Opinion: दिल्ली में प्रदर्शन के मंच पर भी सपा-कांग्रेस अलग-अलग… न तालमेल, न साझा रणनीति

यूपी तक

14 Oct 2026 (अपडेटेड: 14 Oct 2026, 11:37 AM)

Opinion: यूपी में गठबंधन और सीट शेयरिंग को लेकर सपा-कांग्रेस में बढ़ता तनाव दिल्ली के प्रदर्शन में भी दिखाई दे रहा है. राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक श्रेय की होड़ से लेकर सांसदों की गैरमौजूदगी तक, दोनों दलों के बीच समन्वय की कमी ने 2027 के चुनाव से पहले विपक्षी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

Rahul Gandhi and Akhilesh Yadav

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Opinion: यूपी में गठबंधन और सीट शेयरिंग को लेकर सपा-कांग्रेस में बढ़ता तनाव दिल्ली के प्रदर्शन में भी दिखाई दे रहा है. राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक श्रेय की होड़ से लेकर सांसदों की गैरमौजूदगी तक, दोनों दलों के बीच समन्वय की कमी ने 2027 के चुनाव से पहले विपक्षी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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दिल्ली में प्रदर्शन, लेकिन एकजुटता का संदेश नदारद

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रिश्तों में बढ़ती खींचतान अब दिल्ली के प्रदर्शन में भी चर्चा का विषय बन गई है. जिस मंच से बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता का संदेश जाना चाहिए था, वहां दोनों दलों के बीच तालमेल की कमी दिखाई दे रही है. राहुल गांधी और अखिलेश यादव की राजनीतिक सक्रियता के बावजूद दोनों दलों के बीच साझा रणनीति की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आ रही. प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक श्रेय को लेकर खींचतान और उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे पर जारी बयानबाजी ने इस दूरी को और उजागर किया है.

सपा और कांग्रेस के बीच यह स्थिति केवल किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है. दोनों दल उत्तर प्रदेश में एक-दूसरे के सहयोग को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं. कांग्रेस राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, जबकि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा अपनी प्रमुख विपक्षी भूमिका बनाए रखना चाहती है. यही अंतर गठबंधन के भीतर प्रतिस्पर्धा की वजह बन रहा है.

दिल्ली के प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से आयोजित लंच में सपा सांसदों की गैरमौजूदगी ने भी चर्चा को बढ़ाया. निमंत्रण और समन्वय को लेकर उठे सवालों ने दोनों दलों के रिश्तों पर ध्यान खींचा. किसी एक कार्यक्रम में शामिल नहीं होना अपने आप में गठबंधन में दरार का प्रमाण नहीं है, लेकिन जब पहले से सीट शेयरिंग को लेकर तनाव हो, तब ऐसी घटनाएं राजनीतिक संदेश जरूर देती हैं. सवाल यह है कि जब दोनों दल साझा कार्यक्रमों में ही बेहतर तालमेल नहीं दिखा पा रहे, तो चुनावी मैदान में संयुक्त रणनीति कैसे बनाएंगे?

सीटों की खींचतान और श्रेय की राजनीति

सपा-कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल है. विधानसभा चुनाव में कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, किस दल को कितनी भूमिका मिलेगी और चुनावी अभियान का नेतृत्व किस तरह होगा-ये ऐसे सवाल हैं जिन पर समय रहते सहमति जरूरी है. लेकिन जब सीट शेयरिंग पर सार्वजनिक बयानबाजी जारी रहे और प्रदर्शन के बीच भी इसी मुद्दे की चर्चा हो, तो यह संकेत मिलता है कि गठबंधन के भीतर विश्वास और समन्वय को मजबूत करने की जरूरत है.

राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों अपनी-अपनी पार्टी के प्रमुख राजनीतिक चेहरे हैं. राहुल गांधी कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की प्रभावशाली ताकत बनाए रखना चाहते हैं, जबकि अखिलेश यादव के लिए उत्तर प्रदेश में सपा का वर्चस्व और राजनीतिक प्रभाव अहम है. दोनों की राजनीतिक जरूरतें अपनी जगह हैं, लेकिन गठबंधन में सफलता तभी मिलेगी, जब वे व्यक्तिगत और दलगत प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर साझा लक्ष्य पर काम करेंगे.

राजनीतिक श्रेय की प्रतिस्पर्धा किसी भी गठबंधन को कमजोर कर सकती है. यदि हर आंदोलन में यह सवाल प्रमुख हो जाए कि किस दल को अधिक फायदा मिला और किस नेता की भूमिका ज्यादा दिखाई दी, तो जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. विपक्षी एकता का मतलब केवल एक मंच पर मौजूद होना नहीं, बल्कि साझा मुद्दों पर एक जैसी रणनीति और एक-दूसरे की भूमिका के प्रति भरोसा दिखाना भी है.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को चुनौती देने के लिए सपा और कांग्रेस को केवल गठबंधन की घोषणा से आगे बढ़ना होगा. सीटों का समय पर बंटवारा, उम्मीदवारों के चयन में तालमेल, बूथ स्तर पर समन्वय और साझा प्रचार अभियान किसी भी गठबंधन की सफलता के लिए जरूरी हैं. बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विपक्षी दलों के बीच सीटों और नेतृत्व को लेकर सामने आने वाली प्रतिस्पर्धा भी बताती है कि बीजेपी का विरोध करना अपने आप में मजबूत गठबंधन की गारंटी नहीं है.

सपा और कांग्रेस को यह समझना होगा कि उनकी आपसी खींचतान का राजनीतिक लाभ बीजेपी उठा सकती है. यदि दोनों दल अपने-अपने प्रभाव और हिस्सेदारी की लड़ाई में उलझे रहे, तो संयुक्त विपक्ष का संदेश कमजोर पड़ेगा. इसके उलट, यदि वे मतभेदों को बातचीत से सुलझाकर साझा रणनीति बनाते हैं, तो गठबंधन अपनी राजनीतिक क्षमता को बेहतर तरीके से सामने रख सकता है.

दिल्ली के प्रदर्शन ने सपा और कांग्रेस के सामने एक स्पष्ट चुनौती रख दी है-साथ दिखना और साथ चलना अलग-अलग बातें हैं. 2027 में बीजेपी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए दोनों दलों को सीट शेयरिंग, नेतृत्व और राजनीतिक श्रेय की खींचतान से ऊपर उठना होगा. अन्यथा गठबंधन का दावा तो रहेगा, लेकिन जमीन पर उसकी एकजुटता बार-बार सवालों के घेरे में आती रहेगी.


(लेखक डॉ. शब्द प्रकाश, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
 

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)