Opinion: अखिलेश यादव का पेरिस में प्रदर्शन को समर्थन… लोकतंत्र में ‘तख्तापलट के प्रयास’ को ईंधन देते सपा प्रमुख

यूपी तक

• 05:39 PM • 21 Oct 2026

फ्रांस के पेरिस में हुए हिंसक प्रदर्शनों और रेजीम चेंज की वकालत को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के रुख पर उठे सवाल. जानिए लोकतंत्र में हिंसा और संवैधानिक विरोध के बीच के फर्क का पूरा विश्लेषण.

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लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में विरोध का अधिकार अंतर्समाहित है, लेकिन वह अधिकार मर्यादाओं से बंधा होता है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, “अहिंसा के बिना कोई भी राजनीतिक आंदोलन सार्थक नहीं हो सकता. विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, पर वह देश और संविधान के विरुद्ध नहीं हो सकता.” लोकतांत्रिक प्रदर्शन कभी देशविरोधी नहीं होते. वे व्यवस्था को सुधारने, नीतियों की आलोचना करने और जनता की आवाज पहुंचाने का साधन होते हैं. जब विरोध हिंसा, अराजकता या असंवैधानिक सत्ता-परिवर्तन का रूप ले ले, तो वह लोकतंत्र की ताकत नहीं, उसकी कमजोरी बन जाता है. लोकतंत्र की इसी ताकत और कमजोरी की बारीक रेखा को यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया अखिलेश यादव नहीं समझ पा रहे हैं. अखिलेश ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों का समर्थन किया, लेकिन ऐसा करते समय उन्होंने पूरे परिदृश्य को नजरअंदाज कर दिया.

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फ्रांस की राजधानी पेरिस में हाल के दिनों में महंगाई, शिक्षा और जीवन-यापन की लागत को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन हिंसक रूप ले चुके हैं. आगजनी, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट कहा कि जो लोग लोकतांत्रिक सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें जवाबदेह बनाया जाएगा. प्रधानमंत्री सेबस्टियन लेकोर्नु ने हिंसा के लिए “अल्ट्रा-लेफ्ट” और अतिवादी समूहों को जिम्मेदार ठहराया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन घटनाओं को अवैध घुसपैठ और चरमपंथी तत्वों से जोड़ा, जबकि विपक्षी नेता मरीन ले पेन ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया. इन प्रदर्शनों में ‘ब्लैक ब्लॉक’ जैसे अराजकतावादी समूह, अति-वामपंथी संगठन और फिलिस्तीन समर्थक तत्व सक्रिय देखे गए. शांतिपूर्ण जनाक्रोश और संगठित हिंसा के बीच अंतर करना जरूरी है. किसी आंदोलन को केवल जनाक्रोश मानकर उसकी वैचारिक धाराओं और तरीकों की अनदेखी उचित नहीं.

हैरानी है कि फ्रांस के इन हिंसक प्रदर्शनों को पश्चिम में तो आलोचना का सामना करना पड़ रहा है लेकिन भारत में इसके समर्थन में आवाजें गूंज रही हैं. भारत में इस बहस को और गंभीर बनाते हैं बांग्लादेश और नेपाल जैसे उदाहरण. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा ने बांग्लादेश के छात्र आंदोलन को प्रेरणा बताया और “लाल सलाम” देते हुए कहा कि भारत में जेन-Z आंदोलन की शुरुआत वहीं से हुई.

हिंसा के बल पर रेजीम बदलना खतरनाक

वकील प्रशांत भूषण ने खुलेआम कहा, “हां, हम रेजीम चेंज चाहते हैं. इसमें गलत क्या है? हम इसे किसी भी तरह हासिल कर लेंगे.” जबकि सच्चाई यह है कि रेजीम चेंज का मतलब है चुनावी प्रक्रिया से इतर सड़क, दबाव और अस्थिरता के जरिए सरकार या व्यवस्था बदलना. यह खतरनाक है क्योंकि यह संस्थाओं को कमजोर करता है, हिंसा को वैधता देता है और अल्पसंख्यकों तथा आम नागरिकों पर लंबे समय तक असर डालता है. बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के बाद जो अस्थिरता और हिंसा देखी गई, उसे भारत में दोहराने की कोशिश लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकती. भारत में असहमति चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से व्यक्त होनी चाहिए, न कि हिंसक मॉडल के जरिए.

हिंसक मॉडल को हवा दे रहे अखिलेश

अखिलेश यादव का पेरिस के हिंसक प्रदर्शनों के समर्थन का रुख इसी कसौटी पर सवाल खड़े करता है. वह यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और एक प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया हैं. उनकी जिम्मेदारी केवल किसी आंदोलन के समर्थन में खड़े होने तक सीमित नहीं है. उन्हें यह भी देखना होगा कि जिस आंदोलन का वह समर्थन कर रहे हैं, उसकी विचारधारा क्या है, उसके तरीके क्या हैं और उसका संदेश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कितना उचित है. विपक्षी नेता के रूप में विदेश के हिंसक प्रदर्शनों का समर्थन करना संविधान की बारीक रेखा को लांघना है. संविधान विरोध का अधिकार देता है, लेकिन हिंसा या असंवैधानिक सत्ता-परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता. 

लोकतंत्र में बदलाव मतपेटी से होता है, सड़क की हिंसा से नहीं. विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह शांतिपूर्ण विरोध, चुनावी प्रतिस्पर्धा और संवैधानिक सुधारों तक अपना समर्थन सीमित रखे. जब कोई पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख इस अंतर को धुंधला करता है, तो वह न केवल अपनी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाले संदेश को भी बल देता है.

हिंसा को नहीं बनाना चाहिए प्रेरणा

भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं. सरकार की आलोचना हो सकती है और जनता चुनाव में फैसला सुना सकती है. लेकिन हिंसा को प्रेरणा और अराजकता को परिवर्तन का माध्यम बताने वाली राजनीति अंततः उन्हीं संस्थाओं को नुकसान पहुंचाती है, जिन पर लोकतंत्र टिका है. विपक्ष को इस बात की स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए कि उनका समर्थन शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों तक सीमित है. यही लोकतंत्र की रक्षा है, और यह जिम्मेदारी केवल सत्ता पक्ष की नहीं, विपक्ष की भी है.

(लेखकडॉ. अभय पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)