Opinion: पश्चिम के बाद अब पूरब में भी ओवैसी के निशाने पर अखिलेश, सपा पर भारी पड़ेगा मुस्लिम हिस्सेदारी का सवाल?

यूपी तक

• 05:50 PM • 13 Oct 2026

Opinion: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. बिजनौर से बहराइच और आजमगढ़ तक रैलियों और संगठन विस्तार के जरिए पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

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Opinion: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछने लगी है. भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी तैयारियों के साथ असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) इस बार चुनाव से ठीक पहले मैदान में उतरने के बजाय पहले से संगठन तैयार करने और राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है.

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बिजनौर से बहराइच और आजमगढ़ तक रैलियों के जरिए ओवैसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वांचल तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. उनकी इस सक्रियता का सबसे अहम पहलू अखिलेश यादव पर लगातार हमले हैं. ओवैसी मुस्लिमों की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल उठाकर सपा के उस वोट आधार को चुनौती दे रहे हैं, जिसे पार्टी अपनी सबसे बड़ी चुनावी ताकत मानती है.

संगठन से रैलियों तक, यूपी में पहले से चुनावी तैयारी

ओवैसी की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव से पहले शुरू हुई उनकी तैयारी है. AIMIM ने करीब एक साल पहले ही प्रदेश में प्रभारियों की नियुक्ति कर दी थी. इसके बाद प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में रैलियों और राजनीतिक कार्यक्रमों के जरिए पार्टी अपनी मौजूदगी बढ़ाने में जुटी है. बिजनौर से बहराइच और आजमगढ़ तक की सक्रियता इस बात का संकेत है कि ओवैसी अपनी राजनीति को किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखना चाहते.

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में केवल चुनाव के समय रैलियां करने से राजनीतिक आधार तैयार नहीं होता. इसके लिए स्थानीय नेतृत्व, संगठन और लगातार जनसंपर्क की जरूरत होती है. प्रभारियों की नियुक्ति और अलग-अलग क्षेत्रों में सभाओं के जरिए AIMIM इसी दिशा में आगे बढ़ रही है. इसका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं के सामने पार्टी को एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करना और चुनाव से पहले अपनी दावेदारी मजबूत करना है.

अखिलेश पर हमला, मुस्लिम हिस्सेदारी को बनाया सियासी हथियार

ओवैसी के मौजूदा अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर उनके सीधे हमले हैं. ओवैसी लगातार सवाल उठा रहे हैं कि सपा ने मुस्लिमों का समर्थन तो लिया, लेकिन उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व कितना दिया? यह ओवैसी का राजनीतिक आरोप है, लेकिन इसका चुनावी महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण उसकी राजनीति का प्रमुख आधार रहा है.

ओवैसी इसी समीकरण में मुस्लिम हिस्सेदारी के सवाल को केंद्र में लाकर सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका संदेश है कि मुस्लिम मतदाताओं को केवल किसी दल की जीत-हार के गणित का हिस्सा बनने के बजाय अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठाना चाहिए. यदि यह मुद्दा मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रभावी होता है, तो अखिलेश यादव के सामने अपने पारंपरिक समर्थन आधार को एकजुट रखने की चुनौती बढ़ सकती है.

बिहार का चुनावी प्रदर्शन बताता है, ओवैसी को नजरअंदाज करना आसान नहीं

सपा को ओवैसी की चुनौती को हल्के में नहीं लेना चाहिए. बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र में पांच सीटें जीती थीं. 2025 के चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी ने बिहार में कमाल किया.पश्चिम बंगाल में भी ओवैसी ने विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की.

उत्तर प्रदेश में ओवैसी की चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सपा के चुनावी समीकरण से जुड़ा रहा है. यहां विधानसभा की कई सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक हैं. ऐसे में अगर AIMIM अपने संगठन और उम्मीदवारों के दम पर इस समर्थन में हिस्सेदारी हासिल करती है, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं.

बिजनौर से आजमगढ़ तक सक्रियता, सपा के लिए क्यों बढ़ेगी मुश्किल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वांचल तक ओवैसी की रैलियां सपा के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ाने वाली हैं. पश्चिम में मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बनाने से लेकर पूर्वांचल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने तक AIMIM अलग-अलग क्षेत्रों में संभावनाएं तलाश रही है. इन रैलियों का असर केवल भीड़ या भाषणों तक सीमित नहीं होगा. असली सवाल यह है कि क्या पार्टी अपनी सक्रियता को स्थानीय संगठन, मजबूत प्रत्याशियों और वोटों में बदल पाएगी.

यदि AIMIM ऐसा करने में सफल होती है, तो उन सीटों पर सपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन जीत-हार के अंतर को प्रभावित करता है.

2027 में अखिलेश के सामने मुस्लिम वोट के साथ हिस्सेदारी का सवाल

अखिलेश यादव के सामने चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरण को बनाए रखने की भी है. ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के सामने सपा के विकल्प के रूप में खुद को पेश कर रहे हैं. यदि वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी के सवाल को लगातार चुनावी बहस में बनाए रखते हैं, तो सपा को अपने समर्थन आधार के भीतर उठने वाले सवालों का जवाब देना पड़ेगा.

सपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह मुस्लिम समर्थन को पहले से सुनिश्चित मानकर न चले. 2027 में मुकाबला केवल भाजपा बनाम सपा तक सीमित नहीं रह सकता; मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व का सवाल भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है. ओवैसी इसी सवाल को अपनी राजनीति का आधार बनाकर अखिलेश यादव पर दबाव बढ़ा रहे हैं.

(लेखक पीएचडी (भूगोल) हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)