Opinion: रामनगरी अयोध्या में पवित्र सरयू के तट पर जब लाखों दीये एक साथ झिलमिलाते हैं, तो यह दृश्य केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के अंतर्मन को रोशन करने वाला अलौकिक अनुभव बन जाता है. दीपोत्सव-2026 भी एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय है, जहां श्री राम की पावन नगरी अयोध्या विश्व पटल पर 'सांस्कृतिक संगम' के सबसे बड़े और देदीप्यमान केंद्र के रूप में उभरी है. यह आयोजन आस्था की सीमाओं से विस्तार लेकर, देश-दुनिया के कलाकारों के लिए एक ऐसा भव्य वैश्विक मंच बन गया है, जहां कला सीधे परमात्मा से संवाद करती है. विभिन्न देशों, संस्कृतियों और भाषाओं से जुड़े कलाकार जब राम की पैड़ी पर अपनी कला, संगीत, नृत्य और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से रामकथा के आदर्शों को जीवंत करते हैं, तो पूरी दुनिया एक ही सुर में बंधी नजर आती है. यह इस बात का उद्घोष है कि श्री राम केवल एक भूभाग के नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के हैं.
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अयोध्या और राम के प्रति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आस्था और सोच का जीवंत रूप है यह दीपोत्सव, जो इस बार दशक मनाने जा रहा है. दसवां पड़ाव किसी भी यात्रा में केवल एक संख्या नहीं होता. वह ठहरकर पीछे देखने और आगे की राह तय करने का क्षण होता है. एक दशक पहले जो संकल्प अयोध्या के घाटों को दीपों से सजाने के रूप में शुरू हुआ था, आज वह ऐसे वैश्विक सांस्कृतिक पर्व में ढल चुका है, जिसकी प्रतीक्षा देश ही नहीं, दुनिया के अनेक कोनों में होती है. यहां दीपक की लौ के साथ भाषाओं की मिठास, वेशभूषाओं के रंग, लोकधुनों की गूंज और अनेक देशों की श्रद्धा एकाकार होगी तो उत्सव अयोध्या की सीमाओं से निकलकर विश्व की सांस्कृतिक चेतना के पर्व के रूप में बढ़ता दिखाई देगा.
इस वर्ष का सबसे उल्लेखनीय पक्ष है पांच देशों के कलाकारों द्वारा अपनी-अपनी परंपराओं और शैलियों में रामलीला का मंचन. दक्षिण अफ्रीका की दो टीमों के साथ श्रीलंका, नेपाल, लाओस और थाईलैंड के कलाकार अयोध्या की पावन भूमि पर श्रीराम की कथा अपने ढंग से प्रस्तुत करेंगे. फिलीपींस, थाईलैंड और रूस के कलाकारों की भागीदारी की तैयारियां भी जारी हैं. यह तथ्य स्वयं कहता है कि भगवान राम किसी एक भूगोल, भाषा या समुदाय की धरोहर नहीं हैं. वह उस मानवीय आदर्श के प्रतीक हैं, जिसे हर संस्कृति ने अपने स्वर में पहचाना, अपनाया और गाया है.
रामकथा की यात्रा दुनिया के अनेक देशों में गूंजती है. दक्षिण-पूर्व एशिया के मंचों पर रामायण सदियों से नृत्य, नाट्य और कठपुतलियों में सांस लेती रही है. थाईलैंड, लाओस, नेपाल व श्रीलंका की भूमि रामायण की स्मृतियों से सींची हुई है. यहां दूसरे देशों से आ रही रामलीलाओं के पात्रों के नाम, परिधान और प्रस्तुति की शैली भले भिन्न हों, कथा का मूल स्वर एक ही है और वह है मर्यादा, त्याग, सत्य और कर्तव्य की विजय. ये अलग-अलग धाराएं अयोध्या में आकर मिलेंगी. जैसे अनेक नदियां एक ही सागर की ओर प्रवाहित होती हैं, वैसे ही ये सभी प्रस्तुतियां उसी एक रामत्व की ओर बहती दिखेंगी.
