दिल्ली में आयोजित विपक्षी 'इंडिया' ब्लॉक की बेहद अहम बैठक से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी ने देश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. अखिलेश यादव ने न सिर्फ खुद इस बैठक से दूरी बनाई बल्कि पार्टी के किसी भी शीर्ष चेहरे-रामगोपाल यादव, डिंपल यादव या धर्मेंद्र यादव को दिल्ली नहीं भेजा. इसके बजाय उन्होंने आज ही के दिन लखनऊ में प्रो. रामगोपाल यादव के राज्यसभा नामांकन का कार्यक्रम तय कर दिया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस एक कदम के जरिए अखिलेश यादव ने कांग्रेस हाईकमान को अपनी नाराजगी का साफ और कड़ा संदेश दे दिया है.
ADVERTISEMENT
जूनियर सांसदों को भेजकर अखिलेश ने दिखाई खुलकर नाराजगी
दिल्ली की बैठक में समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने के लिए अखिलेश यादव ने रामपुर से पहली बार के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और मुजफ्फरनगर के सांसद हरेंद्र मलिक को भेजा. चाहते तो अखिलेश खुद, रामगोपाल या धर्मेंद्र यादव बैठक में शामिल हो सकते थे. लेकिन उन्होंने जानबूझकर सिर्फ प्रतिनिधियों को भेजा.
बैठक से शीर्ष नेतृत्व का दूर रहना और सिर्फ जूनियर सांसदों को भेजना यह दिखाता है कि सपा इस समय कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के बड़े मंचों से एक दूरी बनाकर अपनी नाराजगी जाहिर करना चाहती है.
आखिर क्या है रामगोपाल यादव के नामांकन का 'टाइमिंग' गेम?
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 6 अक्टूबर तक है और समाजवादी पार्टी ने चार पर्चे खरीदे हैं. सपा को कुल तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारने हैं. लेकिन अभी तक बाकी दो प्रत्याशियों के नामों का ऐलान तक नहीं हुआ है. यदि अखिलेश चाहते तो तीनों उम्मीदवारों के नाम तय होने के बाद एक साथ नामांकन कराया जा सकता था.
लखनऊ में मौजूदगी का बहाना
आज ही के दिन सिर्फ अकेले प्रो. रामगोपाल यादव का नामांकन तय करने का मुख्य मकसद लखनऊ में अपनी मौजूदगी दिखाना था ताकि दिल्ली की बैठक में न जाने के लिए एक औपचारिक वजह सामने रखी जा सके.
कांग्रेस की बयानबाजी और दबाव की राजनीति से खफा हैं अखिलेश
अखिलेश यादव की इस कड़वाहट के पीछे कांग्रेस के प्रांतीय और केंद्रीय नेताओं की हालिया बयानबाजी को मुख्य वजह माना जा रहा है. कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के उस बयान से सपा बेहद असहज है जिसमें उन्होंने कहा था कि "कांग्रेस 150 से कम सीटों पर नहीं लड़ेगी और तैयारी 403 सीटों की है."
इमरान मसूद का अल्टीमेटम
सांसद इमरान मसूद लगातार यह बयान दे रहे हैं कि गठबंधन अक्टूबर में ही फाइनल होना चाहिए वरना कांग्रेस को नुकसान होगा और उत्तर प्रदेश में जीत का पूरा श्रेय राहुल गांधी के नेतृत्व को जाएगा. समाजवादी पार्टी चुनाव की घोषणा के आसपास ही सीट-शेयरिंग पर बात करना चाहती है और कांग्रेस के इस तरह जल्दबाजी में दबाव बनाने के पैंतरे को बिल्कुल भी पसंद नहीं कर रही है.
2017 का सबक और सीटों का समीकरण
सपा खेमे को लगता है कि संगठन और कार्यकर्ताओं के अभाव में कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर गठबंधन के प्रदर्शन को कमजोर कर देती है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 'दो लड़कों की जोड़ी' के तहत कांग्रेस को 105 सीटें दी गई थीं. लेकिन उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा और सपा को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था.
2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद अखिलेश यादव राज्य में ड्राइविंग सीट पर हैं. वे कांग्रेस के आगे झुकने या उसकी शर्तों पर सीटों का बंटवारा करने के कतई मूड में नहीं हैं.
ADVERTISEMENT










