उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता किसी एक दल का स्थायी आधार वोटबैंक नहीं रहा लेकिन निर्णायक जरूर रहा है. कांग्रेस यही बात फिर याद दिलाती दिख रही है. सपा से सीट बंटवारे का पेच फंसा है, तभी प्रदेश अध्यक्ष अजय राय बरेली पहुंचे और जेल में बंद मौलाना तौकीर रजा खान के परिवार से मिले. कांग्रेस इसे मानवीय भेंट कहती है. सियासत इसे 2027 से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिया गया संदेश मानती है.
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तौकीर रजा इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष हैं. सितंबर 2025 के बरेली बवाल के बाद वे फतेहगढ़ जेल में हैं. हाईकोर्ट ने हाल में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. अजय राय मोहल्ला सौदागरान स्थित तौकीर के आवास पर बेटे फरमान रजा और परिजनों से करीब पैंतालीस मिनट रुके, कानूनी मदद का भरोसा दिया और कहा कि बरेली में दंगा नहीं हुआ, प्रशासन ने लाठीचार्ज कराया और मुकदमे दर्ज किए. घटना के लगभग एक वर्ष बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का उस घर पहुंचना संयोग नहीं लगता.
कांग्रेस का जोर पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर इसलिए है कि वहां मुस्लिम आबादी घनी है और सपा की पकड़ हर सीट पर एक जैसी नहीं. बरेली, सहारनपुर, रामपुर, मुरादाबाद जैसे इलाकों में धार्मिक-सामाजिक नेतृत्व का असर अब भी बचा हुआ है. तौकीर रजा उसी प्रभाव के प्रतीक माने जाते हैं. उनके घर जाना केवल एक परिवार को ढाढस देना नहीं, समुदाय को यह बताना है कि कांग्रेस संवेदनशील मुद्दों पर चुप नहीं रहेगी. सहारनपुर के मस्जिद विवाद में भी पार्टी मैदान में उतरी. लोकसभा चुनाव के बाद से यही कोशिश दिखती है कि मुस्लिम मतदाता, जो पहले कांग्रेस का बड़ा आधार वोटबैंक माना जाता था और बाद में सपा की ओर चला गया, फिर से विकल्प सोचे.
कांग्रेस का कोर वोटबैंक रहे हैं मुस्लिम
इतिहास यहां सहारा भी देता है, भ्रम भी पैदा करता है. कांग्रेस के मजबूत दौर में मुस्लिम समर्थन व्यापक था. नब्बे के दशक के बाद सपा ने उसे संगठन और सत्ता दोनों से जोड़ा. 2024 में इंडिया गठबंधन में दोनों दल साथ थे, पर विधानसभा का हिसाब अलग होता है. सपा मुस्लिम वोट को अपना कोर वोटबैंक मानती है. कांग्रेस उसे साझा समर्थन बताना चाहती है. इसी टकराहट से सीटों का विवाद निकला है.
गठबंधन तय बताए जाने के बावजूद फॉर्मूला अधूरा है. सपा जीत की संभावना और मजबूत प्रत्याशी पर जोर दे रही है. कांग्रेस अधिक सीटें चाहती है. कांग्रेस की निगाह निगाह सौ से डेढ़ सौ सीटों पर है, जबकि सपा पचास के आसपास देने को तैयार बताई जाती है. रायबरेली, अमेठी, सहारनपुर, बाराबंकी और सीतापुर जैसे जिले दोनों दलों के लिए सबसे कठिन परीक्षा बन गए हैं. अजय राय ने चेताया कि अखिलेश यादव रायबरेली गए तो कांग्रेस इटावा-सैफई जाएगी. अखिलेश यादव ऊपर से रार और भीतर एकता की बात करते हैं. दोनों सुर एक साथ चल रहे हैं. इससे साफ है कि कांग्रेस दबाव बना रही है और सपा अपनी शर्तें नहीं छोड़ रही.
दोहरी रणनीति पर काम कर रही है कांग्रेस
ऐसे समय में मुस्लिम नेताओं और प्रभावशाली परिवारों तक पहुंचना दो काम करता है. एक, गठबंधन टूटे तो कांग्रेस अकेले भी कुछ सीटों पर दावा ठोक सके. दो, गठबंधन बने तो मोलभाव में वजन बढ़े. इसलिए पार्टी मुस्लिम चेहरों को संगठन में जगह देने और स्थानीय नेताओं को जोड़ने की चर्चा चलाए रखती है. नामों की होड़ से अधिक अर्थ इस संकेत का है कि कांग्रेस अब इस वोट को केवल सपा के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती.
(लेखक डॉ. सुनील कुमार मिश्र, अतर्रा पी.जी. कॉलेज, बाँदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
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