उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुए शंभूपुर कांड में एक खौफनाक वारदात के बाद SSP अनिल कुमार भी खूब चर्चा हो रही है. जघन्य हत्याकांड के बाद अनाथ हुई दो मासूम बच्चियों का भविष्य जब अंधेरे में नजर आ रहा था तब आजमगढ़ के SSP अनिल कुमार उनके लिए देवदूत बनकर सामने आए.
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एसएसपी अनिल कुमार ने न सिर्फ दोनों बच्चियों को गोद लेने का ऐलान किया बल्कि अपनी एक महीने की तनख्वाह उनके नाम एफडी करने का फैसला किया. यही नहीं उनकी इस संवेदनशील पहल से प्रेरित होकर पूरी आजमगढ़ पुलिस फोर्स ने भी एक दिन का वेतन इन मासूमों के नाम करने का निर्णय लिया है. इस फैसले के बाद से ही 2016 बैच के आईपीएस अधिकारी अनिल कुमार सुर्खियों में बने हुए हैं.
कौन हैं IPS डॉ. अनिल कुमार?
आजमगढ़ में बतौर एसएसपी तैनात डॉ. अनिल कुमार का करियर काफी इंस्पिरेशनल है. राजस्थान के रहने वाले अनिल कुमार ने पुलिस सेवा में आने से पहले MBBS की पढ़ाई पूरी की थी. खाकी वर्दी पहनने से पहले वह दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में बतौर डॉक्टर मरीजों का इलाज करते थे.
अनिल कुमार ने पहली बार साल 2009 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास की. इसके बाद उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) में हुआ. लेकिन उनका असल सपना खाकी पहनकर देश सेवा करने का था. अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किया और कुल 5 बार यूपीएससी की कठिन परीक्षा क्रैक की.
आखिरकार अपने अटूट समर्पण के बल पर वह 2016 बैच में उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी बने. साल 2025 में उन्होंने आजमगढ़ जिले के कप्तान (SSP) का पदभार संभाला था.
क्या था शंभूपुर का खौफनाक हत्याकांड?
यह पूरा मामला आजमगढ़ के अहरौला थाना क्षेत्र स्थित शंभूपुर गांव का है. बीते सोमवार को गांव के ही अरविंद सिंह के घर में उसके मृत भाई की आत्मा की शांति के लिए पूजा चल रही थी. पूजा के दौरान ही अचानक कहासुनी हुई और अरविंद ने अपने ही परिवार की शांति भंग करते हुए अपनी पत्नी और दो पंडितों की गोली मारकर हत्या कर दी. तीन हत्याएं करने के बाद सिरफिरे अरविंद ने अपने तीन मासूम बच्चों को एक कमरे में बंद कर लिया और खुद को हथियार के साथ अंदर से लॉक कर लिया.
8 घंटे का हाई-वोल्टेज ड्रामा
पुलिस ने करीब 7 से 8 घंटे तक अरविंद को समझाने और बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए उससे लगातार बातचीत की. स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए यूपी एटीएस (ATS) की टीम को भी बुला लिया गया था. बातचीत के बीच अचानक कमरे से गोली चलने की आवाज आई. अरविंद ने अपने ही 10 साल के मासूम बेटे को बेहद करीब से गोली मार दी और बाकी दो बच्चियों को भी जान से मारने की धमकी देने लगा.
एसएसपी अनिल कुमार के मुताबिक, अगर पुलिस एक सेकंड भी देरी करती तो वह बाकी दो बेटियों की भी जान ले लेता. पुलिस ने तुरंत दरवाजा तोड़ा. अंदर घुसते ही अरविंद ने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी अरविंद वहीं ढेर हो गया. पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दो मासूम बेटियों को तो सकुशल बचा लिया. लेकिन गोली लगने से गंभीर रूप से घायल 10 साल के बेटे की जान नहीं बचाई जा सकी.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुला राज
रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद यह सवाल खड़ा हो रहा था कि बच्चे को किसकी गोली लगी. इस पर पुलिस ने डॉक्टरों के पैनल से पोस्टमार्टम कराकर पूरी स्थिति साफ कर दी. बच्चे के शरीर में मिला 'एंट्री वूंड' .32 बोर के असलहे का था. मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के पास 9mm की पिस्टल थी. जबकि अरविंद के पास .32 बोर की लाइसेंसी रिवॉल्वर थी.
बुलेट की ट्रैजेक्ट्री और घाव के निशानों से साबित हुआ कि अरविंद ने कमरे के अंदर बेहद पास से अपने बेटे को गोली मारी थी जबकि पुलिस उस वक्त कमरे के दूसरे कोने में दाखिल हो रही थी. यानी मासूम की मौत पिता की ही गोली से हुई थी.
अनाथ बच्चियों के लिए 'मसीहा' बने पुलिस कप्तान
इस घटना के बाद परिवार में केवल एक बुजुर्ग दादी और दोनों मासूम पोतियां ही बची थीं. सिर से माता-पिता और भाई का साया उठने के बाद जब उनका भविष्य दांव पर था, तब एसएसपी डॉ. अनिल कुमार आगे आए. एसएसपी अनिल कुमार ने ऐलान किया कि वह दोनों बेटियों को गोद लेते हैं. वह अपनी 1 महीने की सैलरी बच्चियों के नाम एफडी कराएंगे. उनके इस फैसले से प्रभावित होकर पूरी आजमगढ़ पुलिस के जवानों ने अपनी 1 दिन की सैलरी बच्चियों को देने का निर्णय लिया.
दोनों बच्चियों को 'मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना' के तहत ₹2,500 प्रति माह की सरकारी सहायता दिलाई जा रही है. इसके अलावा 11 साल की बच्ची ने अपनी आंखों से यह खौफनाक मंजर देखा था इसलिए उसके मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए चाइल्ड साइकेट्रिस्ट (बाल मनोचिकित्सक) से उसकी काउंसलिंग कराई जा रही है.
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