Opinion: गांधी-शास्त्री के विचारों में आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की राह

यूपी तक

• 07:50 PM • 02 Oct 2026

Opinion: दो अक्टूबर भारत के लिए केवल महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती का दिन नहीं है. यह उन मूल्यों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा तय की.

UP Tak
Google CTA

दो अक्टूबर भारत के लिए केवल महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती का दिन नहीं है. यह उन मूल्यों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा तय की. गांधी ने भारत की आजादी को केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं माना. उनके लिए आजादी का अर्थ, स्वराज्य था और स्वराज्य की अंतिम परिणति थी ग्राम स्वराज्य. शास्त्री ने स्वतंत्र भारत के कठिन दौर में ‘जय जवान, जय किसान’ का मंत्र दिया. दोनों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन उनके विचारों के बीच एक गहरा संबंध था. सामान्य भारतीय को राष्ट्र निर्माण के केंद्र में रखना और सार्वजनिक जीवन को सेवा, सादगी, श्रम तथा जिम्मेदारी से जोड़ना.

गांधी और शास्त्री का संबंध केवल इतना नहीं है कि दोनों का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है. शास्त्री उस राजनीतिक पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसे गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन ने गहराई से प्रभावित किया था. गांधी के लिए राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के जीवन में परिवर्तन का साधन थी. शास्त्री ने स्वतंत्र भारत में सार्वजनिक जीवन को सादगी, अनुशासन और कर्तव्य बोध के साथ आगे बढ़ाया. वे गांधी के विचारों की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं थे, लेकिन गांधी द्वारा निर्मित राष्ट्रीय राजनीतिक संस्कार की एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य थे.

गांधी ने स्वराज्य को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं माना. उनके लिए स्वराज्य व्यक्ति के आत्मानुशासन, समाज की नैतिक शक्ति और जनता की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा था. उनका विश्वास था कि भारत का पुनर्निर्माण गांवों के पुनर्निर्माण के बिना संभव नहीं है लेकिन गांधी गांव को उसकी गरीबी, अशिक्षा, रूढ़ियों और सामाजिक बुराइयों के साथ स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे. उनका लक्ष्य गांव का पुनर्निर्माण था. वह ऐसे गांव की कल्पना करते थे, जो स्वशासित, स्वावलंबी, सहयोगी और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो.

इसलिए गांधी का ग्राम स्वराज्य केवल पंचायत बना देने का नाम नहीं था. उसमें मनुष्य की गरिमा, श्रम का सम्मान, समानता, ट्रस्टीशिप, विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, स्वावलंबन, सहयोग, सत्याग्रह, सर्वधर्म समानता, पंचायती राज और नई तालीम जैसे विचार भी जुड़े हुए थे. इनमें कुछ जीवन-मूल्य हैं, कुछ सामाजिक व्यवहार के सिद्धांत और कुछ शासन-व्यवस्था की बुनियादी अवधारणाएं हैं. इसलिए ग्राम स्वराज्य को केवल पंचायती राज के प्रशासनिक ढांचे में सीमित कर देना, गांधी की व्यापक कल्पना को छोटा कर देना होगा. ग्राम स्वराज्य का केंद्र प्रशासन नहीं है, बल्कि मनुष्य और उसकी भागीदारी है.

आज का गांव गांधी के समय का गांव नहीं है. इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने गांव को दुनिया से जोड़ दिया है. युवा नई आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं, महिलाएं स्थानीय शासन में नेतृत्व कर रही हैं और गांवों में नए उद्यम तथा रोजगार के अवसर विकसित हो रहे हैं. इसलिए ग्राम स्वराज्य का स्वरूप भी बदलना स्वाभाविक है. आज इसका अर्थ पुराने गांव को उसी रूप में वापस लाना नहीं, बल्कि आधुनिक गांव को अधिक सक्षम, स्वावलंबी, लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और खुशहाल बनाना है. मानव गरिमा, समानता, श्रम, सहयोग और विकेंद्रीकरण जैसे उसके मूल मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं.

