Opinion: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है. सूबे की मुख्य विपक्षी पार्टी पीडीए के जरिए अपना दावा ठोक रही है. लेकिन इससे पहले उसके इस पीडीए फॉर्मूले पर ही सबसे ज्यादा चोट हो रही है. खास बात यह है कि सपा के पीडीए पर सवाल उठाने वालों में बीजेपी से ज्यादा वे छोटे दल हैं, जो जातियों और प्रतीकों के आधार पर खड़े हैं और पीडीए के ही जातिगत समीकरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
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पिछले कुछ दिनों से निषाद पार्टी ने सपा पर मोर्चा खोल रखा है. निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद समाजवादी पार्टी पर लगातार आरोप लगा रहे हैं. उन्होंने फूलन देवी से लेकर कसरवल तक ऐसे मुद्दे उठाए हैं, जो सपा की पीडीए राजनीति के सामने असहज सवाल खड़े करते हैं.
फूलन देवी को लेकर संजय निषाद का सबसे गंभीर आरोप
संजय निषाद का सबसे गंभीर आरोप फूलन देवी को लेकर है. उनका कहना है कि फूलन देवी जब सपा से अलग होकर अपनी राजनीतिक पहचान खड़ी करने की कोशिश कर रही थीं, तब उनकी आवाज दबाने के लिए साजिश रची गई और उनकी हत्या कर दी गई. निषाद का सवाल है कि आखिर फूलन देवी का सपा से मोहभंग क्यों हुआ और उन्हें अलग राजनीतिक मंच खड़ा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई.
यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि फूलन देवी सिर्फ एक पूर्व सांसद नहीं थीं. वह मल्लाह समाज के बीच एक बड़ी प्रतीक हैं और समाजवादी पार्टी के टिकट पर मिर्जापुर से दो बार लोकसभा पहुंची थीं.
फूलन देवी और सपा का कनेक्शन
फूलन देवी के जरिए सपा की पहुंच मल्लाह समाज में बनी और इसका फायदा भी पार्टी को मिला. लेकिन बाद में यही पहचान सपा को अखरने लगी, क्योंकि अपने समाज में फूलन देवी का कद लगातार बढ़ रहा था. वह अपने समाज की एक प्रतीक के तौर पर जानी जाने लगी थीं, खासकर महिला वर्ग में उनका प्रभाव था.
इसी बीच फूलन देवी का सपा से मोहभंग होने लगा और वह अपने समाज के नाम पर अलग पार्टी बनाना चाहती थीं. उन्होंने ‘एकलव्य सेना’ का गठन भी किया. इसके जरिए वह दलितों, पिछड़ों और शोषित वर्ग की महिलाओं को एकजुट करने के लिए सक्रिय थीं. इसी दौरान उनकी हत्या कर दी गई.
संजय निषाद का आरोप है कि इस हत्या के पीछे सपा का हाथ था, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि मल्लाह समाज की अपनी अलग आवाज बने. उनका कहना है कि फूलन देवी की हत्या के जरिए मछुआरा समाज की स्वतंत्र राजनीति को रोक दिया गया और उनकी राजनीतिक विरासत को समाज से दूर करने की कोशिश हुई.
कसरवल की गोलियां भी सपा के सामने पुराना सवाल
फूलन देवी के बाद संजय निषाद लगातार कसरवल कांड का मुद्दा भी उठाते रहे हैं. 7 जून 2015 को गोरखपुर के कसरवल में निषाद आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन हुआ था. आंदोलन के दौरान हिंसा और पुलिस की गोली से एक युवक की मौत हुई. उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे.
संजय निषाद का आरोप है कि निषाद समाज के हक की मांग करने वालों पर सपा सरकार में गोलियां चलवाई गईं और बाद में निषाद होने के चलते उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया.
सपा को होगा बड़ा नुकसान
संजय निषाद के ये आरोप सपा के लिए इसलिए नुकसान पहुंचाने वाले हो सकते हैं, क्योंकि फूलन देवी का मल्लाह समाज में गहरा प्रभाव है, खासकर महिलाओं के बीच. वहीं, ये आरोप उस पुराने डिबेट को भी जिंदा कर रहे हैं कि सपा ने फूलन देवी की लोकप्रियता का इस्तेमाल किया और फिर उन्हें रास्ते से हटा दिया.
मल्लाह समाज का कई सीटों पर गहरा प्रभाव है. ऐसे में कसरवल की घटना और फूलन देवी पर उठ रहे सवाल सपा की पिछड़ी राजनीति को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
वैसे भी सपा की राजनीति में पीडीए के भीतर से ही सवाल उठ रहे हैं. राजभर पहले ही सपा पर हमलावर हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सपा के पीडीए में केवल एक धर्म और जाति की जगह है, गैर-यादव ओबीसी की कोई जगह नहीं है. अब निषाद भी यही सवाल उठा रहे हैं कि कैसे सपा ने ओबीसी के हक को मारा और केवल एक जाति को फायदा पहुंचाया, निषादों का अपमान किया और उनकी आवाज दबाई.
(लेखक, डॉ. अश्वनी अवस्थी, भूगोल विषय में पीएचडी हैं. चित्रकूट में वर्ष 2019 से 2024 तक दो कार्यकाल में जिला महामंत्री का दायित्व निभा चुके हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों में गहरी रुचि है.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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