Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन उनकी पीसी में एक पैटर्न लगातार देखा गया है कि जब कोई पत्रकार उनसे ऐसा सवाल पूछता है जो उनके मनमुताबिक नहीं होता, तो अखिलेश यादव भड़क जाते हैं. पत्रकार को अपमानित करने लगते हैं, उसे बीजेपी का एजेंट बताने लगते हैं. कभी वह पत्रकार की जाति पूछकर उस पर हमलावर होते हैं तो कभी उसे बाहर करने की धमकी तक दे डालते हैं. यहीं से अखिलेश के व्यवहार में विरोधाभास दिखाई देता है. एक तरफ वह लोकतंत्र की बात करते हैं और पत्रकारों की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाते हैं, दूसरी तरफ खुद ऐसे सवालों पर भड़क जाते हैं जो उनके हिसाब या उनके राजनीतिक फायदे के मुताबिक नहीं होते.
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लेकिन अखिलेश के इस ‘टेंपर’ को सिर्फ पत्रकारों के साथ उनके व्यवहार तक सीमित मान लेना अधूरी तस्वीर होगी. उनके राजनीतिक सफर को पीछे मुड़कर देखें तो यही तेवर परिवार, पार्टी और सहयोगियों के साथ उनके रिश्तों में भी दिखाई देता है. फर्क सिर्फ इतना है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस का गुस्सा कैमरे में रिकॉर्ड हो जाता है, जबकि पार्टी और परिवार के भीतर का गुस्सा रिश्तों के टूटने के बाद दिखाई देता है.
असहमति बर्दाश्त नहीं, सवाल उठते ही तेवर बदल जाते हैं
राजनीति में नेतृत्व का मतलब सिर्फ अपने समर्थकों की तालियां सुनना नहीं होता. असली नेतृत्व वह है जो असहज सवाल सुन सके, आलोचना को जगह दे और अपने ही लोगों की असहमति को भी स्वीकार कर सके. अखिलेश की राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनके आसपास अब सिर्फ वही आवाजें बची हैं जो उनकी बात से सहमत हों?
पत्रकार सवाल करे तो नाराजगी, पार्टी में कोई अलग राय रखे तो दूरी और सहयोगी अपनी हिस्सेदारी मांगे तो रिश्तों में खटास- यह पैटर्न किसी संयोग से ज्यादा बड़ा दिखाई देता है.
जिस पिता ने पार्टी बनाई, उनसे भी टकराव
समाजवादी पार्टी की नींव मुलायम सिंह यादव ने रखी थी. उन्होंने दशकों की राजनीति में नेताओं की पूरी पीढ़ी तैयार की और अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लेकर संगठन खड़ा किया. लेकिन अखिलेश के दौर में सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष बाहर नहीं, पहले घर के भीतर दिखाई दिया.
पिता-पुत्र का वह विवाद कौन भूल सकता है, जब समाजवादी पार्टी का पारिवारिक संघर्ष खुले मंच और सार्वजनिक राजनीति का हिस्सा बन गया था. यह सब तब हुआ था, जब अखिलेश यादव सूबे के मुख्यमंत्री थे. मुलायम सिंह यादव ने उन्हें मुख्यमंत्री की कमान सौंपी थी, लेकिन अखिलेश यादव को पिता का दखल भी बर्दाश्त नहीं था. सार्वजनिक मंच पर उन्होंने पिता का अपमान किया था.
अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया था. मुलायम सिंह इससे बेहद दुखी हुए थे. उन्होंने यहां तक कहा था कि मैंने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन जो अपने पिता का नहीं हुआ, वह किसी और का क्या होगा.
यह सिर्फ परिवार का विवाद नहीं था. इसने समाजवादी पार्टी की उस संस्कृति को भी बदल दिया, जिसमें मुलायम के आसपास अलग-अलग नेताओं की अपनी राजनीतिक हैसियत थी.
