Opinion: छात्रों का हित या सियासी दांव? अखिलेश यादव से बंद कमरे में मुलाकात के बाद CJP पर उठे गंभीर सवाल

यूपी तक

04 Sep 2026 (अपडेटेड: 04 Sep 2026, 03:42 PM)

Opinion: अखिलेश यादव से सीक्रेट मीटिंग और अंदरूनी बगावत के बाद CJP की मंशा पर उठे गंभीर सवाल. जानिए कैसे छात्रों के हक की लड़ाई का दावा करने वाला आंदोलन अब राजनीतिक दांव-पेच और अंदरूनी कलह में उलझ गया है.

akhilesh yadav and ashutosh ranka meets

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Opinion: छात्रों और युवाओं के मुद्दों से शुरू हुआ कोई आंदोलन जब राजनीति की चौखट तक पहुंचता है तो सवाल सिर्फ उसकी मुलाकातों का नहीं, उसकी मंशा और दिशा का भी उठता है. CJP को लेकर अब यही सवाल गहराता जा रहा है. एक तरफ संगठन खुद को छात्रों और युवाओं की आवाज बताता है, ईमानदार परीक्षा व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का दावा करता है. दूसरी तरफ राजनीतिक नेताओं से उसकी नजदीकियां और अब संगठन के भीतर से ही उठी बगावत एक अलग तस्वीर पेश कर रही है.

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अखिलेश यादव और CJP नेता आशुतोष राका की मुलाकात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है. किसी राजनीतिक नेता से मिलना अपने आप में सवाल नहीं है. लोकतंत्र में संगठन संवाद कर सकते हैं. लेकिन जिस आंदोलन की बुनियाद भ्रष्टाचार, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य की लड़ाई पर रखी गई हो, उसकी राजनीतिक नजदीकियों का पैमाना क्या है, यह सवाल जरूर उठता है.

खासकर तब जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा हो. बंद कमरे में हुई यह मुलाकात ऐसे राजनीतिक माहौल में सामने आई है जहां हर नई राजनीतिक नजदीकी के मायने तलाशे जा रहे हैं. सवाल पहली बार नहीं उठे हैं. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद झारखंड और पंजाब में पेपर लीक से जुड़े मुद्दों पर भी CJP की सक्रियता को लेकर सवाल उठते रहे. झारखंड में छात्रों का बड़ा प्रदर्शन हुआ. लेकिन सीजेपी वहां नहीं गई। वो केवल बीजेपी शासित राज्यों में हमलावर है. ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि क्या CJP हर छात्र और हर युवा के मुद्दे की लड़ाई लड़ रही है या उसकी राजनीतिक सक्रियता चुनिंदा मुद्दों और चुनिंदा राजनीतिक परिस्थितियों तक सीमित है?

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई या राजनीतिक सुविधा?

CJP भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का दावा करती है.लेकिन अखिलेश यादव से बंद कमरे में हुई मुलाकात के बाद सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि जिस समाजवादी पार्टी पर भ्रष्टाचार, भर्ती, नकल और माफियागिरी तक पर सवाल उठते रहे हैं, उनके साथ राजनीतिक समीकरणों की तस्वीर क्या संदेश देती है?

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तभी विश्वसनीय होती है, जब उसके मानदंड सत्ता और विपक्ष- दोनों के लिए समान हों. अगर एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हो और दूसरी तरफ उन्हीं आरोपों से घिरी राजनीतिक व्यवस्था के साथ नजदीकियां बढ़ती दिखें तो आंदोलन की निष्पक्षता पर सवाल उठना तय है.

‘A टीम’ का दावा और अंदर से उठी बगावत

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास अभिजीत दीपके के उस बयान के बाद सामने आया जिसमें उन्होंने कहा था कि कॉकरोच पार्टी किसी राजनीतिक दल की B टीम नहीं बल्कि छात्रों की A टीम है. उन्होंने नेताओं की डिग्रियों तक पर सवाल उठाने की बात कही थी.

लेकिन इसके ठीक बाद उन्हीं के साथी आशुतोष रांका का अखिलेश यादव से बंद कमरे में मिलना ये साफ संदेश देता है कि कॉकरोच पार्टी संस्थापक की कथनी और करनी में फर्क है. अब संगठन के भीतर से ही बगावत सामने आ गई. मनीष ब्रह्मभट्ट ने CJP-D के नाम से अलग संगठन बनाने का ऐलान करते हुए अभिजीत दीपके पर आंदोलन को राजनीतिक रूप से बेचने और उसे 'टीम केजरीवाल' में बदलने का आरोप लगाया.

जब किसी आंदोलन के भीतर से ही उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप उठने लगें तो सवाल सिर्फ विरोधियों की आलोचना तक सीमित नहीं रहता. फिर आंदोलन की दिशा और उसके नेतृत्व की मंशा भी जांच के दायरे में आ जाती है.

सीजेपी से पूछे जाएंगे ये तीखे सवाल

CJP भ्रष्टाचार और ईमानदार परीक्षा व्यवस्था की बात करती है. लेकिन जिन राजनीतिक चेहरों के दौर पर भ्रष्टाचार, नकल, भर्ती और ‘पर्ची-खर्ची’ जैसे सवाल उठते रहे, उनके साथ उसकी नजदीकियां कई सवाल खड़े करती हैं. महिलाओं के मुद्दे पर मुखर रहने वाला संगठन भी क्या ऐसे नेताओं और सरकारों से उसी सख्ती से सवाल करेगा? अगर आंदोलन के पैमाने सत्ता और विपक्ष के लिए अलग-अलग हों, तो छात्रों की लड़ाई राजनीतिक सुविधा में बदलती नजर आने लगती है.

छात्रों की लड़ाई या छात्रों की ऊर्जा का सियासी इस्तेमाल?

सबसे बड़ा सवाल आखिरकार उन छात्रों और युवाओं का है जिनके नाम पर यह आंदोलन खड़ा किया गया. राजनीति के लिए आंदोलन एक रणनीति हो सकता है. लेकिन गांव-कस्बों से आने वाले छात्र के लिए परीक्षा, भर्ती और नौकरी उसका भविष्य है. एक नेता के लिए प्रदर्शन राजनीतिक ताकत बन सकता है, लेकिन आंदोलन में उतरने वाले युवा के लिए उसका असर सीधे करियर और परिवार पर पड़ता है. यानी अब धीरे-धीरे ये भी साफ होने लगा है कि सीजेपी ने आंदोलन और छात्र हित के नाम पर कैसे युवाओं को छला है.

अखिलेश यादव से मुलाकात और उसके बाद संगठन के भीतर उठे राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों ने CJP की विश्वसनीयता को सबसे बड़ी परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है. अगर संगठन वास्तव में स्वतंत्र छात्र आंदोलन है, तो उसे सत्ता के साथ-साथ विपक्ष से भी उतनी ही मजबूती से सवाल करने होंगे.

लेखक-भावेष पांडेय (इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

 (Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)