पर भरोसा है. उसका मानना है कि इसके जरिए वह पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक साथ जोड़ सकती है.

Opinion on UP Politics

Opinion on UP Politics (Photo AI Generated)

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Opinion: यूपी में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. सपा को अपने PDA के नारे पर भरोसा है. उसका मानना है कि इसके जरिए वह पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक साथ जोड़ सकती है. लेकिन सपा का यह अंदाजा बुंदेलखंड की जमीन पर बिल्कुल उलटा दिखता है. क्योंकि बुंदेलखंड में कुर्मी, लोधी और मौर्य जैसी जातियों की बड़ी आबादी है और इन सामाजिक समूहों का झुकाव पारंपरिक रूप से बीजेपी की ओर रहा है. वहीं, इस इलाके में इन तमाम पिछड़ी जातियों ने लंबे समय तक यादववाद का दंश भी सहा है. इसलिए सपा के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपनी उस पुरानी छवि से बाहर निकलने की चुनौती भी है, जिसमें उसे लंबे समय तक यादव केंद्रित राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है.

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बुंदेलखंड में PDA का दावा, लेकिन यादववाद की पुरानी छवि बड़ी बाधा

अखिलेश यादव लगातार यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि सपा अब सिर्फ यादव और मुस्लिम राजनीति तक सीमित नहीं है. PDA के जरिए वह पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक बड़े सामाजिक गठजोड़ में जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन राजनीति में सिर्फ नया नारा पुरानी धारणा को खत्म नहीं करता. मतदाताओं के बीच वर्षों में बनी राजनीतिक छवि को बदलने में समय लगता है.

बुंदेलखंड में यही सपा की सबसे बड़ी मुश्किल बन सकती है. कुर्मी, लोधी और मौर्य जैसे गैर-यादव पिछड़े वर्गों की बड़ी मौजूदगी के बावजूद, अगर इन समुदायों के बीच सपा को अभी भी यादव केंद्रित पार्टी के तौर पर देखा जाता है, तो PDA का राजनीतिक विस्तार जमीन पर उतना आसान नहीं होगा. सपा के सामने सवाल यही है कि वह इन समुदायों को सिर्फ चुनावी समीकरण में जोड़ना चाहती है या वास्तव में उन्हें अपने संगठन और राजनीतिक नेतृत्व में भी पर्याप्त जगह देगी?

क्योंकि प्रदेश भर में समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनसे अखिलेश के PDA पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि उनके PDA में केवल यादव और मुस्लिमों के लिए ही जगह है. गैर-यादव पिछड़ों के लिए कोई स्थान नहीं है. क्योंकि कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें पिछड़ों के खिलाफ अपराध में यादव और मुस्लिम आरोपित रहे हैं. लेकिन तब अखिलेश चुप रहे. वहीं, लोधी समाज के सबसे बड़े नेता रहे कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर भी अखिलेश यादव की चुप्पी सवालों के घेरे में है. यूपी पुलिस की भी रिपोर्ट बताती है कि दलितों पर अत्याचार में यादव और मुस्लिम आगे हैं. इन सबके चलते पिछड़े और दलित सपा के PDA से छिटकते दिख रहे हैं.

बसपा का असर भी सपा के लिए आसान नहीं करेगा मुकाबला

बुंदेलखंड की राजनीति को सिर्फ बीजेपी बनाम सपा के नजरिए से देखना भी अधूरा होगा. इस क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक रहा है. ऐसे में सपा के लिए दलित मतदाताओं को अपने PDA के साथ जोड़ना आसान नहीं होगा.

यानी अखिलेश यादव के सामने एक साथ दो मोर्चे हैं. एक तरफ उन्हें गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी, दूसरी तरफ दलित मतदाताओं के उस आधार में जगह बनानी होगी, जहां बसपा का पुराना प्रभाव रहा है. ऐसे में सिर्फ PDA का राजनीतिक नारा पर्याप्त नहीं होगा. उसे जमीन पर संगठन, स्थानीय नेतृत्व और भरोसे में बदलना होगा.