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रकृति है. हमारी परंपरा ने कभी यह आग्रह नहीं रखा कि सत्य केवल एक रूप में कहा जाए. इसीलिए एक ही रामकथा सैकड़ों रूपों में कही और सुनी गई है. दीपोत्सव का यह अंतरराष्ट्रीय स्वरूप उसी उदार दृष्टि का आधुनिक विस्तार है. जब कोई अफ्रीकी कलाकार अपनी लय में रावण-वध का मंचन करेगा, या कोई लाओटियन नर्तक अपनी भंगिमाओं में सीता की पीड़ा को उकेरेगा, तब दर्शक अनुभव करेंगे कि करुणा और धर्म की भाषा को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती. वह सीधे हृदय से हृदय तक पहुंचती है.
देश के भीतर की विविधता इस आयोजन को उतना ही समृद्ध करेगी. असम, बंगाल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और केरल के कलाकार रामचरित्र और रामकथा पर आधारित प्रस्तुतियां देंगे. भारत का हर अंचल, हर राज्य राम को अपने भाव में देखता है. पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक फैली यह विविधता उस एकता की साक्षी है, जिसे राम के नाम ने सदियों से एक सूत्र में पिरोए रखा है. इस अर्थ में अयोध्या का मंच एक साथ लघु भारत भी होगा और लघु विश्व भी. संस्कृति विभाग की योजना के अनुसार छह लघु, चार मध्यम और दो दीर्घ मंच तैयार किए जाएंगे, जहां लगभग 2500 भारतीय और विदेशी कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे. यह संख्या इस विश्वास का भी प्रमाण है कि कला को मंच देना समाज की सबसे सार्थक सेवाओं में से एक है. बारह मंचों पर एक साथ प्रवाहित संगीत, नृत्य और रंगमंच की धारा कुछ दिनों के लिए अयोध्या को कला की जीवंत राजधानी बनाएगी.
राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की पहचान में एक नया अध्याय जुड़ा है. अब यह नगरी केवल तीर्थ नहीं, सांस्कृतिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बनकर उभरी है. तीर्थयात्री यहां दर्शन के लिए आता है, जबकि सांस्कृतिक यात्री अनुभव के लिए. वह कथा सुनना चाहता है, परंपराओं को समझना चाहता है और अपने भीतर कुछ नया महसूस करना चाहता है. दीपोत्सव का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यहां दो भावों को जोड़ता है- श्रद्धा को अनुभव से और अनुभव को समझ से. इस सांस्कृतिक संगम के आध्यात्मिक संदेश को भी समझना जरूरी है. दीपक की विशेषता यह है कि वह स्वयं जलकर दूसरों को उजाला देता है. उसकी लौ से हजार दीप जल उठें तब भी उसका प्रकाश घटता नहीं. संस्कृतियों का संवाद भी ऐसा ही है. जब हम दूसरों की परंपराओं को सम्मान के साथ अपने मंच पर स्थान देते हैं, तो हमारी अपनी पहचान और उजली हो उठती है. रामकथा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है कि मर्यादा केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, सामूहिक जीवन की आधारशिला है. राम ने वनवास में भी निषादराज को गले लगाया, शबरी के जूठे बेरों को सम्मान दिया और वानर-भालुओं को साथ लेकर धर्म की स्थापना की. उनका संपूर्ण जीवन समावेश और सहअस्तित्व का उदाहरण है. दीपोत्सव का वैश्विक रूप उसी आदर्श की समकालीन अभिव्यक्ति है.
संस्कृति वह सेतु है, जो राजनीतिक सीमाओं को लांघकर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है. रामायण सदियों से यह सेतु बनाता आया है, और अयोध्या का दीपोत्सव उसे और सुदृढ़ करने का अवसर है. यहां आने वाला दर्शक चाहे किसी भी देश या भाषा का हो, उसे यह अनुभूति अवश्य होगी कि प्रकाश का कोई देश नहीं होता और धर्म की स्थापना का संघर्ष हर युग और हर भूमि का साझा संघर्ष है. दीपोत्सव-2026 का एक बड़ा संदेश यह भी है कि भारत अपनी परंपराओं को संग्रहालय की वस्तु नहीं, बहुआयामी संवाद का माध्यम मानता है.
लेखक पंडित अविजीत चक्रवर्ती, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथक नृत्य विशेषज्ञ एवं फिजी में भारत के सांस्कृतिक राजदूत
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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