भारत ने पंचायती राज को संवैधानिक आधार देकर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है लेकिन पंचायत का गठन ही ग्राम स्वराज्य नहीं है. वास्तविक ग्राम स्वराज्य तब होगा, जब पंचायतों के पास उनके दायित्वों के अनुरूप अधिकार और संसाधन हों, वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें और ग्राम सभा गांव के सामूहिक निर्णय का प्रभावी मंच बने.

यह भी पढ़ें...

 यहीं गांधी का विचार आज की शासन-व्यवस्था से संवाद करता है. क्या सत्ता वास्तव में गांव तक पहुंची है? क्या ग्रामीण नागरिक केवल सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाला व्यक्ति है या अपने गांव के विकास का सक्रिय भागीदार भी है? क्या ग्राम सभा प्रभावी है और क्या सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ हो रहा है?

इन प्रश्नों को किसी एक सरकार या राजनीतिक दल के विरुद्ध आरोप की तरह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निरंतर परीक्षा की तरह देखना चाहिए. वर्तमान केंद्र सरकार ने पंचायतों की क्षमता-वृद्धि, डिजिटल शासन और स्थानीय योजना पर जोर दिया है. e-GramSwaraj के माध्यम से पंचायतों की योजना, बजट, लेखांकन, कार्यों की प्रगति और भुगतान जैसी प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने का प्रयास किया जा रहा है. राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान के अंतर्गत निर्वाचित प्रतिनिधियों और पंचायतों से जुड़े अन्य लोगों के प्रशिक्षण तथा क्षमता-वृद्धि पर भी जोर है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी के विचारों को कुछ ठोस राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ने का प्रयास भी किया है. 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया स्वच्छ भारत मिशन गांधी के स्वच्छ भारत के सपने से जोड़ा गया और इसे जन भागीदारी का अभियान बनाने का आह्वान किया गया. यह गांधी को केवल स्मृति में रखने के बजाय उनके एक महत्वपूर्ण विचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में सामने लाने का प्रयास था.

इन पहलों का वास्तविक मूल्यांकन अंततः उनके परिणामों से होना चाहिए लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि गांधी के विचारों को केवल भाषणों में दोहराने के बजाय स्वच्छता, जन भागीदारी, डिजिटल पंचायत और स्थानीय शासन की क्षमता-वृद्धि जैसे कार्यक्रमों से जोड़ने की कोशिश हुई है. विचार और शासन के बीच यही संवाद किसी विचार को जीवित रखने का एक रास्ता बन सकता है.

गांधी के नाम पर काम करने वाली संस्थाओं के लिए भी यही कसौटी होनी चाहिए. स्वतंत्रता के बाद अनेक संस्थाओं, संगठनों और कार्यकर्ताओं ने खादी, ग्राम विकास, शिक्षा, स्वच्छता, सामाजिक सेवा, रचनात्मक कार्य और गांधी साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इस योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता लेकिन किसी विचार को जीवित रखने के लिए केवल उसका स्मरण पर्याप्त नहीं होता. समय के साथ यह भी देखना जरूरी है कि उसे आगे बढ़ाने वाली संस्थाएं बदलती परिस्थितियों में अपनी भूमिका कैसे निभा रही हैं.

क्या गांधी के नाम पर चलने वाली संस्थाएं गांव, गरीब, स्वावलंबन, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक समरसता के प्रश्नों से पर्याप्त रूप से जुड़ी हैं? क्या वे नई पीढ़ी को गांधी से जोड़ने के नये तरीके खोज रही हैं? क्या उनके काम की समीक्षा होती है? समाज को यह जानने का अधिकार है कि किसी संस्था ने क्या किया, किसके लिए किया और उसका क्या परिणाम निकला. यह किसी संस्था या व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि जवाबदेही की स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत करना है. गांधी के नाम और विचार की विरासत जिन संस्थाओं को मिली है, उनसे समाज की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से अधिक होगी.

यहीं शास्त्री फिर गांधी के साथ दिखाई देते हैं. गांधी के लिए श्रम और स्वावलंबन, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के आधार थे. शास्त्री ने किसान को राष्ट्र की शक्ति के केंद्र में रखकर, इस भावना को स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में नया अर्थ दिया. गांधी नागरिक से आत्मसंयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा करते थे. शास्त्री ने कठिन समय में देशवासियों से संयम और त्याग का आह्वान किया. गांधी ने गांव और सामान्य व्यक्ति को राष्ट्र निर्माण का केंद्र माना; शास्त्री ने जवान और किसान को राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि के आधार के रूप में सामने रखा.