संगठन कमजोर, तो चुनावी नारा कितना काम आएगा?

बुंदेलखंड में सपा की एक और कमजोरी उसका संगठनात्मक ढांचा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश या मध्य यूपी की तुलना में बुंदेलखंड के जिलों में सपा का संगठन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है. चुनाव में राजनीतिक माहौल बनाने के लिए बड़े नेताओं की सभाएं और बड़े-बड़े दावे अपनी जगह हैं, लेकिन बूथ तक संगठन की मौजूदगी चुनावी नतीजों पर बड़ा असर डालती है.

यही वह मोर्चा है, जहां बीजेपी और आरएसएस का मजबूत जमीनी नेटवर्क सपा के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है. बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और चुनावी दिन मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता किसी भी चुनाव में निर्णायक हो सकती है. अगर सपा अपनी संगठनात्मक कमजोरी को दूर नहीं कर पाती, तो केवल सामाजिक समीकरणों के भरोसे बीजेपी को चुनौती देना मुश्किल होगा.

बुंदेलखंड में विकास का नैरेटिव भी बीजेपी के पक्ष में

सपा के सामने चुनौती सिर्फ जातीय समीकरण और संगठन की नहीं है. बुंदेलखंड में विकास और बुनियादी ढांचे का मुद्दा भी बीजेपी के पक्ष में राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर सकता है. बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, डिफेंस कॉरिडोर और जल जीवन मिशन जैसी केंद्र और राज्य सरकार की परियोजनाओं को बीजेपी अपने विकास मॉडल के तौर पर पेश कर सकती है.

एक वक्त था, जब बुंदेलखंड को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था. लेकिन आज के समय में वहां बीजेपी ने कई विकास कार्यों की शुरुआत की है. खुद सीएम योगी आदित्यनाथ कई बार बुंदेलखंड का दौरा कर चुके हैं.

यही वजह है कि सपा के लिए सिर्फ बीजेपी की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा. उसे यह बताना पड़ेगा कि वह बुंदेलखंड के लिए इससे बेहतर क्या करेगी. क्षेत्र के मतदाता अगर इन परियोजनाओं को अपने जीवन में बदलाव से जोड़कर देख रहे हैं, तो विपक्ष के लिए उस नैरेटिव की काट तैयार करना आसान नहीं होगा.

बीजेपी की चुनौती सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं टूटेगी

सपा की राजनीति अक्सर सामाजिक समीकरणों के सहारे चुनावी लड़ाई को साधने की कोशिश करती है. लेकिन बुंदेलखंड में बीजेपी के सामने चुनौती इससे कहीं बड़ी है. यहां बीजेपी के पास गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच मजबूत राजनीतिक पकड़, संगठन का जमीनी नेटवर्क और विकास परियोजनाओं का नैरेटिव- तीनों मौजूद हैं.

ऐसे में सपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह अपने पुराने राजनीतिक टैग से बाहर निकलकर बुंदेलखंड में नए सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ पाएगी?

क्योंकि कुर्मी, लोधी और मौर्य जैसे समुदायों को सिर्फ PDA के नाम पर अपने साथ जोड़ लेने की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है. इन समुदायों के बीच यह भरोसा पैदा करना होगा कि सपा की राजनीति अब किसी एक जाति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती.

अखिलेश के सामने असली परीक्षा: नारा नहीं, भरोसा

बुंदेलखंड में सपा के लिए 2027 की लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि यहां उसे अपने पुराने राजनीतिक ठप्पे से मुकाबला करना होगा. अखिलेश यादव जितना PDA का विस्तार करने की बात करते हैं, उतनी ही तेजी से उन्हें अपनी पार्टी की पुरानी छवि को भी बदलना होगा.

बीजेपी के मजबूत संगठन और विकास के नैरेटिव के सामने सपा को सिर्फ यह कहने से फायदा नहीं होगा कि उसका सामाजिक गठबंधन बड़ा है. उसे जमीन पर संगठन खड़ा करना होगा, गैर-यादव पिछड़े वर्गों में भरोसा पैदा करना होगा और दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)