शिवपाल को किनारे किया, संगठन का पुराना स्तंभ टूटा
शिवपाल यादव सिर्फ अखिलेश के चाचा नहीं थे. वह समाजवादी पार्टी के पुराने संगठनकर्ता और मुलायम सिंह यादव के सबसे भरोसेमंद राजनीतिक साथियों में रहे. लेकिन अखिलेश के साथ टकराव ने रिश्तों को ऐसे मोड़ पर पहुंचा दिया कि शिवपाल को अलग रास्ता चुनना पड़ा. बाद में दोनों साथ दिखाई दिए, लेकिन राजनीति में टूटे रिश्तों की दरारें सिर्फ एक मंच साझा करने से नहीं भरतीं.
पुराने समाजवादियों की जगह अखिलेश-केंद्रित सपा
मुलायम के समय समाजवादी पार्टी में कई ऐसे नेता थे जिनकी अपनी पहचान थी. पार्टी के भीतर उनकी बात सुनी जाती थी और संगठन में उनका प्रभाव था. अखिलेश के नेतृत्व में धीरे-धीरे वह सामूहिकता कमजोर होती गई. पुराने चेहरे एक-एक कर दूर होते गए. किसी ने पार्टी छोड़ी, किसी ने अलग रास्ता चुना और किसी ने नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए.
नतीजा यह हुआ कि समाजवादी पार्टी का चेहरा तो अखिलेश यादव बन गए, लेकिन पार्टी का सामूहिक नेतृत्व लगातार सिकुड़ता गया. आजम खान जैसे नेता भी अलग-अलग मौकों पर अखिलेश की कार्यशैली को लेकर असहजता जाहिर करते रहे हैं.
सहयोगी भी आए और असहज होकर दूर होते गए
अखिलेश की राजनीति में सहयोगियों का इतिहास भी बहुत स्थायी नहीं रहा. चुनाव के समय गठबंधन बने, सीटों का गणित बैठा, मंच साझा हुए और फिर वही सहयोगी दूरी बनाते दिखाई दिए. अखिलेश यादव पर अक्सर अपने सहयोगियों को पर्याप्त सम्मान न देने के आरोप लगते रहे हैं. हाल ही में उन्होंने आरएलडी के लिए जिस तरह ‘चवन्नी’ वाली भाषा का इस्तेमाल किया, उससे भी सहयोगियों के प्रति उनके रवैये पर सवाल उठे. कभी उनके सहयोगी रहे ओमप्रकाश राजभर के साथ उनके रिश्तों का उतार-चढ़ाव भी इसी तस्वीर को सामने रखता है.
लेकिन अखिलेश का यह रवैया उनके लिए सहज नहीं है. उत्तर प्रदेश की राजनीति को देखें तो देश के इस सबसे बड़े प्रदेश में सहयोगियों की भूमिका और व्यापक स्वीकार्यता बेहद अहम है. इसके बावजूद अखिलेश अपने इस व्यवहार के चलते धीरे-धीरे अकेले पड़ते दिखाई देते हैं.
वह परिवार और पार्टी में भी काफी हद तक अकेले नजर आते हैं. आज समाजवादी पार्टी में कोई दूसरा ऐसा नेता दिखाई नहीं देता, जिसकी राजनीतिक मौजूदगी अखिलेश यादव जितनी मजबूत हो. सहयोगियों के साथ भी उनके रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं और पत्रकारों से लेकर राजनीतिक विरोधियों तक, कई मौकों पर उनका रवैया टकराव वाला दिखाई देता है.
ऐसे में सवाल सिर्फ अखिलेश के गुस्से का नहीं है. सवाल यह है कि क्या यही तेवर उनकी राजनीति का दायरा भी छोटा कर रहे हैं? क्योंकि चुनाव में सिर्फ अपना चेहरा और अपना एजेंडा काफी नहीं होता. संगठन चाहिए, सहयोगी चाहिए और सबसे बढ़कर असहमति को साथ लेकर चलने की क्षमता चाहिए. अगर हर असहज सवाल पर गुस्सा और हर असहमति पर टकराव ही जवाब बन जाए, तो राजनीति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक है.
(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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