Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनाव करीब आते ही अलग-अलग सीटों के समीकरण और क्षेत्रों के राजनीतिक प्रभाव की चर्चाएं तेज हो जाती हैं. लेकिन राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनका असर किसी एक चुनाव या विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहता. पूर्वांचल की गाजीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से जुड़े कृष्णानंद राय भी ऐसा ही एक नाम थे.
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एक दौर में मोहम्मदाबाद सीट अंसारी परिवार के मजबूत राजनीतिक प्रभाव के लिए जानी जाती थी. 1985 से 1996 तक अफजाल अंसारी लगातार पांच बार यहां से विधायक रहे. इलाके में उनका और उनके परिवार का मजबूत प्रभाव था. मुख्तार अंसारी की दबंगई को लेकर भी उस दौर में कई चर्चाएं होती थीं. ऐसा माहौल था कि अंसारी परिवार को चुनौती देना आसान नहीं माना जाता था.
इसी राजनीतिक माहौल में कृष्णानंद राय ने अंसारी परिवार को चुनौती दी. उन्होंने न सिर्फ उनके राजनीतिक वर्चस्व के सामने खड़े होने का फैसला किया, बल्कि मोहम्मदाबाद की राजनीति में अपनी अलग जगह बनाने की कोशिश भी शुरू की.
कृष्णानंद राय ने बीएचयू की छात्र राजनीति से राजनीतिक सक्रियता की शुरुआत की थी. उनके मन में मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से चुनाव जीतने का सपना था. 1996 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बावजूद उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा. पांच साल बाद वह फिर उसी सीट से चुनाव मैदान में उतरे और 2002 में अफजाल अंसारी को हराकर विधानसभा पहुंच गए.
यह जीत सिर्फ एक विधायक की चुनावी जीत नहीं थी. इसने मोहम्मदाबाद की राजनीति के पुराने समीकरण को बदल दिया था. अंसारी परिवार के लंबे राजनीतिक प्रभाव के बीच कृष्णानंद राय बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में उभरे.
कृष्णानंद राय की जीत का संदेश सिर्फ इतना नहीं था कि बीजेपी ने एक सीट जीत ली. इसने यह भी दिखाया कि अंसारी परिवार के मजबूत राजनीतिक प्रभाव वाली सीट पर कोई नेता उनके सामने खड़ा होकर चुनाव जीत सकता है. कृष्णानंद राय ने चुनावी जीत के बाद भी उनके राजनीतिक प्रभाव के सामने पीछे हटने के बजाय अपना विरोध जारी रखा. यही वजह थी कि धीरे-धीरे दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ता गया.
गाजीपुर के गोंदौर से निकला नाम
कृष्णानंद राय का जन्म 11 दिसंबर 1956 को गाजीपुर के गोंदौर गांव में हुआ था. वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे. आगे चलकर उन्होंने राजनीति को अपना क्षेत्र बनाया और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े. उनकी राजनीति का सबसे बड़ा आधार मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट बनी. यह वही सीट थी, जहां अंसारी परिवार लंबे समय से मजबूत स्थिति में था. यही कारण है कि कृष्णानंद राय का राजनीतिक उभार किसी सामान्य चुनावी कहानी जैसा नहीं था. उन्हें ऐसी सीट पर अपनी पहचान बनानी थी, जहां 1985 से लगातार अफजाल अंसारी चुनाव जीत रहे थे.
1996 में पहली कोशिश, लेकिन मिली हार
कृष्णानंद राय ने 1996 के विधानसभा चुनाव में पहली बार मोहम्मदाबाद सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा. उनके सामने अफजाल अंसारी थे. उस समय तक अफजाल इस सीट से लगातार पांच चुनाव जीत चुके थे. ऐसे में मुकाबला आसान नहीं था.
कृष्णानंद राय इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे. लेकिन यह हार उनकी राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं बनी. इसके बाद उन्होंने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश जारी रखी. फिर आया 2002 का विधानसभा चुनाव, जिसने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी.
2002 में वही सीट, वही मुकाबला और बदल गया नतीजा
2002 में कृष्णानंद राय एक बार फिर बीजेपी के टिकट पर मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से मैदान में उतरे. सामने फिर अफजाल अंसारी थे. लेकिन इस बार नतीजा पूरी तरह बदल गया.कृष्णानंद राय ने अफजाल अंसारी को चुनाव हरा दिया और विधानसभा पहुंच गए.
इस जीत की अहमियत इसलिए ज्यादा थी क्योंकि अफजाल अंसारी इस सीट से लगातार पांच बार विधायक रह चुके थे. यानी जिस मोहम्मदाबाद सीट पर अंसारी परिवार का लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव था, वहां कृष्णानंद राय ने चुनावी मुकाबले में उस वर्चस्व को चुनौती देकर जीत दर्ज की. यह सिर्फ कृष्णानंद राय की व्यक्तिगत जीत नहीं थी. इसने मोहम्मदाबाद की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया और उन्हें इलाके के एक प्रमुख राजनीतिक चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया.
