UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी की रणनीति ने सियासी हलचल बढ़ा दी है. बीजेपी ने आठ उम्मीदवारों की सूची जारी कर सभी को चौंका दिया, जबकि सपा की ओर से तीसरे उम्मीदवार को लेकर चल रही चर्चा आखिरकार आगे नहीं बढ़ सकी. बीजेपी ने अपने सात पुराने राज्यसभा सांसदों में से किसी को भी दोबारा मौका नहीं दिया और नए चेहरों को मैदान में उतारा. दूसरी ओर अखिलेश यादव ने तीन राज्यसभा सीटों की जगह अब अपना ध्यान 403 विधानसभा सीटों पर लगाने की बात कही है. ऐसे में सवाल है कि सपा तीसरा उम्मीदवार क्यों नहीं उतार पाई और इसके पीछे क्या सियासी गणित रहा?
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तीसरे उम्मीदवार के लिए संख्या जुटाना बनी चुनौती
राज्यसभा चुनाव में सपा की ओर से तीसरे उम्मीदवार को उतारने की चर्चा लगातार चल रही थी. लेकिन तीसरे प्रत्याशी के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं था. सपा के पास पहले से ही अपने उम्मीदवारों को जिताने की चुनौती थी. ऐसे में तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने पर वोटों के बंटवारे और समर्थन जुटाने का सवाल सामने था. अखिलेश यादव ने पहले यह संकेत जरूर दिया था कि पर्याप्त संख्या जुटने पर तीसरा उम्मीदवार उतारा जा सकता है, लेकिन आखिर में सपा ने दो उम्मीदवारों पर ही फोकस रखा. इसके बाद अखिलेश यादव ने कहा कि अब उनका ध्यान तीन राज्यसभा सीटों पर नहीं, बल्कि सभी 403 विधानसभा सीटों पर है.
बीजेपी ने सातों पुराने सांसदों को नहीं दोहराया
बीजेपी ने राज्यसभा के लिए धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडे, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है. पार्टी ने अपने सातों पुराने राज्यसभा सदस्यों में से किसी को भी रिपीट नहीं किया. इनमें हरदीप पुरी और बीएल वर्मा जैसे नाम भी शामिल हैं, जिन्हें दोबारा मौका मिलने की चर्चा थी. नीरज सिंह और बृजलाल समेत पुराने चेहरों को भी टिकट नहीं मिला. बीजेपी की इस रणनीति ने अब 2027 विधानसभा चुनाव के टिकटों को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है.
नए चेहरों ने बीजेपी की रणनीति को बनाया खास
बीजेपी की सूची में कई ऐसे नाम हैं जिनकी चर्चा टिकट घोषित होने से पहले ज्यादा नहीं थी. धर्मपाल सिंह योगी सरकार में पशुधन मंत्री हैं और लोधी बिरादरी से आते हैं. राधाकांत ओझा बीजेपी के पुराने चेहरे हैं और दो बार बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं. प्रकाश पाल कानपुर क्षेत्र से आते हैं और ओबीसी मोर्चे के अध्यक्ष रहे हैं. विद्यासागर सोनकर मछली शहर से चुनाव हार चुके हैं और पूर्व एमएलसी हैं. गोपी कृष्ण पांडे का नाम भी अचानक सामने आया. प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से सांसद रह चुकी हैं. राम प्रताप चौहान पश्चिम के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं, जबकि श्रुति गंगवार सात बार सांसद रहे संतोष गंगवार की बेटी हैं और अर्बन डेवलपमेंट बैंक की अध्यक्ष हैं.
श्रुति गंगवार के सामने तीसरे उम्मीदवार की चर्चा
बीजेपी की आठवीं उम्मीदवार श्रुति गंगवार के नाम ने राज्यसभा चुनाव के समीकरण को और दिलचस्प कर दिया है. वह महिला होने के साथ ओबीसी पृष्ठभूमि से आती हैं. ऐसे में अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती तो उसके सामने श्रुति गंगवार के मुकाबले प्रत्याशी चुनने का सवाल भी होता. इस स्थिति में सपा के लिए ऐसा उम्मीदवार तलाशना महत्वपूर्ण होता जो जातीय और राजनीतिक समीकरण में मुकाबला कर सके. लेकिन तीसरे उम्मीदवार के लिए संख्या जुटाने की चुनौती पहले से मौजूद थी. ऐसे में सपा ने तीसरी सीट की कोशिश को आगे बढ़ाने के बजाय 2027 विधानसभा चुनाव पर फोकस करने का रास्ता चुना.
कांग्रेस से बढ़ती दूरी भी बनी बड़ा मुद्दा
राज्यसभा चुनाव के साथ ही कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रिश्तों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. कांग्रेस की ओर से 200 विधानसभा सीटों की मांग की चर्चा है, जबकि सपा इस स्तर की मांग को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिख रही. कांग्रेस नेताओं की ओर से शिवपाल यादव के बयानों पर भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है. राजेंद्र पाल गौतम ने 150 सीटों की चर्चा के बजाय 200 सीटों की बात कही. इससे दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान और बढ़ने की संभावना दिखाई दे रही है.
छोटे दलों के नेताओं से कांग्रेस की नजदीकी
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से छोटे दलों के नेताओं की मुलाकातों ने भी सपा की चिंता बढ़ाई है. स्वामी प्रसाद मौर्य, जो पहले बीजेपी और फिर सपा में रहे, ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ तस्वीर साझा की. जानकारी के मुताबिक, उन्होंने कांग्रेस से करीब दर्जन भर टिकट मांगे हैं और अपने बेटे उत्कर्ष मौर्य को भी चुनाव लड़ाने की इच्छा जताई है. महान दल के नेता संजय चौहान और अपना दल कमेरावादी से जुड़े पंकज निरंजन की भी राहुल गांधी से मुलाकात की चर्चा है. ये नेता 2022 में अखिलेश यादव के साथ थे, लेकिन इस बार कांग्रेस के करीब जाते दिख रहे हैं.
सपा का फोकस अब 2027 की 403 सीटों पर
ऐसे पूरे सियासी माहौल में सपा के तीसरे राज्यसभा उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारने का फैसला सिर्फ राज्यसभा की संख्या का मामला नहीं माना जा रहा. तीसरे उम्मीदवार के लिए समर्थन जुटाने की चुनौती, बीजेपी के अचानक बदले उम्मीदवार और कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे की खींचतान इन सभी के बीच अखिलेश यादव ने अपना फोकस 2027 के विधानसभा चुनाव पर कर दिया है. बीजेपी की ओर से राज्यसभा में पुराने चेहरों को हटाने के बाद अब उसके विधायकों के टिकट कटने की चर्चा भी तेज हो सकती है. वहीं कांग्रेस और सपा के बीच संबंध फिलहाल बने हुए हैं, लेकिन दोनों के बीच सीटों को लेकर खींचतान जारी है. ऐसे में राज्यसभा चुनाव के बाद 2027 की तैयारी में दोनों दलों की अगली चाल पर नजर रहेगी.
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