महाकाल, विंध्याचल और शिरडी मंदिरों में चढ़ावे का हिसाब कैसे रखा जाता है? जानिए मंदिरों में आने वाले करोड़ों रुपये, सोना-चांदी और डिजिटल दान का क्या होता है?

महाकाल मंदिर, विंध्याचल धाम और शिरडी साईबाबा ट्रस्ट में चढ़ावे और दान की गणना, सुरक्षा व रिकॉर्ड प्रबंधन की अलग-अलग व्यवस्थाएं चर्चा में हैं. जानिए मंदिरों में करोड़ों रुपये के दान का हिसाब कैसे रखा जाता है.

Temple Donation Accounting Debate Amid Growing Devotee Offerings

शिरडी, महाकाल और विंध्याचल में मंदिर चढ़ावा प्रबंधन व्यवस्था (Photo: AI Generated)

Temple Donation Management System Explained: देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुएं दान के रूप में प्राप्त होती हैं. ऐसे में इन दानों की सुरक्षा, गणना और पारदर्शिता को लेकर मंदिर प्रशासन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर, उत्तर प्रदेश के विंध्याचल धाम और महाराष्ट्र के शिरडी साईबाबा मंदिर की व्यवस्थाएं इस समय चर्चा में हैं. जहां कुछ मंदिर डिजिटल तकनीक और कड़ी निगरानी के जरिए पारदर्शिता का दावा कर रहे हैं, वहीं कुछ जगहों पर रिकॉर्ड और जवाबदेही को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.

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महाकाल मंदिर में CCTV और डिजिटल दान पर जोर

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ दान में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है. मंदिर समिति के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में कुल आय लगभग 142 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जिसमें करीब 80 करोड़ रुपये दान के रूप में प्राप्त हुए हैं. दान पेटियों से 62 करोड़ रुपये, नगद काउंटर से 5.5 करोड़ रुपये, ऑनलाइन माध्यम से 3.60 करोड़ रुपये और गुप्त दान के जरिए 4.65 करोड़ रुपये की राशि मिली है. इसके अलावा लड्डू प्रसाद बिक्री से करीब 65 करोड़ रुपये की आय दर्ज की गई है.

मंदिर प्रशासन का कहना है कि दान पेटियां 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी में रहती हैं. दान की गिनती अधिकारियों की मौजूदगी में विशेष कक्ष में की जाती है. सुरक्षा व्यवस्था इतनी सख्त है कि गिनती में शामिल कर्मचारियों की जेबें तक सिल दी जाती हैं. श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में कई स्थानों पर क्यूआर कोड आधारित डिजिटल दान व्यवस्था भी उपलब्ध कराई गई है.

विंध्याचल मंदिर में रिकॉर्ड और पारदर्शिता पर उठे सवाल

मिर्जापुर स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर में दान व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल सामने आए हैं. श्री विंध्य पंडा समाज के पूर्व अध्यक्ष राजन पाठक ने आरोप लगाया है कि दान में मिलने वाले सोने-चांदी के आभूषणों का विस्तृत रिकॉर्ड और मूल्यांकन सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता. उनके अनुसार कई बार आभूषणों को केवल 'पीली धातु' और 'सफेद धातु' के रूप में दर्ज कर सुरक्षित रख दिया जाता है. हालांकि विंध्य विकास परिषद इन आरोपों को खारिज करती है. परिषद के मुताबिक विंध्याचल, कालीखोह और अष्टभुजा मंदिरों में कुल 22 दान पात्र लगाए गए हैं. दान राशि की गणना हर तीन से चार महीने में मजिस्ट्रेट की निगरानी और सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी में होती है. परिषद का कहना है कि दान में मिलने वाले आभूषणों को डबल लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है और अब तक किसी प्रकार की आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई है.

शिरडी साईबाबा ट्रस्ट का दावा

महाराष्ट्र के शिरडी साईबाबा मंदिर में भी हर साल बड़ी मात्रा में दान प्राप्त होता है. ट्रस्ट के अनुसार मंदिर की हुंडी में सालाना करीब 65 करोड़ रुपये का चढ़ावा आता है. यहां दान की गिनती सप्ताह में दो बार विशेष काउंटिंग हॉल में की जाती है. इस दौरान बैंक अधिकारियों, चैरिटी कमिश्नर के प्रतिनिधियों और सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी रहती है तथा पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में संपन्न होती है. ट्रस्ट प्रशासन के मुताबिक गिनती पूरी होने के बाद राशि तुरंत राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा कर दी जाती है. ट्रस्ट के पास करीब 550 किलोग्राम सोना और 7030 किलोग्राम चांदी सुरक्षित रखी गई है. सोने-चांदी के आभूषणों का मूल्यांकन अधिकृत विशेषज्ञों से कराया जाता है और सभी रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से संरक्षित किए जाते हैं.

सुरक्षा और जवाबदेही बनी बड़ी चुनौती

महाकाल, विंध्याचल और शिरडी जैसे बड़े धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाएं दिखाती हैं कि दान राशि और आभूषणों के प्रबंधन के लिए अलग-अलग मॉडल अपनाए जा रहे हैं. कहीं डिजिटल भुगतान और पारदर्शी गणना व्यवस्था पर जोर है तो कहीं रिकॉर्ड और जवाबदेही को लेकर बहस जारी है. बढ़ती दान राशि के बीच अब श्रद्धालुओं की अपेक्षा भी यही है कि चढ़ावे की सुरक्षा, उपयोग और लेखा-जोखा पूरी तरह पारदर्शी तरीके से संचालित हो.