बेटे हरीश राणा के अंतिम संस्कार के वक्त पिता अशोक का ऐसा हाल देखकर हर कोई रो दिया

Ashok Rana Father of Harish:13 साल बाद कोमा से मिली मुक्ति, पिता अशोक राणा ने नम आंखों से बेटे को दी विदाई. 2013 के हादसे से लेकर 2026 की इच्छा मृत्यु तक का भावुक सफर. दिल्ली के ग्रीन पार्क में हुआ अंतिम संस्कार। देखें वो पल जिसने सबको रुला दिया.

Ashok Rana Father of Harish: एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस बेटे को उसने 13 साल तक पल-पल अपनी आंखों के सामने सहेजा. आज उसी की अर्थी को कंधा देना पड़ा. हरीश राणा के अंतिम संस्कार के दौरान पिता अशोक राणा का साहस और उनकी खामोशी ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया. 2013 में एक हादसे के बाद कोमा में गए हरीश ने 24 मार्च 2026 को अंतिम सांस ली. सुप्रीम कोर्ट से मिली 'इच्छा मृत्यु' की अनुमति के बाद हरीश को इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति मिली. लेकिन पीछे छोड़ गए एक पिता का वो दर्द जिसे शब्दों में बयान करना नामुमकिन है.

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अर्थी के सामने सुन्न खड़े रहे पिता

अंतिम संस्कार के दौरान जब मंत्रोच्चार हो रहा था तब पिता अशोक राणा बिल्कुल शांत और शून्य की तरह खड़े थे. आसपास मौजूद लोग उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें ढांढस बंधा रहे थे.लेकिन पिता की आंखें बस अपने बेटे के उस चेहरे को निहार रही थीं जिसे उन्होंने 13 साल तक मशीनों के सहारे जिंदा देखा था. यह वो पल था जब एक पिता का हौसला और उसकी बेबसी दोनों एक साथ नजर आ रही थी.

13 साल का वो संघर्ष और सेवा

अशोक राणा ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी थी. 20 अगस्त 2013 को चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हरीश अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे. सिर में गंभीर चोट लगने के बाद वे कोमा में चले गए. पिता ने हर अस्पताल और हर इलाज का दरवाजा खटखटाया. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और 'शांति' की ओर सफर

जब सुधार की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं तब पिता ने ही भारी मन से अपने बेटे के लिए मुक्ति की कामना की थी. 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 'इच्छामृत्यु' की इजाजत दी. अंतिम संस्कार में ब्रह्माकुमारीज़ के सदस्यों ने भी पिता को संबल दिया और जीवन-मरण के सत्य को स्वीकार करने की शक्ति दी.

नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

मंत्रों की गूंज और 'ओम शांति' के नारों के बीच हरीश राणा का शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया गया. एक होनहार छात्र, फिटनेस का शौकीन और बड़े सपने देखने वाला हरीश अब यादों में सिमट गया है. पिता के लिए यह एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसमें 13 साल की अनथक सेवा, उम्मीद और अब एक गहरी शून्यता है.