Opinion: PDA में 'P' सिर्फ पोस्टर तक? पटेल समाज के सवालों पर क्यों खामोश हैं अखिलेश यादव

यूपी तक

• 07:20 PM • 31 Jul 2026

यूपी चुनाव 2027 से पहले PDA राजनीति और कुर्मी-पटेल समाज की भागीदारी को लेकर नई बहस छिड़ गई है. धर्मेंद्र प्रधान समेत कई मामलों पर उठे सवालों के बीच सपा और अखिलेश यादव की रणनीति पर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं.

SP Chief Akhilesh Yadav

सपा चीफ अखिलेश यादव

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Opinion:उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनाव से पहले जातीय समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी लगातार PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) के फार्मूले को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बता रही है. अखिलेश यादव हर मंच से सामाजिक न्याय और पिछड़ों की हिस्सेदारी की बात करते हैं. लेकिन इसी बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या PDA की राजनीति में सभी पिछड़ी जातियां बराबर की भागीदार हैं, या कुछ जातियां सिर्फ वोट तक सीमित हैं?

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर यही सवाल सबसे ज्यादा उठने लगा है. कई लोगों ने आरोप लगाया कि अगर धर्मेंद्र प्रधान की जगह कोई यादव नेता होता, तो क्या अखिलेश यादव का रुख यही रहता? इसी बहस के साथ सोशल मीडिया पर ऐसे कई पुराने मामले भी सामने लाए जाने लगे, जिनमें पटेल (कुर्मी) समाज से जुड़े मुद्दों पर अखिलेश यादव की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए गए.

धर्मेंद्र प्रधान से शुरू हुई बहस

NEET और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सपा ने लगातार तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को घेरा और उनके इस्तीफे की मांग की. लेकिन इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर एक अलग नैरेटिव सामने आया. लोगों ने सवाल उठाया कि अगर धर्मेंद्र प्रधान कुर्मी समाज की जगह यादव समाज से होते, तब भी क्या सपा का रुख यही रहता? यही सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है.

अभिषेक पटेल का मामला भी चर्चा में

सोशल मीडिया पर बिहार पुलिस के सिपाही अभिषेक पटेल का मामला भी उठाया जा रहा है. आरोप लगाया जा रहा है कि अपनी जान बचाने के लिए हवाई फायर करने वाले अभिषेक पटेल को लेकर अखिलेश यादव ने सख्त रुख अपनाया और उसके बाद सिपाही को निलंबित होना पड़ा. इसी घटना को उदाहरण बनाकर पूछा जा रहा है कि आखिर पटेल समाज से जुड़े मामलों में सपा का रवैया अलग क्यों दिखाई देता है.

सोनेलाल पटेल की जयंती भी बनी सवाल

अपना दल के संस्थापक और कुर्मी राजनीति के बड़े नेता रहे डॉ. सोनेलाल पटेल की जयंती को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. यूजर्स पूछ रहे हैं कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली सपा की ओर से उनकी जयंती के मौके पर न तो कोई बड़ा कार्यक्रम किया गया और न ही अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर उन्हें याद करते हुए कोई विशेष संदेश दिया. इसे भी अब पटेल समाज की अनदेखी से जोड़कर देखा जा रहा है.

गार्गी पटेल से लेकर संदीप पटेल तक... पुराने मामलों की भी हो रही चर्चा

सिर्फ यही नहीं, पिछले कुछ समय में पटेल समाज से जुड़े कई विवाद भी अब एक साथ गिनाए जा रहे हैं. चंदौली में गार्गी पटेल के साथ सपा कार्यकर्ताओं और यादव समाज के कुछ लोगों द्वारा मारपीट की घटना सामने आई. गार्गी खुद भी सपा से जुड़ी हैं लेकिन इसके बावजूद अखिलेश यादव ने इस मामले पर एक शब्द तक नहीं बोला. आलम यह हुआ कि बाद में गार्गी पर दोबारा जानलेवा हमला करने की कोशिश हुई. मामला काफी चर्चा में रहा, लेकिन अखिलेश यादव की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई.

इसी तरह प्रयागराज में अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा विधायक संदीप पटेल का सपा के ही यादव कार्यकर्ताओं ने विरोध किया. उनके खिलाफ तख्तियां दिखाई गईं और अभद्र टिप्पणियां की गईं. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर भी अखिलेश यादव कुछ नहीं बोले.

वहीं, बांदा से सांसद कृष्णा पटेल और सपा के एक यादव विधायक के बीच भरे मंच पर तीखी नोकझोंक हुई. आरोप है कि विधायक ने कृष्णा पटेल के साथ अभद्र व्यवहार किया, लेकिन इस मामले पर भी अखिलेश यादव की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

यहीं से उठ रहा है सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल

राजनीति सिर्फ नारों से नहीं चलती बल्कि संदेशों से भी चलती है. सपा PDA की बात करती है, लेकिन अगर किसी एक समाज के बीच लगातार यह धारणा बनने लगे कि उसकी समस्याओं पर पार्टी मुखर नहीं होती, तो इसका असर चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है.

यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान या किसी एक घटना का नहीं रह गया है. सवाल यह है कि क्या पटेल समाज खुद को PDA की राजनीति में बराबर का साझेदार महसूस कर रहा है? क्योंकि प्रदेश के कई उदाहरणों का हवाला देकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब पटेल समाज से जुड़े मामलों में, खासकर जिन घटनाओं में यादव समाज के लोगों पर आरोप लगे, तब अखिलेश यादव की चुप्पी क्यों दिखाई दी.

क्यों 2027 से पहले यह सपा के लिए चुनौती है

उत्तर प्रदेश में कुर्मी-पटेल समाज कई क्षेत्रों में निर्णायक राजनीतिक प्रभाव रखता है. कुर्मी प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति मानी जाती है. हुकुम सिंह समिति (2001) के अनुसार उनकी आबादी करीब 7.4 प्रतिशत बताई गई थी जो आज अनुमानित रूप से 1.75 से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है. संख्या में यादवों से कम होने के बावजूद उनका भौगोलिक प्रभाव-पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई- उन्हें राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है. माना जाता है कि यह समाज करीब 128 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता है और लगभग 48 से 50 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है. ऐसे में अगर इस समाज के बीच यह संदेश जाता है कि उसकी उपेक्षा हो रही है तो इसका असर 2027 के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है.

लेखक- डॉ. दीपक कुमार पाण्डेय (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा में हिंदी विभाग के सहायक आचार्य हैं. राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)