संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने सरकार को जमकर घेरा. उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे महिलाओं के साथ 'धोखा' करार दिया और मांग की कि आरक्षण का लाभ केवल खास वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर तबके तक पहुंचना चाहिए.
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'महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक लाभ की कोशिश'
इक्रा हसन ने आरोप लगाया कि सरकार 2023 में पास हो चुके महिला आरक्षण बिल को लागू करने में देरी कर रही है. उन्होंने कहा कि जनगणना और परिसीमन की आड़ में इस बिल को फँसाना केवल 2029 के चुनावों में 'शॉर्ट टर्म पॉलिटिकल माइलेज' लेने की कोशिश है. इक्रा ने सवाल उठाया कि जब 3 साल पहले सरकार कह रही थी कि बिना नई जनगणना के आरक्षण मुमकिन नहीं, तो अब अचानक पुराने आंकड़ों पर इसे लागू करने की तत्परता क्यों दिखाई जा रही है?
पुराने आंकड़ों और संवैधानिक ढांचे पर सवाल
सांसद ने सरकार की इस योजना को 'पॉलिटिकल अपॉर्चुनिज्म' बताया. उन्होंने कहा,
- पुराने आंकड़े: सरकार 2011 के आंकड़ों के आधार पर 2029 का प्रतिनिधित्व तय करना चाहती है, जो उस समय तक 18 साल पुराने हो जाएंगे.
- संवैधानिक उल्लंघन: उन्होंने आर्टिकल 81, 82 और 170 का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए ताकि 'एक व्यक्ति-एक वोट' के सिद्धांत का सम्मान हो.
- न्यायिक निगरानी का अभाव: परिसीमन आयोग को दी जा रही असीमित शक्तियों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि इसके फैसलों को कोर्ट में चुनौती न दे पाना लोकतंत्र के 'चेक एंड बैलेंस' सिस्टम के खिलाफ है.
- "महिलाएं कोई एक समान समूह नहीं हैं"
इक्रा हसन ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाएं कोई एक 'होमोजेनियस ग्रुप' (एक समान समूह) नहीं हैं. उनकी वास्तविकताएं उनकी जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि से तय होती हैं.
"पिछड़े वर्ग या अल्पसंख्यक परिवार की वह युवा महिला, जो पहली बार घर से बाहर निकलकर राजनीति का सपना देख रही है, बिना कोटा के इस व्यवस्था में कभी शामिल नहीं हो पाएगी."
उन्होंने दिवंगत नेताजी मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय और ओबीसी कोटे के बिना महिला आरक्षण का लाभ केवल सुविधा संपन्न वर्ग तक ही सीमित रह जाएगा.
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