Opinion: 31 जुलाई 2026 को संसद परिसर में विपक्षी दलों द्वारा राम मंदिर चंदा चोरी के मुद्दे पर रचाया गया नाटक अब उल्टा पड़ने लगा है. पप्पू यादव द्वारा पुजारी का वेश धारण कर दानपेटी लेकर बैठना, राहुल गांधी समेत अन्य नेताओं द्वारा उसमें पैसे डालना और फिर ‘चोरी’ का दृश्य दिखाना-यह सब राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था. लेकिन उत्तर प्रदेश में इस हरकत के खिलाफ आक्रोश तेजी से बढ़ रहा है. लखनऊ में सनातन रक्षा संगठन ने जबरदस्त विरोध दर्ज कराया है, जबकि वाराणसी में राहुल गांधी और अन्य संबंधित नेताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने की खबरें आ रही हैं. दरअसल, राम मंदिर जैसे आस्था के मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की हड़बड़ी में विपक्ष का यह नाटक पूरी तरह बैकफायर कर गया है.
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लखनऊ में सनातन रक्षा संगठन के कार्यकर्ताओं ने 1 अगस्त को पप्पू यादव की प्रतीकात्मक शवयात्रा निकाली है. कार्यकर्ता ‘राम नाम सत्य है’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़े. कुछ लोग अखिलेश यादव और राहुल गांधी के मुखौटे लगाए हुए थे, जिन पर चप्पलें भी बरसाई गईं. गांधी प्रतिमा के पास पहुंचकर पप्पू यादव के पुतले को चप्पलों से पीटा गया और फिर आग के हवाले कर दिया गया. संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुरोध राय ने स्पष्ट कहा कि सनातन धर्म का अपमान करने वालों को माफ नहीं किया जाएगा. उन्होंने पप्पू यादव का सिर लाने वाले को 51 लाख रुपये का इनाम तक घोषित कर दिया है. यह घोषणा भले ही प्रतीकात्मक और आक्रोश भरी हो, लेकिन इससे साफ जाहिर होता है कि संसद परिसर में हुए नाटक ने आम सनातनियों की भावनाओं को कितना ठेस पहुंचाई है.
वाराणसी में भी स्थिति अलग नहीं है. संसद परिसर में भगवा वस्त्र पहनकर किए गए नाटक और राहुल गांधी की उसमें भागीदारी को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया जा रहा है. स्थानीय स्तर पर शिकायतें दर्ज कराई गई हैं और राहुल गांधी, पप्पू यादव तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने की खबरें सामने आई हैं. साधु-संत समुदाय और स्थानीय संगठनों में भी इस घटना को लेकर गुस्सा है. वे इसे भगवा रंग और पुजारी के वेश का अपमान मान रहे हैं.
यह पूरा प्रकरण विपक्ष की रणनीतिक चूक को उजागर करता है. राम मंदिर चंदा चोरी का मामला जांच के अधीन है. एसआईटी काम कर रही है, गिरफ्तारियां हुई हैं, इस्तीफे दिए गए हैं और सुप्रीम कोर्ट भी निगरानी कर रहा है. दोषियों को सजा मिलनी चाहिए—इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन आस्था के प्रतीक को लेकर संसद परिसर में नुक्कड़ नाटक रचकर, पुजारी का वेश धारण कर और दानपेटी का मजाक उड़ाकर विपक्ष ने खुद को कठघरे में खड़ा कर लिया. उन्होंने सोचा कि इससे सत्ताधारी दल को घेरा जा सकेगा, लेकिन उल्टा सनातन समाज का आक्रोश उन पर ही फूट पड़ा.
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां राम मंदिर आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है, ऐसे नाटक की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. लोग जांच और पारदर्शिता की मांग कर सकते हैं, लेकिन आस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करते. विपक्ष की यह हड़बड़ी अब उन्हें भारी पड़ रही है. लखनऊ का विरोध प्रदर्शन और वाराणसी के मुकदमे इस बात के सबूत हैं कि जनता इस नाटक को राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित और सनातन विरोधी मान रही है.
अब विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इस बैकफायर से कैसे निपटे. माफी मांगे या मुद्दे को और भड़काए-दोनों ही रास्ते जोखिम भरे हैं. सच्ची राजनीति आस्था के मुद्दों पर नाटक करने में नहीं, बल्कि जिम्मेदार बहस और जवाबदेही सुनिश्चित करने में होती है. 31 जुलाई का वह दृश्य अब विपक्ष के लिए सबक बन गया है-आस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को सनातन समाज माफ नहीं करता. उत्तर प्रदेश में बढ़ता यह विरोध साफ संदेश दे रहा है कि राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, और उससे छेड़छाड़ की कीमत चुकानी पड़ती है.
(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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