उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर अभी भी धुंधली है. सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत पूरी नहीं हुई है, लेकिन दोनों तरफ से निकल रहे तीखे बयान इस संभावित रिश्ते की मजबूती पर पहले ही सवाल खड़े कर रहे हैं. गठबंधन की सबसे मजबूत कड़ी सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि सम्मान और आपसी भरोसे से बनती है. जब दोनों दल एक-दूसरे को कमजोर मानकर बयान दे रहे हैं, तो रिश्ता बनने के बाद भी गांठ कितनी मजबूत रहेगी, यह गंभीर प्रश्न है.
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25 अक्तूबर को जब कांग्रेस की तरफ से 200 सीटों की मांग वाले पोस्टर लगाए गए तब सपा नेता और पूर्व मंत्री आईपी सिंह ने कांग्रेस पर बेहद तीखा निशाना साधा. उन्होंने लिखा-‘2022 की भांति अपने दम पर 403 सीटों पर लड़े अपाहित मृत्यु कांग्रेस, हाथ पसार कर भीख मांगने की क्या जरूरत है?’ हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पोस्ट डिलीट कर दी. लेकिन जो संदेश जाना था...वो चला गया.
पिछले कुछ महीनों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम सांसद-कांग्रेस के इमरान मसूद (सहारनपुर) और सपा की इकरा हसन (कैराना)-इस बहस के केंद्र में रहे हैं. इकरा हसन ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने की क्षमता केवल अखिलेश यादव में है और कांग्रेस अकेले कुछ खास हासिल नहीं कर पाएगी. जवाब में इमरान मसूद ने कहा कि गठबंधन नहीं करना है तो न करें, कांग्रेस किसी से भीख नहीं मांग रही है. उन्होंने बारात में ढोल बजाने और नाचने-गाने वालों का उदाहरण देकर सपा की तरफ से आ रहे बयानों को खारिज किया. यह तीखी बहस महज सीटों की सौदेबाजी नहीं, बल्कि वजूद और हैसियत की लड़ाई बन गई है.
इमरान मसूद ने सपा पर आरोप लगाया था कि पार्टी बोलने वाले मुस्लिम नेताओं को बर्दाश्त नहीं करती. उन्होंने आजम खान, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद का जिक्र करते हुए कहा कि सपा को 2024 में 37 सीटें कांग्रेस के साथ गठबंधन की वजह से मिलीं, वरना 2022 की स्थिति में ही रह जाती. सपा के नेताओं ने इसे गठबंधन धर्म के खिलाफ बताया.
शिवपाल यादव ने कांग्रेस को सीधा संदेश दिया कि इटावा, जसवंतनगर या सैफई में कांग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलेगा. इमरान मसूद ने शिवपाल को पार्टी के अंदर अप्रासंगिक करार दिया. सहारनपुर में दिशा की सरकारी बैठक में सपा विधायक आशु मलिक और इमरान मसूद के बीच सार्वजनिक नोकझोंक हुई, जिसमें इकरा हसन हतप्रभ बैठी रहीं. इमरान मसूद ने अक्टूबर तक सीट बंटवारे के फैसले का अल्टीमेटम दिया और 150 से अधिक सीटों की मांग रखी, जबकि सपा की तरफ से विजेयता को आधार बनाने की बात कही गई.
ये बयान सिर्फ व्यक्तिगत नहीं हैं. इनमें एक-दूसरे की क्षमता पर सीधा सवाल है. एक ओर सपा के नेता कह रहे हैं कि उनके बिना कांग्रेस का कोई खास वजूद नहीं, दूसरी ओर कांग्रेस के नेता दावा कर रहे हैं कि बिना उनके सपा सत्ता के करीब नहीं पहुंच सकती. जब गठबंधन के दोनों दल एक-दूसरे को इतना कमजोर समझ रहे हैं, तो वे किस दम पर एकजुट मोर्चा खड़ा करेंगे? तीखे बयान और निजी हमले तल्खी दूर करने के बजाय उसे और गहरा कर रहे हैं.
2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन उस सफलता के बाद भी आपसी विश्वास मजबूत नहीं हो सका. गठबंधन की राजनीति में सीटें महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन अगर सम्मान और भरोसा नहीं है तो सीटों का समझौता भी कागजी रह जाता है. जमीनी कार्यकर्ता और मतदाता ऐसे बयानों को देखते हैं. जब सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को अपमानित करते हैं, तो विपक्षी मोर्चा कमजोर दिखता है और सत्ताधारी दल को फायदा होता है.
सवाल यह है कि शीर्ष नेतृत्व-अखिलेश यादव और राहुल गांधी-इन बयानों को कितना नियंत्रित कर पाएंगे. जब तक दोनों तरफ से अनुशासन और आपसी सम्मान की भाषा नहीं अपनाई जाती, तब तक रिश्ता बनने के बाद भी गांठ बेहद कमजोर रहेगी. गठबंधन की मजबूती सीटों से नहीं, बल्कि उस भरोसे से आती है जिसमें दोनों दल एक-दूसरे की ताकत को स्वीकार करें, न कि कमजोरी को उजागर करके. अगर यह भरोसा नहीं बना, तो अनिश्चितता बनी रहेगी और विपक्षी एकता का दावा खोखला साबित होगा. राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत अब पहले से कहीं ज्यादा है.
लेखक रामबाबू तिवारी, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज में शोध छात्र हैं तथा सामाजिक मुद्दों और समसामयिक विषयों पर लिखते हैं.
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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