इसलिए ‘जय जवान, जय किसान’ केवल एक लोकप्रिय नारा नहीं था. यह उस समय की दो बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकताओं- सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को एक सूत्र में बांधता था. खाद्यान्न संकट और युद्ध की चुनौती के बीच शास्त्री ने देश को आत्मविश्वास, अनुशासन और त्याग का संदेश दिया. उनकी सादगी और सार्वजनिक जीवन के प्रति प्रतिबद्धता ने इस संदेश को प्रभावशाली बनाया.

गांधी और शास्त्री को साथ याद करने का अर्थ दो महापुरुषों को एक दिन पर याद करना भर नहीं है. यह स्वतंत्रता आंदोलन से स्वतंत्र भारत तक चली आ रही एक राष्ट्रीय मूल्य-परंपरा को समझना है. गांधी ने स्वतंत्रता को जनता की भागीदारी और आत्मनिर्भर समाज से जोड़ा. शास्त्री ने दिखाया कि स्वतंत्र देश में कठिन परिस्थितियों का सामना भी नागरिकों की सामूहिक भागीदारी, जिम्मेदारी और नेतृत्व की सादगी से किया जा सकता है.

आज भारत तेजी से बदल रहा है. ऐसे में गांधी का ग्राम स्वराज्य डिजिटल सेवाओं, स्थानीय उद्यम, आधुनिक कृषि, बेहतर शिक्षा, जल संरक्षण, महिला और युवा नेतृत्व तथा मजबूत ग्राम सभा के साथ नया रूप ले सकता है. उसी तरह ‘जय जवान, जय किसान’ को भी केवल एक ऐतिहासिक नारे की तरह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, किसान की गरिमा, कृषि की मजबूती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के व्यापक संदर्भ में समझना होगा.

इस पूरी यात्रा में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेले सरकार पर्याप्त नहीं है. पंचायतों को अधिक जिम्मेदार होना होगा, संस्थाओं को अधिक जवाबदेह होना होगा और नागरिकों को अधिक सक्रिय. गांधी का ग्राम स्वराज्य नागरिक को केवल अधिकार नहीं देता, उसे जिम्मेदारी भी देता है. शास्त्री का जीवन भी यही सिखाता है कि सार्वजनिक जीवन में पद से अधिक कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं.

दो अक्तूबर, अपने गांव, अपनी पंचायत, अपनी संस्थाओं और अपने सार्वजनिक जीवन के बारे में आत्ममंथन का दिन होना चाहिए. सरकारों को योजनाओं के परिणामों के लिए जवाबदेह होना चाहिए. पंचायतों को स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए. गांधी के नाम पर काम करने वाली संस्थाओं को अपने काम का मूल्यांकन करना चाहिए. राजनीतिक दलों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को यह दिखाना चाहिए कि गांधी और शास्त्री उनके लिए केवल भाषणों के पात्र नहीं, बल्कि सार्वजनिक आचरण के संदर्भ भी हैं और नागरिकों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल अधिकार मांगने का नाम नहीं है; इसमें जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

गांधी और शास्त्री किसी एक संस्था, दल या संगठन की संपत्ति नहीं हैं. वे भारत की साझा विरासत हैं. गांधी ने स्वतंत्रता को स्वराज्य और ग्राम स्वराज्य से जोड़ा, शास्त्री ने स्वतंत्र भारत की शक्ति को जवान, किसान और नागरिक के कर्तव्य से जोड़ा. दोनों को साथ पढ़ने पर भारत की ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसमें सत्ता का अर्थ सेवा है, विकास का अर्थ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है और राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी है. आज गांधी और शास्त्री को याद करना तभी सार्थक है, जब उनके विचार हमारे गांवों, हमारी संस्थाओं, हमारे शासन और हमारे सार्वजनिक व्यवहार में दिखाई दें और भारत की भावी पीढ़ी को समाज तथा राष्ट्र की सेवा के लिए प्रेरित करें.

लेखक: दिनेश प्रताप सिंह, भाजपा उत्तर प्रदेश के मुख्य प्रवक्ता.

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)