एक दशक से ज्यादा का समय, एक ही बिस्तर और एक ही छत के नीचे अपनों की उम्मीदें. यह कहानी हरीश राणा की है, जिनका 13 साल लंबा संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया. दक्षिणी दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित मोक्ष धाम में जब हरीश को अंतिम विदाई दी गई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं. यह विदाई केवल एक अंत नहीं, बल्कि एक भाई के उस त्याग की परिकाष्ठा थी जिसने अपनी पूरी जवानी अपने बड़े भाई की सेवा में झोंक दी.
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अंतिम संस्कार के दौरान सबसे हृदयविदारक दृश्य हरीश के छोटे भाई आशीष राणा का था. आशीष, जो पिछले 13 वर्षों से साए की तरह अपने भाई के साथ थे, अंतिम विदाई के वक्त फूट-फूट कर रो पड़े. 2013 में जब हादसा हुआ, आशीष 12वीं में थे. तब से लेकर गुरुग्राम की कंपनी में नौकरी हासिल करने तक, आशीष का दिन भाई की सेवा से शुरू होता था. भाई का डायपर बदलने से लेकर साफ-सफाई और खिलाने-पिलाने तक के सारे काम निपटाकर ही आशीष कॉलेज या ऑफिस जाते थे. जिस भाई के साथ बचपन में लाड और तकरार हुई, उन्हीं को अपने हाथों से मुखाग्नि देना आशीष के लिए असहनीय था.
एक हादसे ने उजाड़ दी थीं खुशियां
हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के होनहार छात्र थे. साल 2013 में पीजी (PG) की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोटें आईं. इस हादसे ने एक फिट और हंसते-खेलते युवक को बिस्तर तक सीमित कर दिया. पिता अशोक राणा ने चंडीगढ़ PGI से लेकर दिल्ली AIIMS और कई निजी अस्पतालों में लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि दिमाग की नसें सूखने के कारण ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है.
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