Opinion: उत्तर प्रदेश विधान परिषद के 11 सीटों के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है. जहां कांग्रेस की ओर से इन नतीजों को इंडिया गठबंधन की सफलता बताया जा रहा है, वहीं सपा के नेताओं के बयानों से स्पष्ट हो रहा है कि पार्टी अपनी जीत का श्रेय किसी अन्य दल को साझा करने को तैयार नहीं है. सपा सांसद रुचि वीरा और विधायक रविदास मेहरोत्रा के हालिया बयान इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं. दोनों नेताओं ने कांग्रेस को उसकी राजनीतिक जमीन का अहसास कराते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश में सपा ही प्रमुख विपक्षी ताकत है.
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रुचि वीरा और रविदास मेहरोत्रा का साफ संदेश
रुचि वीरा ने एमएलसी चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाजपा को छह और सपा को पांच सीटों पर मिली जीत महज शुरुआत है. उन्होंने सीट बंटवारे के मुद्दे पर कहा कि गठबंधन और सीट शेयरिंग का अंतिम निर्णय सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी करेंगे. साथ ही उन्होंने कांग्रेस को सलाह दी कि उसे उन सीटों की मांग करनी चाहिए जहां उसके पास अच्छे उम्मीदवार हों. जहां उम्मीदवार नहीं हैं या जीत की संभावना नहीं है, वहां सीट मांगने का कोई अर्थ नहीं. रविदास मेहरोत्रा ने भी इसी लाइन पर कहा है कि सपा उत्तर प्रदेश में भाजपा का एकमात्र विकल्प है और अकेले सरकार बनाने में सक्षम है. उन्होंने कांग्रेस की ओर से 200 सीटों की मांग की खबरों पर स्पष्ट किया कि ऐसी सूची किसने और किसे सौंपी, यह स्पष्ट किया जाए. अंतिम निर्णय अखिलेश यादव का होगा. मेहरोत्रा ने कांग्रेस के लिए लगभग 60-65 सीटों की संभावना जताते हुए कहा कि सीटें जीत की संभावना के आधार पर तय होनी चाहिए. 2022 में कांग्रेस के मात्र दो विधायक बने थे, जबकि सपा के 110 से अधिक. ऐसे में कांग्रेस को गठबंधन धर्म का पालन करना होगा.
क्रेडिट और सीट शेयरिंग में सपा का अपर हैंड
इन बयानों से स्पष्ट है कि सपा बिहार में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए उत्तर प्रदेश की जीत का श्रेय खुद लेना चाहती है. सपा बिल्कुल नहीं चाहती कि उसकी सफलता का क्रेडिट कोई अन्य दल ले. सीट शेयरिंग में भी वह अपने अपर हैंड को और मजबूती से प्रदर्शित करेगी. कांग्रेस की ओर से नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने एमएलसी परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए इन्हें 2027 का सेमीफाइनल बताया और वाराणसी में भाजपा की हार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट पर जनादेश करार दिया. उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर पढ़े-लिखे मतदाताओं ने गठबंधन के पक्ष में फैसला दिया है. कांग्रेस ने एमएलसी चुनावों में अंतिम समय में उम्मीदवार नहीं उतारकर सपा को समर्थन दिया था, जिसे सहयोग का संकेत माना गया.
कांग्रेस की बधाई और संभावित पटलवार
हालांकि दिलचस्प पहलू यह है कि सपा की जीत पर कांग्रेस नेताओं की बधाई मिलने के बावजूद अपेक्षित उत्तर नहीं मिल रहा है. यदि सपा की ओर से तीखे शब्दबाण चलते रहे तो कांग्रेस की ओर से भी पटलवार हो सकता है. कांग्रेस के नेता अतीत में भी सपा पर निशाना साधते रहे हैं. सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ने कहा था कि अखिलेश यादव की सक्रियता का कोई अर्थ नहीं, गठबंधन हो तो ठीक, अन्यथा कांग्रेस अपनी तैयारी जारी रखेगी. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सपा के गढ़ों जैसे इटावा और मैनपुरी में कांग्रेस को मजबूत करने की बात कही थी. 2017 के गठबंधन में भी रविदास मेहरोत्रा ने कांग्रेस पर गठबंधन धर्म न निभाने का आरोप लगाया था. ऐसे उदाहरण बताते हैं कि दोनों दलों के बीच तनाव नया नहीं है.
गठबंधन की परीक्षा का नया दौर
एमएलसी परिणामों के बाद सपा का यह रुख संकेत देता है कि साइकिल चिह्न पंजे को उसकी सियासी हैसियत का अहसास कराने में लगा है. गठबंधन की सफलता के लिए दोनों दलों को अपनी-अपनी सीमाओं का ध्यान रखना होगा. यदि आक्रामकता बढ़ी तो यह विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की एकता को प्रभावित कर सकती है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह नया दौर दोनों दलों की रणनीति और आपसी समन्वय की परीक्षा करेगा.
(लेखक डॉ. सुनील कुमार मिश्र, अतर्रा पी.जी. कॉलेज, बांदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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