Opinion: मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पोस्टर लगे थे. उनमें साफ लिखा था कि वे उस त्रासदी को कभी नहीं भूलेंगे. ये पोस्टर सिर्फ याद नहीं दिलाते, बल्कि सवाल भी उठाते हैं-सपा सरकार के कार्यकाल में पश्चिमी यूपी कैसे सांप्रदायिक तनाव का गढ़ बन गया. संभल से कैराना, मथुरा से मुजफ्फरनगर तक की घटनाएं सरकार की मंशा और नीति पर गंभीर सवाल छोड़ गईं.
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सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में भड़के दंगे सबसे बड़े उदाहरण हैं. इन दंगों में करीब 60 लोग मारे गए और हजारों परिवार विस्थापित हुए. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अखिलेश यादव सरकार की लापरवाही पर टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार प्रारंभिक चरण में सांप्रदायिक हिंसा का अनुमान लगाने और रोकथाम के कदम उठाने में लापरवाह रही. खुफिया एजेंसियों की नाकामी और प्रशासनिक सुस्ती ने आग को फैलने दिया.
राहत वितरण में भी विवाद खड़ा हुआ. उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसमें मुजफ्फरनगर दंगों से प्रभावित मुस्लिम परिवारों को ही पांच लाख रुपये की सहायता देने का प्रावधान था. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि राहत धर्म के आधार पर नहीं बांटी जा सकती. कोर्ट के दबाव में सरकार को अधिसूचना वापस लेनी पड़ी और सभी प्रभावितों के लिए समान प्रावधान वाला नया आदेश जारी करना पड़ा. यह घटना तुष्टीकरण की राजनीति का प्रत्यक्ष उदाहरण बन गई.
संभल का इतिहास भी इसी कड़ी में जुड़ता है. 1978 के संभल दंगों से जुड़े कई मुकदमे 1993 में मुलायम सिंह यादव सरकार ने वापस ले लिए थे. शासन के पत्रों और रिकॉर्ड से यह बात सामने आई है. आरोपियों के पक्ष में यह फैसला लिया गया, जबकि पीड़ित पक्ष न्याय की उम्मीद में था. पश्चिमी यूपी में सपा की इस तरह की कार्रवाइयों ने लंबे समय तक विश्वासघात की भावना पैदा की.
कैराना और कंधला का मुद्दा भी सपा शासन के दौरान उभरा. 2014-16 के बीच कैराना से हिंदू परिवारों के पलायन के आरोप लगे. भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने 346 परिवारों की सूची जारी की और दावा किया कि अपराध और धमकियों के कारण वे इलाका छोड़ने को मजबूर हुए. एनएचआरसी की जांच में कई परिवारों के डर और पलायन की पुष्टि हुई. प्रशासनिक रिपोर्टों में संख्या को लेकर विवाद रहा, लेकिन कानून-व्यवस्था की खराबी और मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बदली जनसांख्यिकीय स्थिति को लेकर चिंता जताई गई. यह मुद्दा 2017 के विधानसभा चुनाव में भी चर्चा का विषय बना.
सपा शासन (2012-17) में पश्चिमी यूपी में सांप्रदायिक घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2013 में उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा के मामले काफी बढ़े. मथुरा, गाजियाबाद, फैजाबाद, सहारनपुर और अन्य जगहों पर छोटी-बड़ी झड़पें हुईं. कई बार छोटी घटनाओं को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया और प्रशासन की प्रतिक्रिया सुस्त रही. दंगे होते रहे, लेकिन सपा की राजनीति मुस्लिम वोट बैंक पर केंद्रित रही. सैफई में पार्टी के कार्यक्रम चलते रहे, जबकि प्रभावित इलाकों में घाव हरे थे.
सपा ने हमेशा पश्चिमी यूपी में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को प्राथमिकता दी. अपराधियों और दंगाइयों के खिलाफ सख्ती की बजाय मुकदमों की वापसी, धर्म आधारित राहत और प्रशासनिक उदासीनता ने आम लोगों, खासकर हिंदू समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ाई. मुजफ्फरनगर के बाद कैराना जैसे इलाकों में अपराध और तनाव का माहौल बना रहा.
आज जब दंगों की बरसी पर पोस्टर लगते हैं, तो वे सिर्फ अतीत की याद नहीं दिलाते. वे याद दिलाते हैं कि तुष्टिकरण की राजनीति कैसे एक पूरे क्षेत्र को सुलगाने वाली आग में बदल सकती है. कानून का समान लागू होना, निष्पक्ष प्रशासन और धर्मनिरपेक्ष राहत ही सच्ची सामाजिक सद्भावना का आधार है. पश्चिमी यूपी के अनुभव बताते हैं कि वोटबैंक की राजनीति अंततः पूरे समाज को नुकसान पहुंचाती है. मुजफ्फरनगर से कैराना तक का सफर इस बात की गवाही है कि सपा शासन में सुरक्षा और न्याय की भावना कमजोर पड़ी, जिससे क्षेत्र लंबे समय तक अशांति की चपेट में रहा.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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