Opinion: दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब एक महीने तक चला NEET और पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन अब खत्म हो चुका है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो चुका है. लेकिन आंदोलन खत्म होने के बाद उत्तर प्रदेश में सामने आई कुछ घटनाओं ने इस पूरे प्रदर्शन के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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प्रयागराज और भदोही में प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं से जुड़े लोगों के साथ मारपीट, पथराव और वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं. इन घटनाओं में समाजवादी पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं पर आरोप लगे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि छात्रों के भविष्य और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन कहीं राजनीतिक अराजकता का मंच तो नहीं बन रहा है?
प्रयागराज में बीजेपी नेताओं की गाड़ियों को बनाया गया निशाना
प्रयागराज में कुछ वाहनों में तोड़फोड़ का मामला सामने आया. प्रदर्शन के दौरान “सांसद” लिखी एक गाड़ी को कुछ युवकों ने घेर लिया. गाड़ी पर ईंट-पत्थर से हमला किया गया. घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें कुछ युवक गाड़ी को घेरे हुए दिखाई दे रहे हैं. गाड़ी के अंदर मौजूद लोग उन्हें रोकने और सुरक्षित निकलने देने की अपील करते नजर आए.
इसी दौरान भाजपा के झंडे लगी अन्य गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया. कुछ जगहों पर वाहनों को रोकने और उनके साथ अभद्रता किए जाने की शिकायत भी हुई.
भदोही में BJP नेता की गाड़ी पर पथराव का आरोप
प्रयागराज के बाद भदोही में भी प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ मारपीट और गाड़ी पर पथराव का मामला सामने आया. ज्ञानपुर में प्रदर्शन के दौरान भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष विनय कुमार पांडेय की गाड़ी को रोकी गई, उनके साथ अभद्रता की गई. वहीं, सपा कार्यकर्ताओं ने खुले तौर पर पीएम मोदी और बीजेपी को गालियां दीं.
छात्रों के मुद्दे से राजनीतिक टकराव तक पहुंचा प्रदर्शन?
यही नहीं, यूपी के कई जिलों में सपा और अन्य विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं ने इस प्रदर्शन की आड़ में बीजेपी नेताओं के खिलाफ अभियान चलाया और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सपा इस प्रदर्शन को एक राजनीतिक मौके के रूप में देख रही है.
आंदोलन खत्म, लेकिन राजनीतिक सवाल बरकरार
इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर थी. अब उनका इस्तीफा हो चुका है और आंदोलन भी खत्म हो गया है. लेकिन प्रयागराज और भदोही की घटनाओं ने एक नई बहस शुरू कर दी है.
सवाल यह है कि क्या छात्रों के वास्तविक मुद्दों को राजनीतिक दल अपनी सियासी लड़ाई के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्योंकि प्रदर्शन खत्म होने के बाद जिस तरह का माहौल विपक्ष की ओर से बनाया जा रहा है इससे ये साफ है कि इस लड़ाई के नाम पर राजनीतिक दल अपना सियासी फायदा देख रहे हैं जो छात्रों का मूल मुद्दा कमजोर कर रहा है.
इससे छात्रों का प्रदर्शन कमजोर होगा
प्रदर्शन खत्म होने के बाद जिस तरह से यूपी में एक के बाद एक घटनाएं सामने आ रही हैं उससे साफ है कि सपा इसमें अपने लिए एक माहौल देख रही है. लेकिन छात्रों के मुखौटे का इस्तेमाल करके इस तरह की अराजकता फैलाना छात्रों को ही बदनाम करेगा और उनके प्रदर्शन को गलत रूप में पेश करेगा. इसलिए सपा को अपने कार्यकर्ताओं पर लगाम लगाना चाहिए.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ की खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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