Opinion: कुर्मी अस्मिता का सवाल...धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से यूपी में सपा के लिए नई चुनौती?

यूपी तक

• 10:56 AM • 29 Jul 2026

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्या सिर्फ NEET विवाद का नतीजा है या इसके पीछे यूपी की 2027 की सबसे बड़ी जातिगत जंग छिड़ गई है? इस ओपिनियन लेख में पढ़ें कैसे अखिलेश यादव का 'PDA कार्ड' कुर्मी समाज के अस्मिता के सवाल में उलझता दिख रहा है और 128 सीटों पर असर रखने वाली यह जाति 2027 के चुनाव में किसके लिए किंगमेकर साबित होगी.

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धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा राष्ट्रीय स्तर पर NEET-UG पेपर लीक विवाद और छात्र आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम था. लेकिन उत्तर प्रदेश की जाति-केंद्रित राजनीति में इसे कुर्मी समाज की अस्मिता पर हमले के रूप में देखा जा रहा है. प्रधान कुर्मी जाति से हैं और ओडिशा से आते हैं. विपक्ष, खासकर सपा ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया, लेकिन यूपी के कुछ कुर्मी वर्गों में यह धारणा बन रही है कि अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा ने गैर-यादव OBC नेता को निशाना बनाकर अपनी यादव-केंद्रित छवि दोहराई है.

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यह बहस महज अस्थायी प्रतिक्रिया नहीं है. यह 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा की रणनीति की गहराई को परखती है. कुर्मी यूपी की दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है. हुकुम सिंह कमेटी (2001) के अनुसार उनकी आबादी करीब 7.4% है, जो आज 1.75-2 करोड़ के आसपास अनुमानित है. संख्या में यादवों से कम होने के बावजूद उनका भौगोलिक घनत्व (पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई) उन्हें शक्तिशाली बनाती है. वे लगभग 128 विधानसभा सीटों पर प्रभाव डालते हैं और करीब 48-50 सीटों पर निर्णायक साबित हो सकते हैं.

वोट शेयर में बदलाव: सपा की बढ़ती पहुंच, बीजेपी की चिंता

2019 लोकसभा चुनाव में NDA को कुर्मी-कोइरी वोटों का करीब 80% हिस्सा मिला था, जो 2022 विधानसभा में 66% और 2024 लोकसभा में घटकर 61% रह गया. सपा के कुर्मी विधायकों की संख्या 2017 के 2 से 2022 में 13-15 तक पहुंच गई. 2024 में 11 कुर्मी सांसदों में 7 सपा के रहे. यह बदलाव सपा की PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) रणनीति की सफलता दर्शाता है, लेकिन साथ ही गैर-यादव OBC के भीतर गहरी दरार भी पैदा कर रहा है.

कुर्मी समाज ऐतिहासिक रूप से यादव वर्चस्व के खिलाफ खड़ा रहा है. 1990 के दशक में सोनेलाल पटेल ने अपना दल बनाकर गैर-यादव ओबीसी समाज को एकजुट करने की कोशिश की. आज अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में अपना दल (सोनेलाल) बीजेपी गठबंधन का मजबूत स्तंभ है. बीजेपी ने भी कुर्मी आउटरीच को प्राथमिकता दी-पंकज चौधरी को यूपी बीजेपी अध्यक्ष बनाना और 2022 में 27 कुर्मी उम्मीदवारों को टिकट देना इसका प्रमाण है.

सपा की रणनीति पर सवाल

प्रधान के इस्तीफे को लेकर सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में जो "कुर्मी अपमान" वाला नैरेटिव बन रहा है, वह सपा के लिए चिंता का विषय है. अखिलेश यादव ने NEET आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और इसे युवाओं की जीत बताया. राष्ट्रीय स्तर पर यह परीक्षा सुधार और छात्र हित का मुद्दा है, लेकिन यूपी की स्थानीय राजनीति में जाति हमेशा प्राथमिकता ले लेती है.

सपा लंबे समय से यादव-मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर निर्भर रही है. PDA फॉर्मूला 2024 में गैर-यादव ओबीसी समुदाय में सेंध लगाने में सफल रहा, लेकिन प्रधान जैसे प्रमुख कुर्मी चेहरे के इस्तीफे को "टारगेटिंग" के रूप में प्रचारित करने से सपा पर "जातिवादी" होने का ठप्पा लग सकता है. कुर्मी समाज संगठित है और स्वाभिमान रैलियों के जरिए अपनी अस्मिता की रक्षा करता रहा है. अगर यह नाराजगी 2027 तक बनी रही, तो सपा का PDA गठजोड़ कमजोर पड़ सकता है.

कुर्मी: स्विंग वोटर जो किंगमेकर बन सकते हैं

सपा के लिए चुनौती यह है कि PDA को विस्तार देते हुए कुर्मी नेताओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए. यदि सपा गैर-यादव OBC को नजरअंदाज करती है, तो वे बीजेपी या उसके गठबंधन की ओर मुड़ सकते हैं. 2027 चुनाव में कुर्मी वोट का रुख तय करेगा कि सत्ता किसके पास रहेगी. प्रधान का इस्तीफा मात्र एक घटना नहीं, बल्कि यूपी की जाति राजनीति में गहरे परिवर्तन का संकेत है.

(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)