पूर्वांचल की सियासत में सत्ता का मतलब सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि रसूख, वर्चस्व और वजूद की लड़ाई होती है. इसी सियासी रणभूमि की सबसे चर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां है धनंजय सिंह और अभय सिंह की. ये दो वो नाम हैं, जो कभी दोस्ती की मिसाल हुआ करते थे, लेकिन आज एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं. 90 के दशक में छात्र राजनीति के उबलते दौर में धनंजय और अभय की जोड़ी पूर्वांचल में एक ताकतवर गठजोड़ बनकर उभरी थी. तब लोग कहते थे कि अगर एक खड़ा है, तो दूसरा उसकी ढाल बनकर पीछे मौजूद है. लेकिन वक्त बदला और महत्वाकांक्षाओं की जंग में यह अटूट भरोसा गहरी नफरत में तब्दील हो गया.
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इस दोस्ती में दरार की पहली आहट तब हुई जब एक हत्या के मामले में दोनों सह-अभियुक्त बने. शक के बीज बोए जा चुके थे और 2002 की उस काली रात ने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया. वाराणसी के टसाल सिनेमा के पास धनंजय सिंह के काफिले पर ताबड़तोड़ फायरिंग हुई. वह हमला सिर्फ धनंजय की जान लेने के लिए नहीं था, बल्कि एक पुराने रिश्ते के आखिरी टुकड़ों को भी छलनी करने वाला था. धनंजय सिंह ने सीधा आरोप लगाया कि यह उन्हें खत्म करने की साजिश थी और इसके पीछे कोई और नहीं, बल्कि उनके अपने ही दोस्त अभय सिंह थे. उस रात के बाद दोस्ती और भरोसे का अंत हो गया और शुरू हुई खूनी अदावत का एक लंबा सिलसिला.
आज 24 साल बाद, यह मामला वाराणसी की एमपी-एमएलए कोर्ट के दहलीज पर है. सालों तक चली गवाहियों और तारीखों के बाद अब फैसले की घड़ी करीब है, जहां अभय सिंह मुख्य आरोपी हैं. पूरे पूर्वांचल की नजरें इस पर टिकी हैं कि अदालत का फैसला क्या रुख अख्तियार करता है. यह कहानी सिर्फ दो बाहुबलियों की नहीं है, बल्कि विश्वासघात और सत्ता की उस अंधी दौड़ की है जहाँ 'हम साथ हैं' का नारा बदलकर 'या तो वो या तो मैं' पर खत्म होता है. देखना दिलचस्प होगा कि कानून का यह फैसला इस दुश्मनी को थामता है या फिर रंजिश की एक नई इबारत लिखता है.
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