Opinion: अयोध्या इन दिनों फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव गुरुवार को शहर पहुंचे थे. पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के पैतृक आवास पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में उनकी मौजूदगी अपने आप में खबर थी, पर जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, उन्होंने यात्रा को एक अलग अर्थ दे दिया. पीतांबरी वस्त्र, एक ओर त्रिशूल, दूसरी ओर सुदर्शन चक्र. मंच पर संतों के बीच यह दृश्य ऐसा था, मानो कोई नेता श्रद्धा के क्षण में नहीं, बल्कि एक तैयार छवि के साथ खड़ा हो. प्रश्न यह नहीं कि कोई नेता कथा में क्यों गया? प्रश्न यह है कि हाथ में थामे प्रतीक किस परंपरा की निरंतरता हैं, और किस चुनावी गणना का हिस्सा?
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तस्वीर का इरादा साफ पढ़ा जा रहा है. अयोध्या वह भूमि है जहां राम मंदिर के बाद सियासत की भाषा बदल चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सार्वजनिक छवि में सनातन प्रतीक किसी एक कार्यक्रम की सजावट नहीं रहे. मंदिर, तीर्थ, संत-समागम और सांस्कृतिक प्रतीक उनके राजनीतिक संवाद का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं. अखिलेश यादव का अयोध्या वाला अंदाज उसी छवि के निकट खड़े होने की कोशिश लगता है. हाथ में चक्र और त्रिशूल इसलिए नहीं कि पार्टी की विचारधारा में ये प्रतीक वर्षों से केंद्र में रहे हों, बल्कि इसलिए कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक नया संदेश देना है. संदेश यह कि समाजवादी पार्टी अब केवल अपने पारंपरिक समीकरण की पार्टी नहीं, वह सनातन के मैदान में भी उतर सकती है.
इरादा समझ में आता है. अयोध्या उपचुनाव के बाद सपा ने यह पढ़ लिया है कि राम और सांस्कृतिक प्रतीकों से दूरी बनाए रखना उसके लिए महंगा पड़ सकता है. पीडीए का नारा अपने वोट-बैंक को साधने के लिए है, पर अयोध्या और आसपास के आस्थावान मतदाता उस नारे के बाहर खड़े हैं. भागवत कथा, पीतांबरी और सुदर्शन चक्र उसी खाई को पाटने का प्रयास है. अखिलेश यादव ने मंच से मुख्यमंत्री को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती भी दी. प्रतीक और चुनौती दोनों एक ही रणनीति के दो सिरे हैं. एक ओर दिखाना है कि राम की नगरी में सपा भी उपस्थित है, दूसरी ओर सत्ताधारी दल को उसके अपने मैदान में घेरना है.
दिक्कत प्रतीक उठाने में नहीं, प्रतीक और राजनीति के बीच की दूरी में है. समाजवादी पार्टी की लंबी राजनीति राम मंदिर आंदोलन के विरोध, धर्मनिरपेक्षता की एक खास व्याख्या और बाद के वर्षों में पीडीए की सामाजिक गोलबंदी पर टिकी रही है.
मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के कार्यकाल तक पार्टी की भाषा में सनातन प्रतीक सम्मान के विषय कम, राजनीतिक प्रतिद्वंद्व के विषय अधिक रहे. एक दिन अयोध्या के मंच पर चक्र और त्रिशूल थाम लेने से वह इतिहास मिट नहीं जाता. मतदाता तस्वीर देखता है, पर वह तस्वीर को अकेले नहीं पढ़ता. वह यह भी याद रखता है कि यही नेतृत्व कब मंदिर को राजनीतिक मुद्दा मानकर किनारे करता रहा, और कब सांस्कृतिक प्रतीकों को चुनावी लाभ के हिसाब से अपनाता या छोड़ता रहा.
इसलिए यह दांव जुड़ता हुआ नहीं दिखता. जो नेता वर्षों तक एक विचार पर खड़ा रहे, उसकी अचानक बदली मुद्रा को श्रद्धा कम, मंच-प्रबंधन अधिक पढ़ा जाता है. अखिलेश यादव का यह प्रयास साफ संदेश देता है कि यह आस्था का क्रमिक विस्तार नहीं, चुनावी स्टंट है. स्टंट इसलिए कि प्रतीक कार्यक्रम की अवधि तक हैं, पार्टी के घोषणापत्र, संगठन की भाषा और स्थानीय कार्यकर्ताओं के रोजमर्रा के संवाद तक नहीं पहुंचे हैं. जिस दिन कथा समाप्त होती है, पार्टी फिर अपने पुराने समीकरण पर लौट आती है. मतदाता इस आवाजाही को पहचानता है. वह प्रतीक का अपमान नहीं करता, पर प्रतीक के राजनीतिक उपयोग पर सवाल जरूर करता है.
तुलना यहां अनिवार्य है. प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की राजनीति में सनातन प्रतीक किसी सीजन की पोशाक नहीं रहे. काशी, अयोध्या, मथुरा और तीर्थ-नगरों को लेकर उनका संवाद वर्षों का है. उस संवाद से सहमत हुआ जा सकता है या असहमत, पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रतीक केवल मतदान की तिथि के आसपास उठाए गए. विचारधारा और छवि के बीच यहां एक निरंतरता है. अखिलेश यादव की अयोध्या वाली तस्वीर में वही निरंतरता गायब है. कॉपी करने की स्टाइल इसलिए कमजोर पड़ती है, क्योंकि मूल में जो बात आस्था और राजनीति के लंबे साथ से बनी है, नकल में वह एक दिन के आयोजन से नहीं बनती.
राजनीति में प्रतीक बदलना अपराध नहीं. पार्टियां अपने वोट-बैंक के बाहर भी जाती हैं, और जानी भी चाहिए. पर प्रतीक तभी विश्वसनीय होते हैं जब उनके पीछे आचरण, भाषा और संगठन की दिशा साथ चलें. अयोध्या में त्रिशूल और चक्र के साथ खड़े होना एक तस्वीर रचता है. वह तस्वीर वायरल भी होती है. पर चुनाव तस्वीर से नहीं, विश्वास से जीते जाते हैं. विश्वास यह पूछता है कि कल जब कथा का मंच हट जाएगा, तब पार्टी की राजनीति किस प्रतीक के साथ खड़ी होगी. अभी जो उत्तर तस्वीर दे रही है, वह उत्तर से अधिक संकेत है. और संकेत यह है कि जीत की तलाश में छवि उधार ली जा सकती है, विरासत नहीं.
(लेखक, डॉ. अश्वनी अवस्थी, भूगोल विषय में पीएचडी हैं. चित्रकूट में वर्ष 2019 से 2024 तक दो कार्यकाल में भाजपा के जिला महामंत्री का दायित्व निभा चुके हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों में गहरी रुचि है.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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