कौन हैं दारोगा प्रमोद यादव जिन्होंने पहलवान को हवा में उठा-उठाकर पटक दिया

यूपी तक

07 Oct 2026 (अपडेटेड: 07 Oct 2026, 01:42 PM)

प्रमोद यादव भदोही के दरोगा हैं जो 16 वर्षों से कुश्ती में गोल्ड मेडल जीत रहे हैं। वे वर्ल्ड पुलिस कुश्ती चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल भी जीत चुके हैं।

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गाजीपुर के बहादुरगंज से निकलकर उत्तर प्रदेश पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे प्रमोद यादव की कहानी सिर्फ एक सिपाही की नहीं बल्कि एक ऐसे जांबाज पहलवान की है जिसके लिए खाकी उसकी जिम्मेदारी है और अखाड़ा उसका जुनून. बचपन से ही खेल के प्रति बेपनाह लगन के दम पर महज दस साल की उम्र में खेल कोटे से UP पुलिस का हिस्सा बने प्रमोद आज भी अपनी फिटनेस और पहलवानी से हर किसी को हैरान कर देते हैं. वर्तमान में भदोही के कोईरोना थाने में तैनात प्रमोद ड्यूटी के बाद भी अखाड़े की चुनौती से पीछे नहीं हटते-मेले में हो रहे दंगल में उतरते हैं, खुली चुनौती स्वीकार करते हैं और अपने दांव-पेच से जीत हासिल कर सभी को चौंका देते हैं..

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16 सालों से गोल्ड पर कब्जा और वर्ल्ड चैंपियनशिप में लहराया परचम

प्रमोद यादव का कुश्ती का सफर असाधारण उपलब्धियों से भरा रहा है. वे लगातार 16 वर्षों से कुश्ती प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल अपने नाम करते आ रहे हैं. राष्ट्रीय चैंपियनशिप और जूनियर टीम के साथ कई बड़े मुकाबलों में अपनी पहचान बनाने वाले प्रमोद ने 'वर्ल्ड पुलिस कुश्ती चैंपियनशिप' में सिल्वर मेडल जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का नाम रोशन किया है. साल 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) के लिए भी उनका चयन हुआ था. हालांकि परिस्थितियों के चलते उन्हें खेलने का मौका नहीं मिल सका, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नवाजा 'गोरखपुर केसरी' सम्मान से

प्रमोद यादव की लंबी कर्मभूमि गोरखपुर रही, जहां उन्होंने आठ वर्षों तक पुलिस सेवा देने के साथ-साथ कुश्ती में भी अपना दबदबा बनाए रखा. अखाड़े में उनके शानदार प्रदर्शन और लगन को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें 'गोरखपुर केसरी' के सम्मान से सम्मानित किया था. इसके अलावा भदोही में तैनाती के दौरान भी वहां के तत्कालीन एसपी और वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके कुश्ती के हुनर और खेल भावना की जमकर सराहना की है.

ड्यूटी से लौटते ही मेले में जीता दंगल, युवाओं के लिए बने मिसाल

प्रमोद यादव के लिए कुश्ती सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि उनकी पहचान और जीवन का हिस्सा है. रविवार को जब वे अपनी ड्यूटी पूरी करके लौट रहे थे, तो रास्ते में एक मेले में हो रहा दंगल देखने रुके. वहां दी जा रही खुली चुनौती को स्वीकार करते हुए वे अखाड़े में उतरे और अपनी फुर्ती व दांव-पेच से विरोधी को पछाड़कर मुकाबला जीत लिया.