अब जबकि ग्रेटर नोएडा में चल रहे यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो (यूपीआईटीएस) को तीन दिन हो रहे हैं इसके पीछे की वैचारिक सोच पर भी बात जरूरी है. ऐसा इसलिए कि कि किसी भी राज्य के आर्थिक उभार को समझने के लिए कभी-कभी आंकड़ों से अधिक उस विचार को पकड़ना जरूरी होता है, जो आगे चलकर आंकड़ों में तब्दील होते हैं. यह विचार इस अवधारणा पर आधारित है कि किसी भी अर्थव्यवस्था को केवल उत्पादन की मात्रा से बड़ा नहीं माना जा सकता. अर्थव्यवस्था तब व्यापक विस्तार की ओर बढ़ती है, जब स्थानीय बाजार और वैश्विक बाजार के बीच की दूरी सिमटने लगती है. अर्थव्यवस्था का आकार तब बड़ा होता है, जब कोई प्रदेश अपने आप को विश्व-अर्थतंत्र का भागीदार मानने लगता है. उत्तर प्रदेश आज इसी वैचारिक मोड़ पर है. वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का जो लक्ष्य प्रदेश ने अपने सामने रखा है, वह इस सोच पर आधारित है कि विकास अब केंद्र से परिधि की ओर नहीं, बल्कि परिधि से केंद्र की ओर भी बहेगा. गांव-कस्बों का उत्पाद अब दिल्ली-मुंबई की मंडियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सिंगापुर, टोक्यो और मॉस्को के बाजारों से बात करेगा. उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो इसी विचार का व्यावहारिक रूप है, और इसीलिए इसे आर्थिक चेतना में आ रहे बदलाव के बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए.
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वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की अवधारणा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह लक्ष्य अकेले सरकारी निवेश या बड़े औद्योगिक घरानों की पूंजी से हासिल नहीं किया जा सकता. इसकी नींव उन लाखों छोटे और मझोले उद्यमों में है, जो प्रदेश के हर जिले में बिखरे पड़े हैं. मुरादाबाद का पीतल, भदोही का कालीन, कन्नौज का इत्र, फिरोजाबाद की चूड़ियां, वाराणसी की साड़ियां. ये सब स्थानीय हुनर हैं और एक दशक पहले तक स्थानीय पहचान की सीमा में ही बंधे दिखाई देते थे. महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हुनर सदियों से यहां है, लेकिन इसे वैश्विक मानकों, वैश्विक पैकेजिंग, वैश्विक मांग और वैश्विक तकनीक से जोड़ने के प्रयास योगी सरकार में शुरू हुए. यूपीआईटीएस में हुई बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) बैठकें अब इस कोशिश के सार्थक परिणाम को दर्शा रही हैं.
ग्रेटर नोएडा में चल रहे ट्रेड शो के आंकड़ों को देखते हैं. ट्रेड शो के दूसरे दिन 4,700 बी2बी बैठकें हुईं, 412 समझौतों पर मुहर लगी और 54.2 मिलियन डॉलर के कारोबार की राह खुली. पहले दिन भी 2,800 से अधिक बैठकों में प्रदेश के करीब 500 एमएसएमई शामिल हुए, जिनसे लगभग 140 करोड़ रुपये की व्यावसायिक पूछताछ दर्ज हुई. इन आंकड़ों को केवल संख्या नहीं माना जा सकता. इन्हें वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के चश्मे से देखें तो यह वह पहली सीढ़ी है जिस पर पैर रखकर उत्तर प्रदेश इसे पाने की कोशिश कर रहा है. अर्थशास्त्री मानते हैं कि व्यापार गरीबी मिटाने का सबसे भरोसेमंद औजार है, क्योंकि यह संभावनाओं के अनेक रास्ते खोलता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आर्थिक दृष्टि इसी सोच से मेल खाती है जो अब भरोसे के धरातल के रूप में दिखने लगी है.
