उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारों के बीच एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है. यहां के एक सरकारी स्कूल में पिछले 60 सालों से बेटियों के दाखिले पर सिर्फ इसलिए पर्दा लगा हुआ है क्योंकि वहां उनके लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है.
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साइकिल पर टॉयलेट सीट और एक पिता का संघर्ष
कलवारी क्षेत्र के झिंकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज का यह मामला अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है. जब एक पिता अपनी बेटी का दाखिला कराने स्कूल पहुंचा, तो प्रबंधक ने शौचालय न होने का हवाला देकर एडमिशन से मना कर दिया. इस पर बेबस पिता ने हार नहीं मानी और साइकिल पर टॉयलेट सीट लादकर स्कूल पहुंच गया. उसने स्कूल को सीट दान करने की पेशकश की ताकि उसकी बेटी पढ़ सके, लेकिन प्रबंधक की हठधर्मी के आगे उस पिता का यह अनोखा संघर्ष भी हार गया.
प्राइवेट स्कूल के 'फायदे' के लिए बेटियों की बलि?
आरोप है कि स्कूल प्रबंधक अपने निजी स्कूल की मुनाफाखोरी को बढ़ाने के लिए इस सरकारी जमीन पर चलने वाले कॉलेज में लड़कियों का प्रवेश रोक रहे हैं. प्रबंधक का तर्क है कि कॉलेज में बाउंड्री वॉल और महिला शौचालय नहीं है, इसलिए लड़कियों को प्रवेश नहीं दिया जा सकता. वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गरीब लड़कियों को सरकारी शिक्षा से वंचित कर उन्हें महंगे प्राइवेट स्कूलों में भेजने की एक सोची-समझी साजिश है.
शिक्षा के अधिकार (RTE) की उड़ती धज्जियां
आधुनिक भारत में जहाँंमंगल तक पहुँचने की बातें होती हैं, वहाँ एक स्कूल में शौचालय की कमी बताकर 60 साल से लड़कियों को शिक्षा से दूर रखना 'शिक्षा के अधिकार' का खुला उल्लंघन है. प्रिंसिपल का कहना है कि प्रबंध समिति इस ओर ध्यान नहीं दे रही है, जबकि गरीब परिवार की बेटियां फीस न भर पाने के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं.
प्रशासन की नींद टूटी: जांच के आदेश
पिता के संघर्ष और टॉयलेट सीट गिफ्ट करने की तस्वीरें वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया है. अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच और कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है. अब देखना यह होगा कि क्या बस्ती की इन बेटियों को अपना हक मिलता है या फिर कागजी कार्रवाई के बीच एक पिता की उम्मीदें दम तोड़ देंगी.
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