लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्ता पर सवाल उठाना है, संस्थाओं पर संदेह की बौछार करना नहीं. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पिछले कई महीनों से चुनाव आयोग को निशाने पर लिए हुए हैं. उनका ताजा लहजा और भी तीखा है. कह रहे हैं कि अगर उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा जीत गई, तो यह प्रदेश का आखिरी चुनाव होगा. ऐसे बयान सामान्य आलोचना नहीं होते. ये उस संस्था की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जिसके बिना चुनाव संभव ही नहीं.
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गंभीर बात यह है कि यही अखिलेश यादव अपनी लगभग हर प्रेस कांफ्रेंस में 2024 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हैं. कहते हैं कि जिस तरह लोकसभा में भाजपा को हराया गया, उसी तरह विधानसभा में भी उसे हराना है. यह वाक्य अपने आप में स्वीकारोक्ति है. 2024 में उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में से 37 पर समाजवादी पार्टी की जीत हुई. भाजपा का खाता घटा. उसी चुनाव आयोग ने मतदाता सूची बनाई, उसी ने नामांकन स्वीकार किए, उसी ने मतगणना करवाई. तब आयोग पक्षपाती नहीं था. तब नतीजे लोकतंत्र की विजय थे, जनता की जागरूकता थे, पार्टी की रणनीति थे. श्रेय अपनी छतरी के नीचे लिया गया.
दोहरा मापदंड महज राजनीतिक जुमला नहीं, अलोकतांत्रिक स्वभाव का संकट
अब वही आयोग, जब 2022 की विधानसभा हार की याद आती है, अचानक संदिग्ध हो जाता है. तब कहा जाता है कि सपा समर्थकों के वोट काटे गए, अधिकारियों की मनमानी पोस्टिंग हुई, मतदाता सूची से नाम गायब किए गए. हार आयोग की देन बताई जाती है, जीत पार्टी की मेहनत. यह दोहरा मापदंड महज राजनीतिक जुमला नहीं, अलोकतांत्रिक स्वभाव का संकट है. कोई संस्था एक चुनाव में निष्पक्ष और दूसरे में कठपुतली नहीं हो सकती. अगर 2024 के नतीजे मान्य हैं, तो उसी प्रक्रिया से निकले 2022 के नतीजे भी मान्य होने चाहिए. अगर 2022 संदिग्ध है, तो 2024 की जीत का नैतिक आधार भी डगमगाने लगता है. दोनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकतीं.
हार को स्वीकार करना भी लोकतांत्रिक संस्कार
चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है. उस पर सवाल उठाने का अधिकार हर नागरिक और हर दल को है. शिकायत दर्ज कराना, सबूत देना, अदालत जाना-ये सब लोकतंत्र की प्रक्रिया हैं. लेकिन ‘आखिरी चुनाव’ जैसी भाषा संस्थागत अविश्वास को जनभावना में बदलने की कोशिश है. यह मतदाता को यह संदेश देती है कि अगर परिणाम आपके पक्ष में नहीं आए, तो चुनाव ही व्यर्थ है. ऐसा संदेश विपक्ष को कमजोर नहीं, लोकतंत्र को कमजोर करता है. हार को स्वीकार करना भी लोकतांत्रिक संस्कार है. 2022 में सपा की हार के अनेक कारण थे-संगठन, गठबंधन, संदेश और नेतृत्व की सीमाएं. उन सीमाओं से मुंह मोड़कर सारा दोष आयोग के सिर मढ़ देना आसान तो है, ईमानदार नहीं.
लोकसभा का अंकगणित प्रेरणा है, विधानसभा का अंकगणित षड्यंत्र
2024 की कामयाबी के बाद भी यही सवाल उठता है. अगर आयोग सचमुच एक पक्ष का उपकरण होता, तो उत्तर प्रदेश में सपा का वह प्रदर्शन संभव ही नहीं होता. जनता ने वोट दिया, आयोग ने गिना, परिणाम घोषित हुआ. तब अखिलेश यादव ने जनता को प्रणाम किया, जनमत को सलाम कहा. श्रेय कार्यकर्ताओं और अपनी रणनीति को दिया. वही नेता आज कह रहे हैं कि आयोग स्वतंत्र नहीं रहा, आयुक्त अपना काम नहीं कर पा रहे, लोकतंत्र मिटाने का षड्यंत्र चल रहा है. विरोधाभास साफ है. जीत मंजूर है, हार संदिग्ध. लोकसभा का अंकगणित प्रेरणा है, विधानसभा का अंकगणित षड्यंत्र.
आलोचना का स्तर क्या हो?
सवाल यह नहीं कि विपक्ष चुप रहे. सवाल यह है कि आलोचना का स्तर क्या हो. आयोग की कार्यप्रणाली पर ठोस आपत्ति हो, दस्तावेज हों, कानूनी रास्ता हो-तो बहस मजबूत होती है. लेकिन नतीजे आने से पहले ही चुनाव की वैधता पर प्रश्न खड़ा करना उस खेल के नियम तोड़ने जैसा है, जिसे खुद खेलना है. अगर हर हार के बाद आयोग पर उंगली उठे और हर जीत के बाद खुद पर ताली बजे, तो संस्था नहीं, स्वार्थ बोलता है. क्या अखिलेश यादव अपनी राजनीतिक कमियों-संगठन की दरार, टिकट वितरण के असंतोष, पुरानी छवि और नई अपेक्षा के बीच के फासले को चुनाव आयोग की आड़ में छिपाना चाहते हैं? यह प्रश्न अब उनके बयानों से खुद उठ खड़ा हुआ है.
उत्तर प्रदेश का मतदाता न तो इतना भोला है कि हर आरोप को सत्य मान ले, न इतना कठोर कि हर शिकायत को खारिज कर दे. वह दोनों चुनावों का साक्षी है. 2022 में उसने एक फैसला दिया, 2024 में दूसरा. दोनों बार उसी मशीनरी ने काम किया. इसलिए जरूरत इस बात की है कि विपक्ष मैदान में जनता से बात करे, अपने विकल्प को मजबूत करे और संस्थाओं को कमजोर करने की भाषा से बचे. चुनाव आयोग पर निगरानी हो, सुधार हों, पारदर्शिता बढ़े-यह मांग जायज है. लेकिन जीत को अपनी और हार को व्यवस्था की साजिश बताना लोकतंत्र का विस्तार नहीं, उसका संकुचन है. लोकसभा की जीत मंजूर करके विधानसभा के नतीजों पर पहले से सवाल खड़ा करना विरोधाभास है. और विरोधाभास, जब संवैधानिक संस्था के खिलाफ हथियार बने, तो वह अलोकतांत्रिक आचरण ही कहलाएगा.
(लेखक सतीश कुमार तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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