साल 2013 में हुए एक हादसे ने हरीश राणा के जीवन को हमेशा के लिए कोमा के अंधेरे में धकेल दिया था. 13 वर्षों तक बिस्तर पर बेसुध पड़े रहने के बाद आज उनका पार्थिव शरीर ग्रीन पार्क स्थित मुक्तिधाम लाया गया. गमगीन माहौल में उनका अंतिम संस्कार किया गया. परिवार और प्रियजनों की मौजूदगी में हरीश का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया.
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परिवार का अटूट धैर्य और कानूनी लड़ाई
हरीश के पिता और छोटे भाई आशीष सहित पूरे परिवार के लिए यह डेढ़ दशक का समय बेहद पीड़ादायक रहा. परिवार ने हरीश को ठीक करने के लिए चिकित्सा के हर संभव प्रयास किए, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. अंततः, परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. यह भारत का पहला ऐसा मामला बना जहाँ देश की शीर्ष अदालत ने इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसकी मंजूरी दी.
बीटेक छात्र से कोमा तक का सफर
हरीश राणा एक प्रतिभाशाली बीटेक छात्र थे. लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल कर रख दिया. उनकी कहानी न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह जीवन की अनिश्चितता और किसी भी मुश्किल घड़ी में परिवार की मजबूती का एक बड़ा उदाहरण पेश करती है. अंतिम विदाई के दौरान मुक्तिधाम में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं.
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