जीत के बाद बढ़ा टकराव
कृष्णानंद राय की यह जीत अंसारी परिवार को रास नहीं आई. दोनों पक्षों के बीच तनातनी बढ़ने लगी और कई मौकों पर आमना-सामना भी हुआ. कृष्णानंद राय ने हालांकि पीछे हटने के बजाय अंसारी परिवार के राजनीतिक प्रभाव के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी.
जनवरी 2004 में लखनऊ में दोनों पक्षों के बीच फायरिंग की घटना भी सामने आई. कहा जाता है कि इस दौरान कृष्णानंद राय ने मुख्तार और अफजाल को दौड़ा लिया था और जान बचाने के लिए दोनों भाइयों को छिपना पड़ा. इसके बाद दोनों के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत टकराव और गहरा होता चला गया.
29 नवंबर 2005: जब गोलियों से छलनी हुआ काफिला
फिर आया 29 नवंबर 2005 का दिन. यह वही दिन था, जिसने कृष्णानंद राय के साथ-साथ पूरे पूर्वांचल की राजनीति को हिला दिया. कृष्णानंद राय गाजीपुर में एक क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन से लौट रहे थे. उनके साथ कई लोग थे. इसी दौरान रास्ते में हमलावरों ने उनके काफिले को घेर लिया और आधुनिक हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.
हमले में कृष्णानंद राय समेत सात लोगों की हत्या हुई. घटनास्थल से 400 से ज्यादा कारतूस मिलने की बात सामने आई. राय के शरीर से भी 21 गोलियां बरामद होने की रिपोर्ट आई. यह हमला इतना बड़ा था कि इसे उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित राजनीतिक हत्याकांडों में गिना गया. उस समय प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे. हत्याकांड के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई.
इस हत्याकांड में मुख्तार अंसारी और उनके भाई अफजाल अंसारी पर आरोप लगे. हत्या के बाद कृष्णानंद राय की चुटिया काटी गई और उस समय जेल में बंद मुख्तार अंसारी ने ऐसा करने का आदेश दिया था.
हत्या के बाद भी जारी रही राजनीतिक विरासत
कृष्णानंद राय की हत्या के बाद मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. बीजेपी ने उनकी पत्नी अलका राय को उम्मीदवार बनाया और वह चुनाव जीत गईं. इस जीत ने दिखाया कि कृष्णानंद राय की हत्या के बाद भी इलाके में उनकी राजनीतिक विरासत खत्म नहीं हुई थी. उनकी पत्नी के जरिए यह विरासत कुछ समय तक मोहम्मदाबाद की राजनीति में बनी रही. हालांकि 2007 में अंसारी परिवार एक बार फिर इस सीट पर लौट आया. मुख्तार अंसारी के बड़े भाई शिबगतुल्लाह अंसारी ने अलका राय को हराकर चुनाव जीत लिया. 2012 में भी शिबगतुल्लाह ने जीत दर्ज की.
इसके बाद 2017 में अलका राय ने बीजेपी के टिकट पर फिर मोहम्मदाबाद सीट जीत ली. यानी मोहम्मदाबाद की राजनीति में राय और अंसारी परिवार के बीच मुकाबले की कहानी कृष्णानंद राय की हत्या के बाद भी खत्म नहीं हुई. अलग-अलग चुनावों में दोनों परिवारों की राजनीतिक मौजूदगी और प्रभाव सामने आता रहा.
क्यों आज भी याद किए जाते हैं कृष्णानंद राय?
कृष्णानंद राय का नाम आज भी पूर्वांचल की राजनीति में सिर्फ एक पूर्व विधायक के तौर पर नहीं लिया जाता. उनकी कहानी उस दौर की राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण जरिया है, जब पूर्वांचल में चुनावी मुकाबले सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं होते थे. यहां राजनीतिक वर्चस्व, स्थानीय प्रभाव, ठेकेदारी और अपराध की दुनिया से जुड़े आरोपों की चर्चाएं भी राजनीति के साथ जुड़ी रहती थीं.
इसी माहौल में कृष्णानंद राय ने अंसारी परिवार के मजबूत राजनीतिक गढ़ को चुनौती दी. 1996 में पहली बार हारने के बाद भी मैदान नहीं छोड़ा. 2002 में उसी सीट पर लौटे और अफजाल अंसारी को चुनाव में हराकर विधानसभा पहुंचे. लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा ज्यादा लंबी नहीं चली. महज तीन साल बाद 29 नवंबर 2005 को उनकी हत्या कर दी गई. यही वजह है कि कृष्णानंद राय का नाम पूर्वांचल की राजनीति में आज भी एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिसने अंसारी परिवार के मजबूत राजनीतिक गढ़ को चुनौती दी, 2002 में उस चुनौती को चुनावी जीत में बदला और तीन साल बाद एक ऐसे हत्याकांड का शिकार हुए, जिसका असर लंबे समय तक मोहम्मदाबाद और पूर्वांचल की राजनीति पर दिखाई देता रहा.
(लेखक भावेष पांडेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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