जौनपुर स्थित वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय (VBSPU) से भ्रष्टाचार की एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज खबर सामने आई है. विश्वविद्यालय में छात्रों की पढ़ाई के नाम पर आवंटित किए गए करोड़ों रुपये के बजट में बड़ी बंदरबांट के आरोप लगे हैं. आरोप है कि छात्रों को आधुनिक शिक्षा देने के बहाने लगभग 50 करोड़ रुपये के संसाधनों की खरीद में भारी अनियमितताएं बरती गईं.
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करोड़ों के ई-जर्नल्स, पर छात्रों को एक्सेस नहीं
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा पहलू डिजिटल संसाधनों की खरीद से जुड़ा है. आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने लगभग 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ई-जर्नल्स खरीदने के लिए खर्च कर दी. विडंबना यह है कि इन ई-जर्नल्स का लाभ छात्रों को कभी मिला ही नहीं. तकनीकी रूप से छात्रों को इनका एक्सेस दिया जाना चाहिए था, लेकिन आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ कागजों पर ही सीमित रही.
हितों का टकराव: पिता-पुत्र की किताबें करोड़ों में खरीदीं
जांच में एक और चौंकाने वाला नाम प्रोफेसर मानस पांडे का सामने आया है. आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने और अपने पिता की लिखी हुई किताबों को करोड़ों रुपये की कीमत में विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के लिए मंगवाया. यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का मामला है, जहाँ निजी लाभ के लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल किया गया.
जाँच में अनियमितताएं पुख्ता, पर कार्रवाई 'शून्य'
यूनिवर्सिटी के इस घोटाले की जांच की गई और शुरुआती रिपोर्ट में कई बड़ी अनियमितताएं भी पाई गईं. लेकिन 5 साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता आरोप लगा रहे हैं कि प्रशासन मामले की 'लीपापोती' करने में जुटा है. आरटीआई (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों के भी स्पष्ट जवाब नहीं दिए जा रहे हैं.
छात्रों का आक्रोश: "हक की किताबों से हमें रखा वंचित"
विश्वविद्यालय के छात्रों में इस धांधली को लेकर भारी गुस्सा है. छात्रों का कहना है कि एक तरफ उनके सिलेबस की जरूरी किताबें लाइब्रेरी में उपलब्ध नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपये ऐसी किताबों और जर्नल्स पर फूंक दिए गए जिनका छात्रों की पढ़ाई से कोई सरोकार नहीं है.
प्रशासन का रुख: जांच का आश्वासन या टालमटोल?
इस पूरे मामले पर कुलपति का कहना है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सब कुछ स्पष्ट होगा. हालांकि, पांच सालों से चल रही 'अस्पष्ट जांच' प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर रही है.
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