दशकों तक उत्तर प्रदेश को निवेश के नक्शे पर एक ऐसे प्रदेश के रूप में देखा जाता रहा, जहां संभावनाएं तो अपार थीं, पर उन्हें साकार करने के प्रयास न के बराबर थे. इसलिए वैश्विक भरोसा हासिल करना राज्य के लिए पहली अनिवार्य शर्त थी. सिंगापुर की कंपनियों का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में कार्गो फैसिलिटी, लॉजिस्टिक्स पार्क, कोल्ड स्टोरेज और एमआरओ गतिविधियों के लिए आगे आना, वियतनाम के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल पर बातचीत, रूस के साथ डिफेंस, फार्मा और मेडिकल डिवाइस को लेकर संभावनाएं, बेलारूस के साथ मशीनरी और वुड टेक्नोलॉजी पर चर्चा, जापान के साथ ईवी सेक्टर में सहयोग की उम्मीद, इन सारी बातों में एक ही भाव धड़कता है कि दुनिया अब उत्तर प्रदेश को संभावना नहीं, साझेदार मानने लगी है. यूपीआईटीएस ने इस बदलते भरोसे को एक मंच पर एकत्र कर दिया है, जहां द्विपक्षीय बातचीत का खुला मंच सजा है.
और भी तथ्य ऐसे हैं जिन पर निगाह जानी चाहिए. बुंदेलखंड में प्रस्तावित फार्मा पार्क, ललितपुर का बल्क ड्रग पार्क, नोएडा के निकट मेडिकल डिवाइस पार्क और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं प्रदेश के औद्योगिक चरित्र को बदलती दिखाई देती हैं. संदेश भी साफ है कि उत्तर प्रदेश अब उच्च तकनीक, अनुसंधान और वैश्विक साझेदारी वाले उद्योगों की ओर बढ़ना चाहता है. सहारनपुर और बिजनौर के लकड़ी उद्योग जैसे परंपरागत क्लस्टर भी अब आधुनिक तकनीक से जुड़ने की दहलीज पर हैं. इसी संतुलन पर वन ट्रिलयन डालर की अर्थव्यवस्था का पूरा ढांचा टिकना है. मतलब यह कि परंपरा और तकनीक, स्थानीय हुनर और वैश्विक मानक, छोटे उद्यमी और बड़ी कंपनियों को एक साथ आगे बढ़ना है.
इसी संदर्भ में प्रदेश की 25 करोड़ की आबादी का अर्थ भी नए सिरे से स्थापित होना चाहिए. सोच बदलने की जरूरत है. यह आबादी सिर्फ उपभोक्ता नहीं है, यह प्रदेश का सबसे बड़ा श्रमबल है, सबसे बड़ा कौशल-भंडार है, और अब उद्यमशील शक्ति के रूप में दिखाई दे रही है. नई सोच उत्पादन और नवाचार पर केंद्रित है. यूपीआईटीएस की सार्थकता इसी पूरी प्रक्रिया को गति देने में है. इसलिए यूपीआईटीएस में हुई बी2बी बैठकें भविष्य के आर्थिक रिश्तों की कड़ी हैं.
वैश्वीकरण का सच्चा अर्थ कभी स्थानीय पहचान को मिटाना नहीं रहा, बल्कि स्थानीय सामर्थ्य को वैश्विक अवसर से जोड़ना रहा है. उत्तर प्रदेश के पास उत्पादों की विविधता है, कृषि की शक्ति है, युवा मानव संसाधन है और तेजी से आगे बढ़ता औद्योगिक आधार है. जरूरत बस इतनी भर थी कि इन सबके बीच ऐसा जीवंत नेटवर्क बुना जाए, जिसमें प्रदेश का कोई भी छोटा उद्यमी दुनिया के किसी बड़े बाजार से सीधे संवाद कर सके. योगी सरकार ने यह कर दिखाया है. यूपीआईटीएस उत्तर प्रदेश के उत्पादों, सेवाओं, निर्यातकों और एमएसएमई को वैश्विक बाजार से जोड़ने का पुल है. यहां भारतीय निर्माता, निर्यातक, एमएसएमई, निवेशक, वैश्विक खरीदार और साझेदार देशों के प्रतिनिधिमंडल मौजूद हैं. सरकार की ‘लोकल से ग्लोबल’ की अवधारणा का साकार रूप यहां देखने को मिल रहा है और यही इस ट्रेड शो की असली सफलता है. यूपीआईटीएस उत्तर प्रदेश की क्षमता पर सवाल उठाने वालों को स्पष्ट जवाब भी है.
लेखक: सुधीर जे. कुमार, एडिटर, वाइल्ड लाइफ टुडे
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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