Opinion: किसी समाज की सबसे बड़ी पूंजी उसकी स्मृति होती है. स्मृति जब सार्वजनिक सम्मान से कटती है, तो नायक लोककथाओं में सिमट जाते हैं और नई पीढ़ी उन्हें इतिहास नहीं, किस्सा मानने लगती है. उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक यही हुआ. अनेक क्षेत्रीय वीर और वीरांगनाएं श्रद्धा में जीवित रहीं, पर राजकीय पहचान, संस्थानों और पाठ्य चर्चा में उनकी जगह सीमित रही. योगी आदित्यनाथ सरकार का कार्यकाल इस अर्थ में एक सांस्कृतिक मोड़ है कि उसने भूली-बिसरी विरासत को फिर राज्य की भाषा बनाया. यह केवल उत्सव नहीं, पहचान का पुनरुद्धार है.
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बहराइच के महाराजा सुहेलदेव इस बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं. जून 2025 को चित्तौरा झील के किनारे उनके स्मारक और प्रतिमा का उद्घाटन हुआ. इससे आगे बढ़कर सरकार ने बहराइच के स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय का नाम महाराजा सुहेलदेव के नाम पर रखा और जिला अस्पताल को महर्षि बालार्क ऋषि से जोड़ा. आजमगढ़ का राज्य विश्वविद्यालय भी महाराजा सुहेल देव स्टेट यूनिवर्सिटी के रूप में स्थापित है. नाम जब अस्पताल और विश्वविद्यालय तक पहुंचता है, तो सम्मान प्रतीक से संस्था बन जाता है. इसी चेतना में निषाद राज की स्मृति भी जुड़ती है. रामकथा में निषादराज गुह की भूमिका सनातन समरसता की याद दिलाती है-नौका से राम को पार लगाना केवल सेवा नहीं, संस्कृति की साझेदारी थी. योगी राज में इस विरासत को सामाजिक गौरव से जोड़कर देखा गया है. जो समुदाय अपनी ऐतिहासिक भूमिका को पुस्तकों में खोजता रहा, उसे सार्वजनिक सम्मान की भाषा मिली.
लखनऊ में वीरांगना ऊदा देवी पासी की प्रतिमा का अनावरण इसी अध्याय का दूसरा पड़ाव है. बलिदान दिवस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में हुआ यह सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है कि राज्य ने उन्हें स्मारक तक सीमित नहीं रखा. लोकस्मृति और सरकारी कार्यक्रमों में यह उल्लेख बार-बार आता है कि 16 नवंबर 1857 को सिकंदरबाग के पीपल पर चढ़कर ऊदा देवी ने अंग्रेजी सेना का सामना किया. सरकार का कहना है कि पासी समाज सहित क्षेत्रीय नायकों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है. इससे भी आगे बढ़कर पीएसी की तीन महिला बटालियन ऊदा देवी पासी, झलकारी बाई कोरी और अवंती बाई लोधी के नाम पर स्वीकृत की गईं. ये बटालियन लखनऊ, गोरखपुर और बदायूं से जुड़ी हैं. महाराजा बिजली पासी की स्मृति भी इसी दिशा में बढ़ी है. अशियाना स्थित बिजली पासी किले के सौंदर्यीकरण और लाइट-एंड-साउंड की सरकारी योजना बनी, लखनऊ में स्मारक की तैयारी बताई गई और अमेठी के निहालगढ़ रेलवे स्टेशन का नाम महाराजा बिजली पासी हुआ. लाखन पासी, सतान पासी जैसे नाम भी अब सरकारी मंचों पर इतिहास की धूल से निकालकर रखे जा रहे हैं.
महापुरुषों का सम्मान अधूरा रह जाता, यदि उनसे जुड़े स्थलों की उपेक्षा जारी रहती. यूपी की डबल इंजन सरकार में तीर्थ और इतिहास को विकास से जोड़ने का काम किया. काशी विश्वनाथ धाम का विस्तार, अयोध्या में राम मंदिर के साथ नगर का कायाकल्प और प्रयागराज कुंभ की वैश्विक छवि बड़े उदाहरण हैं. उनसे कम महत्वपूर्ण नैमिषारण्य और श्रावस्ती नहीं. सीतापुर का नैमिषारण्य वेद-पुराण की तपस्थली, चक्रतीर्थ और ललिता देवी की भूमि रहा. सरकार ने इसे तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया. श्रावस्ती बौद्ध-जैन परंपरा और प्राचीन आस्था से जुड़ी है. लंबे समय तक आकांक्षी जिले की सूची में गिने जाने वाले इस क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य और पर्यटन परियोजनाएं शुरू की गईं. सुंदरीकरण का अर्थ केवल रंग-रोगन नहीं, आस्था को सुविधा और गरिमा देना है.
नामकरण की नीति इस पुनर्जागरण का तीसरा स्तंभ है. 2018 में इलाहाबाद का प्रयागराज और फैजाबाद का अयोध्या होना उन स्थानों को उनकी मूल श्रद्धा से वापस जोड़ना था. मुगलसराय जंक्शन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन बना, झांसी स्टेशन वीरांगना लक्ष्मीबाई के नाम से जाना गया. आगे छोटे कस्बों और तहसीलों तक यही सोच पहुंची. शाहजहांपुर की जलालाबाद तहसील का नाम भगवान परशुराम पुरी करने, कुशीनगर के फाजिलनगर का पावागढ़ रखने, अयोध्या के भदरसा का भरत नगर और खिलौनी-सुचितगंज नगर पंचायत का मां ज्वाला जी रखने की घोषणाएं हुईं. 29 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री ने भदोही का पुराना नाम संत रविदास नगर बहाल करने का ऐलान किया. गोरखपुर में स्थानीय बाजारों के नामों को भारतीय पहचान से जोड़ने की पहल भी इसी सोच का हिस्सा बताई जाती है. आलोचक इसे सियासत कह सकते हैं, पर प्रश्न सरल है-क्या किसी भूमि का प्राचीन और लोकश्रद्धा वाला नाम उसकी आत्मा नहीं होता?
इस पूरी प्रक्रिया का स्थायी पक्ष शिक्षा और संस्थाएं हैं. प्रतिमा एक पीढ़ी देखती है, पाठ्यपुस्तक और बटालियन कई पीढ़ियां गढ़ती हैं. सही अर्थों में यह पुनर्जागरण सामाजिक न्याय का भी नया पाठ है. न्याय केवल योजनाओं का बंटवारा नहीं, स्मृति में हिस्सेदारी भी है. जब सुहेलदेव, निषाद राज की सांस्कृतिक स्मृति, ऊदा देवी और बिजली पासी एक ही राजकीय चेतना में स्थान पाते हैं, तो संदेश यह जाता है कि सनातन धारा में सभी वीरों की जगह है. योगी राज ने इस बहुस्तरीय स्मृति को सार्वजनिक सम्मान दिया है. भूली पहचान जब राज्य की भाषा बनती है, तो समाज आत्मविश्वास से भरता है. यही इस पुनर्जागरण की सबसे बड़ी उपलब्धि है.
(लेखक, डॉ. विनम्र सेन सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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