Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं. हाल ही में लखनऊ में हुए ‘पीडीए संकल्प शिक्षक-अभ्यर्थी संवाद’ में उन्होंने सरकारी नौकरियों की गारंटी देने, भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और पेपर लीक पर रोक लगाने की बात कही. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह निश्चित तौर पर एक बड़ा राजनीतिक वादा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ चुनावी घोषणा है या इसके पीछे ऐसी ठोस कार्ययोजना भी है, जिस पर अभ्यर्थी और युवा भरोसा कर सकें?
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यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अखिलेश यादव खुद 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनके कार्यकाल में सरकारी भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था को लेकर कई विवाद सामने आए थे. ऐसे में आज जब वही नेतृत्व पेपर लीक रोकने और भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की गारंटी दे रहा है, तो उसके पुराने रिकॉर्ड को भी कसौटी पर रखना स्वाभाविक है.
जिस व्यवस्था पर सवाल उठे, उसका हिसाब कौन देगा?
अखिलेश सरकार के कार्यकाल में कई भर्ती परीक्षाओं और सरकारी नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे. भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता और पक्षपात के आरोप लगे. सरकारी नौकरियों में एक खास जाति और समुदाय को प्राथमिकता दी गई. भर्ती व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हुए.
उस दौर की नाराजगी का एक प्रतीक वह तस्वीर भी बनी, जो लंबे समय तक राजनीतिक बहस का हिस्सा रही. लोक सेवा आयोग के बाहर प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने आयोग के नाम के साथ ‘यादव आयोग’ लिखकर अपना विरोध जताया था. यह तस्वीर अपने आप में बताती है कि उस दौर में भर्ती प्रक्रिया को लेकर अभ्यर्थियों के बीच किस तरह का असंतोष था.
यही वजह है कि अखिलेश यादव के मौजूदा वादे के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है- जिस भर्ती व्यवस्था को लेकर उनके कार्यकाल में ही गंभीर सवाल उठे थे, उसे ठीक करने की गारंटी अब किस आधार पर दी जा रही है?
‘नकल’ की राजनीति का पुराना संदर्भ भी मौजूद
परीक्षाओं में नकल और पेपर लीक को लेकर आज अखिलेश यादव बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं. लेकिन सपा शासन के दौर में नकल के सवाल पर सरकार की नीति को लेकर भी बहस हुई थी.
उत्तर प्रदेश में नकल रोकने के लिए 1992 में कानून बनाया गया था. बाद में इस कानून को लेकर राजनीतिक रुख बदला और उसे हटाने की पहल को लेकर समाजवादी पार्टी पर सवाल उठे. सपा के चुनावी घोषणापत्र में भी इस संबंध में किए गए वादे का उल्लेख रहा है. ऐसे में नकल के खिलाफ सख्त व्यवस्था की बात करने से पहले सपा के पुराने रुख को भी चर्चा में रखना जरूरी है.
यही विरोधाभास अखिलेश यादव के मौजूदा दावे को सवालों के घेरे में खड़ा करता है. एक तरफ वह सत्ता में आने पर पेपर लीक रोकने और भर्ती परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने की गारंटी दे रहे हैं, दूसरी तरफ उनके शासनकाल और सपा की पुरानी नीतियों को लेकर सवाल आज भी राजनीतिक बहस में मौजूद हैं.
वादे से आगे, खाके की जरूरत
ऐसे में अखिलेश यादव के सामने दो सीधे सवाल हैं. पहला- क्या उनके पास पेपर लीक और भर्ती में अनियमितताओं को रोकने का कोई ठोस खाका है? सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि सत्ता में आने पर पेपर लीक रोक दिया जाएगा. अभ्यर्थियों को यह जानना होगा कि प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा संचालन, मूल्यांकन और चयन तक पूरी प्रक्रिया को किस तरह पारदर्शी बनाया जाएगा.
दूसरा सवाल उनके ट्रैक रिकॉर्ड से जुड़ा है. जिस दौर में भर्ती और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठे, उसी दौर की सरकार का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति आज जब उसी व्यवस्था को सुधारने की गारंटी देता है, तो उस दावे पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
अखिलेश यादव अगर पेपर लीक रोकने और भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का वादा कर रहे हैं, तो उन्हें अपने पुराने रिकॉर्ड पर उठे सवालों का जवाब देने के साथ यह भी बताना होगा कि इस बार ऐसा क्या अलग होगा, जो उनके पिछले कार्यकाल में नहीं हो सका. भरोसा सिर्फ वादे से नहीं, उसके पीछे मौजूद खाके और पिछले रिकॉर्ड से बनता है.
(लेखक, भूगोल विषय में पीएचडी हैं. चित्रकूट में वर्ष 2019 से 2024 तक दो कार्यकाल में भाजपा के जिला महामंत्री का दायित्व निभा चुके हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों में गहरी रुचि है.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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