Opinion: विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तर प्रदेश की विपक्षी राजनीति एक अजीब तस्वीर पेश कर रही है. पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक कांग्रेस के नेता समाजवादी पार्टी पर लगातार हमलावर हैं. सीट बंटवारे को लेकर तल्ख बयान दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद सपा प्रमुख अखिलेश यादव कांग्रेस के प्रति नरम रुख बनाए हुए हैं. हाल के दिनों में उन्होंने राहुल गांधी के साथ एकजुटता जताने वाले बयान दिए और तस्वीरें साझा की हैं. यह नरमी संयोग नहीं, सपा की मौजूदा मजबूरी का संकेत है.
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कांग्रेस की आक्रामकता सबसे साफ सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद के बयानों में दिखती है. उन्होंने बार-बार कहा है कि कांग्रेस कोई भिखारी नहीं है जो सपा से सीट मांगे. अगस्त 2026 में उन्होंने दो टूक कहा कि “हम खुद को बर्बाद कर नहीं बनवाएंगे आपकी सरकार” और गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहिए. उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव का हवाला दिया कि गठबंधन के कारण ही सपा 37 सीटें जीत सकी, वरना 2022 विधानसभा चुनाव में वह 111 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई थी. मसूद का आरोप है कि मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार और मस्जिदों पर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर अखिलेश यादव खामोश रहते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सपा स्वतंत्र मुस्लिम नेता बर्दाश्त नहीं करती. पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटर कई सीटों पर निर्णायक हैं, इसलिए ये बयान कांग्रेस के लिए उस वर्ग तक संदेश पहुंचाने का जरिया भी बन रहे हैं.
पूर्वांचल में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का स्वर थोड़ा संयमित है, लेकिन दबाव कम नहीं. उन्होंने साफ कहा है कि पार्टी सभी 403 विधानसभा सीटों पर बूथ स्तर तक संगठन मजबूत कर रही है. गठबंधन का अंतिम फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा. राय ने इमरान मसूद का खुलकर समर्थन किया और उन्हें पार्टी का मजबूत नेता बताया. कई मंचों पर कांग्रेस की तरफ से 200 सीटों की मांग की जा चुकी है.
इन तीखे हमलों के बावजूद अखिलेश यादव का रुख नरम बना हुआ है. 31 अगस्त 2026 को उन्होंने एक्स पर राहुल गांधी के खिलाफ उत्तराखंड में दर्ज एफआईआर की निंदा की. इससे पहले जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस के धरने में अखिलेश खुद पहुंचे. दोनों नेताओं की साथ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं. जून में इंडिया गठबंधन की बैठक और दोनों के जन्मदिन पर भी पारस्परिक शुभकामनाएं और तस्वीरें साझा हुईं. ये संकेत बताते हैं कि शीर्ष स्तर पर समन्वय बनाए रखने की कोशिश जारी है, भले ही नीचे के नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हों.
इन तस्वीरों को देखकर लगता है कि यूपी में अकेले समाजवादी पार्टी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. उन्हें पता है कि भाजपा से लड़ाई अकेले सपा के बस की बात नहीं है. बिना व्यापक गठबंधन के PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण को पूरा करना मुश्किल है. सपा के पास फिलहाल कोई दूसरा मजबूत संभावित सहयोगी नहीं दिख रहा है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2027 में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. राष्ट्रीय लोक दल अब एनडीए के साथ है. AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी गठबंधन का प्रस्ताव देते रहे हैं, लेकिन अखिलेश ने उन्हें वोट काटने वाली ताकत बताते हुए इंडिया ब्लॉक में जगह देने से इनकार कर दिया है. ऐसे में कांग्रेस ही विकल्प है. चाहे कांग्रेस की तरफ से कितनी भी आलोचनाएं झेलनी पड़ें.
हालांकि दोनों दलों के बीच अविश्वास का पुराना इतिहास है. नवंबर 2023 में मध्य प्रदेश चुनाव के दौरान, जब गठबंधन नहीं था, अखिलेश ने कांग्रेस को “बहुत चालू पार्टी” बताया और लोगों से सावधान रहने को कहा था. कांग्रेस ने भी सपा को जातिवादी और वंशवादी कहने के आरोप लगाए थे. फिर भी 2024 में दोनों साथ आए. आज वही मजबूरी दोहराई जा रही है. अकेले पड़ने और वोट बैंक के छिटकने के डर से अखिलेश कांग्रेस के ‘पंजे’ से हाथ मिलाए रखने को तैयार दिख रहे हैं.
2027 का चुनाव करीब है. सीट बंटवारा अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है. कांग्रेस संगठन मजबूत करके सौदेबाजी की स्थिति बनाना चाहती है. सपा अपनी ताकत के आधार पर नियंत्रण रखना चाहती है. लेकिन राजनीतिक गठबंधनों की सबसे बड़ी जरूरत विश्वास है, मजबूरी नहीं. सपा-कांग्रेस गठबंधन में विश्वास कम और मजबूरी ज्यादा दिखती है. आने वाले महीनों में यही मजबूरी तय करेगी कि हाथ कितना मजबूती से मिलता है या तल्खी बढ़कर अलग रास्ते पर ले जाती है.
(लेखक भावेष पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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