देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में से एक आईआईटी बॉम्बे में छात्र साहिल की मौत का मामला गहराता जा रहा है. इस घटना ने न केवल संस्थान के भीतर बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी एक तीखी बहस को जन्म दे दिया है. साहिल की मौत के बाद छात्रों, फैकल्टी और राजनीतिक नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. जहां पीड़ित परिवार ने मानसिक उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोप लगाए हैं. वहीं आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे को दलित छात्रों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही से जोड़ते हुए संस्थान के रवैये पर कड़े सवाल खड़े किए हैं.
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संस्थान की शुरुआती सफाई और बाद में माफी से उठे गंभीर सवाल
घटना के सामने आने के बाद आईआईटी प्रशासन की शुरुआती सफाई और फिर बाद में मांगी गई माफी ने मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है. छात्र संघ और सामाजिक संगठनों का कहना है कि प्रशासन का यह रवैया जवाबदेही से बचने की कोशिश को दर्शाता है. छात्र संघ ने सिर्फ संबंधित प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं की है, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम में व्यापक सुधार की पुरजोर वकालत की है ताकि भविष्य में किसी अन्य छात्र को ऐसे मानसिक दबाव का सामना न करना पड़े.
चंद्रशेखर आजाद का हमला: 'क्या IIT सिर्फ डिग्रियां बांटेगा या छात्रों की भी सुनेगा?'
साहिल की मौत पर दुख जताते हुए चंद्रशेखर आजाद ने आईआईटी बॉम्बे के रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की है. उन्होंने दलित छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बड़ा सवाल यह है कि क्या आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान केवल डिग्रियां देने तक सीमित रहेंगे या वे वास्तव में अपने परिसर में छात्रों की समस्याओं और उनके साथ हो रहे भेदभाव को गंभीरता से लेंगे?
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