अयोध्या दीपोत्सव 2026 के दसवें संस्करण में पांच देशों के कलाकार रामलीला का मंचन करेंगे. 2500 भारतीय और विदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियों से रामनगरी बनेगी वैश्विक सांस्कृतिक संगम का केंद्र.उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है. लेकिन चुनाव से पहले ही विपक्षी दलों की स्थिति एक अबूझ पहेली बनती जा रही है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पिछले कई महीनों से गठबंधन का दावा कर रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच किसी एकराय पर पहुंचने के संकेत नहीं मिल रहे हैं. इसके उलट, दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर हमलावर हैं. दिलचस्प यह है कि यही नेता जब दिल्ली पहुंचते हैं तो एक-दूसरे का हाथ थामकर विपक्षी एकता का संदेश देते हैं, लेकिन लखनऊ लौटते ही सीटों के बंटवारे, राजनीतिक हैसियत और नेतृत्व की दावेदारी को लेकर आमने-सामने आ जाते हैं. दिल्ली की रैली में अखिलेश यादव राहुल गांधी के साथ खड़े होकर भाजपा को चुनौती देते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता उन्हीं अखिलेश यादव को उनकी राजनीतिक हैसियत का अहसास कराने में जुटे हैं. सवाल है कि आखिर यह कैसा गठबंधन है, जिसमें मंच साझा करते समय एकता और राजनीतिक जमीन पर अपनी ताकत दिखाते समय तकरार नजर आती है?
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दिल्ली में साथ, लखनऊ में एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी
अखिलेश यादव और राहुल गांधी दिल्ली में एक साथ दिखाई देते हैं, रैलियों में एक-दूसरे के समर्थन में खड़े होते हैं और भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई का दावा करते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश पहुंचते ही तस्वीर बदल जाती है. यहां सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच तल्खी सामने आने लगती है. अखिलेश यादव कांग्रेस को उसकी राजनीतिक हैसियत बताने से पीछे नहीं हटते तो कांग्रेस के नेता भी अपनी ताकत और हिस्सेदारी का दावा करते हैं. यानी दिल्ली में गठबंधन की मजबूती का संदेश देने वाले नेता लखनऊ में एक-दूसरे को राजनीतिक जमीन दिखाने में जुट जाते हैं.
यह विरोधाभास केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है. यह गठबंधन के भीतर मौजूद उस अविश्वास को भी उजागर करता है, जिसे साझा मंच और एक-दूसरे के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों के सहारे छिपाया नहीं जा सकता. जब दो सहयोगी दल एक-दूसरे की ताकत स्वीकार करने के बजाय अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने में जुटे हों, तो उनके बीच तालमेल की वास्तविक स्थिति समझना मुश्किल नहीं है.
अखिलेश की दुविधा, राहुल के साथ भी और अपनी पहचान की चिंता भी
इस पूरे घटनाक्रम में अखिलेश यादव की राजनीतिक दुविधा साफ दिखाई देती है. उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी गठबंधन के साथ अपनी मौजूदगी बनाए रखनी है तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे के रूप में अपनी स्थिति भी कायम रखनी है. लेकिन इन दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं दिख रहा. एक तरफ कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अधिक हिस्सेदारी चाहती है तो दूसरी तरफ सपा अपनी राजनीतिक जमीन और संगठनात्मक ताकत के आधार पर नेतृत्व का दावा करती है.
दिल्ली की रैलियों में राहुल गांधी के साथ अखिलेश यादव की मौजूदगी को गठबंधन की एकता के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन मंच पर और तस्वीरों में उनकी जगह को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होती हैं. कभी नेताओं की कतार में उनकी स्थिति चर्चा का विषय बनती है तो कभी राहुल गांधी के साथ गाड़ी की पिछली सीट पर बैठने की तस्वीर सवालों के घेरे में आ जाती है. ये तस्वीरें अपने आप में किसी की राजनीतिक हैसियत का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, लेकिन सपा के भीतर अपने नेता के सम्मान और पार्टी की राजनीतिक पहचान को लेकर बेचैनी जरूर सामने लाती हैं.
प्रियंका के सामने अखिलेश को पीएम बताने का नारा, सपा की बेचैनी का संकेत
सपा कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी इस रिश्ते की एक अलग कहानी बयां करती है. प्रियंका गांधी की मौजूदगी में अखिलेश यादव को अगला प्रधानमंत्री बताने वाला नारा केवल उत्साह का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व की दावेदारी को लेकर मौजूद बेचैनी का संकेत भी है. कांग्रेस के पास राहुल गांधी के रूप में अपना राष्ट्रीय चेहरा है तो समाजवादी पार्टी भी अखिलेश यादव को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका में देखना चाहती है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब दोनों दलों के पास अपने-अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे हैं, तो गठबंधन में नेतृत्व का वास्तविक केंद्र कौन होगा?
दरअसल, सपा कार्यकर्ताओं के लिए यह केवल राहुल और अखिलेश के बीच लोकप्रियता का सवाल नहीं है. यह समाजवादी पार्टी की राजनीतिक पहचान और उसके नेता के सम्मान से भी जुड़ा है. उत्तर प्रदेश में सपा अपनी भूमिका सबसे बड़ी विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित करना चाहती है, जबकि कांग्रेस भी राज्य में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में दोनों दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं एक ही जमीन पर टकराती नजर आती हैं.
गठबंधन की एकता का दावा, नेतृत्व पर स्पष्टता नदारद
सपा-कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों दल भाजपा के खिलाफ एकजुटता तो दिखाना चाहते हैं, लेकिन अपने-अपने राजनीतिक हितों से समझौता करने को तैयार नहीं दिखते. सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान हो या नेताओं की बयानबाजी, हर मुद्दे पर दोनों दलों के बीच अपनी ताकत दिखाने की होड़ नजर आती है. दिल्ली में राहुल गांधी के साथ खड़े होकर अखिलेश यादव भले ही विपक्षी एकता का संदेश देते हों, लेकिन उत्तर प्रदेश में उन्हें अपनी पार्टी की राजनीतिक हैसियत और नेतृत्व की दावेदारी भी बचाए रखनी है.
सवाल कांग्रेस और सपा के साथ आने का नहीं, बल्कि साथ आने के बाद एक-दूसरे को बराबरी का सम्मान देने का है. गठबंधन केवल रैलियों में एक-दूसरे का हाथ पकड़ने और मंच साझा करने से मजबूत नहीं होता. इसके लिए सीटों के बंटवारे, नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी जैसे अहम मुद्दों पर स्पष्ट सहमति जरूरी है. जब तक दोनों दल इन सवालों का जवाब नहीं देते, तब तक दिल्ली की गलबहियां और लखनऊ की तकरार के बीच यह गठबंधन अपनी ही सियासत में उलझा रहेगा. भाजपा से मुकाबले की बात करने वाले सपा-कांग्रेस के नेताओं को पहले यह तय करना होगा कि गठबंधन में बड़ा कौन है और आखिर किसकी शर्तों पर राजनीति चलेगी.
लेखक अभय पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.
Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
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