Opinion: PDA की बात और सोनेलाल पटेल के सम्मान पर चुप्पी... अखिलेश को भारी पड़ सकती है कुर्मी समाज की नाराजगी

यूपी तक

• 11:31 AM • 19 Oct 2026

Opinion: यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले पर उठे सवाल. डॉ. सोनेलाल पटेल की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि न देने से कुर्मी समाज में नाराजगी, जानिए क्या है इसका राजनीतिक असर.

Akhilesh Yadav

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है. मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नारे के दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. लेकिन इसी बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव के एक कदम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस अपनापन, प्रेम और पिछड़ों-दलितों के सम्मान की बात अखिलेश यादव करते हैं, क्या वह वास्तव में उस पर अमल भी करते हैं?

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दरअसल, यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि शनिवार को अपना दल के संस्थापक डॉ. सोनेलाल पटेल की पुण्यतिथि थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई दलों के नेताओं ने कुर्मी समाज के मसीहा कहे जाने वाले सोनेलाल पटेल को श्रद्धांजलि अर्पित की, लेकिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से कोई पोस्ट तक सामने नहीं आई. हैरानी की बात यह है कि यह पहली बार नहीं है, जब अखिलेश यादव की ओर से इस तरह की उपेक्षा देखने को मिली हो. इससे पहले भी अखिलेश यादव सोनेलाल पटेल की जयंती और पुण्यतिथि को नजरअंदाज करते रहे हैं.

यहीं से अखिलेश यादव के PDA पर सवाल खड़े होते हैं, क्योंकि यह मामला केवल सोनेलाल पटेल के सम्मान तक सीमित नहीं है. पिछड़ों और दलितों के मसीहाओं के अनादर को लेकर सपा का इतिहास विवादों से भरा रहा है. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, जिन्हें लोध समाज का मसीहा कहा जाता है, उनकी अनदेखी का आरोप भी अखिलेश यादव पर लगता है. कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर भी अखिलेश यादव श्रद्धांजलि नहीं देते हैं. दलित मसीहाओं के सम्मान को लेकर भी सपा पर सवाल उठते रहे हैं. आंबेडकर की मूर्तियां तोड़े जाने से लेकर सपा नेताओं द्वारा आंबेडकर को भूमाफिया बताने और मायावती के अपमान तक के कई मामले चर्चा में रहे हैं.

इन तमाम घटनाओं से यही सवाल खड़ा होता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की कोशिश कर रही सपा के लिए यह मुद्दा उसके राजनीतिक संदेश और सामाजिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा है. जब राजनीति में महापुरुषों की विरासत और सामाजिक सम्मान अहम मुद्दे हों, तब किसी प्रमुख नेता की चुप्पी पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

अखिलेश के PDA पर उठते सवाल

अखिलेश यादव की PDA राजनीति का आधार पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की व्यापक भागीदारी का दावा है. लेकिन इस सामाजिक गठजोड़ की मजबूती केवल नारों से तय नहीं होती. इसके लिए अलग-अलग समुदायों के महापुरुषों, सामाजिक प्रतीकों और राजनीतिक आकांक्षाओं के प्रति सम्मान भी जरूरी है. सोनेलाल पटेल कुर्मी समाज के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में रहे हैं. उन्होंने समाज को संगठित करने और उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ऐसे में उनकी पुण्यतिथि पर अखिलेश यादव की ओर से सार्वजनिक श्रद्धांजलि न दिया जाना सपा की राजनीति पर सवाल खड़े करता है.

यहां सवाल केवल एक पोस्ट का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का है, जो समुदाय तक पहुंचता है. PDA के जरिए व्यापक सामाजिक एकता की बात करने वाली पार्टी से अपेक्षा रहती है कि वह पिछड़े वर्गों के अलग-अलग समुदायों के प्रतीकों और इतिहास को भी समान महत्व दे.

गैर-यादव पिछड़ों के सम्मान का सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े वर्गों के भीतर भी अलग-अलग समुदायों की अपनी पहचान, नेतृत्व और राजनीतिक आकांक्षाएं हैं. कुर्मी समाज उनमें एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में यादव नेतृत्व के प्रभाव की चर्चा होती रही है. ऐसे में गैर-यादव पिछड़े समुदायों को यह भरोसा दिलाना कि उनकी भागीदारी और सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है, किसी भी दल के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती है.

सपा के आलोचक अक्सर आरोप लगाते हैं कि पार्टी की राजनीति में यादव नेतृत्व को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिलता है और दूसरे पिछड़े समुदायों की आकांक्षाओं को पर्याप्त जगह नहीं मिलती. सोनेलाल पटेल की पुण्यतिथि पर अखिलेश की चुप्पी ने इस आलोचना को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.

कुर्मी समाज की नाराजगी सपा को भारी पड़ेगी

सवाल सिर्फ सम्मान का नहीं है. इसका राजनीतिक संदेश भी काफी बड़ा है. कुर्मी समाज यूपी की सियासत में काफी प्रभावी है. उत्तर प्रदेश में कुर्मी आबादी करीब छह फीसदी है. करीब 50 से 60 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां कुर्मी मतदाता सीधे जीत-हार का अंतर तय करते हैं. खासकर अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में इनका प्रभाव ज्यादा है.

ऐसे में कुर्मी समाज के मसीहा के इस अनादर से चुनावी रूप से भी सपा को नुकसान पहुंच सकता है. सोनेलाल पटेल की बेटी और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल, जिन्हें मौजूदा समय में कुर्मी समाज की सबसे बड़ी आवाज माना जाता है, वह भी अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. उनका कहना है कि सपा ने केवल पिछड़ों को धोखा दिया है. वह बार-बार यह भी दोहरा रही हैं कि यूपी में तीसरी बार NDA की सरकार बनेगी.

यानी मामला साफ है कि कुर्मी समाज की नाराजगी सपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है. जब आप PDA की बात करते हैं, तो आपको उस समाज के सम्मान और उसके मसीहाओं के आदर का भी ध्यान रखना चाहिए. वरना आपकी मंशा पर सवाल उठना जायज है.

लेखक डॉ. अश्वनी अवस्थी, पीएचडी (भूगोल) हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)