उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन चुनावी तस्वीर को लेकर सियासी चर्चा तेज हो गई है. Matrize के ताजा सर्वे में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को एक बार फिर बढ़त मिलती दिख रही है.
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सर्वे में एनडीए और इंडिया गठबंधन के वोट शेयर का अंतर करीब उतना ही दिख रहा है, जितना 2022 के विधानसभा चुनाव में था. अब सवाल है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बदली तस्वीर के बाद क्या यूपी फिर उसी चुनावी पैटर्न की ओर लौट रहा है?
सर्वे में NDA को 44% वोट, इंडिया गठबंधन को 38%
Matrize के फाउंडर मनोज सिंह ने बताया कि सर्वे में उत्तर प्रदेश में एनडीए को करीब 44% वोट मिलने का अनुमान है, जबकि इंडिया गठबंधन को 38% वोट मिल सकते हैं. सितंबर में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक एनडीए को 245-265 सीटें, जबकि इंडिया गठबंधन को 135-155 सीटें मिलने का अनुमान बताया गया है.
हालांकि मनोज सिंह ने स्पष्ट किया कि सर्वे 31 अगस्त तक के फीडबैक पर आधारित है. इसके बाद यूपी की राजनीति में हुए घटनाक्रम और आगे चलने वाला चुनाव अभियान इन आंकड़ों को बदल सकता है.
2022 में बीजेपी को करीब 44% वोट मिले थे. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ राजभर समेत कुछ छोटे दल थे, जबकि कांग्रेस ने अलग चुनाव लड़ा था. अब 2027 के लिए सपा और कांग्रेस के साथ आने की संभावना है. इसके बावजूद सर्वे में बीजेपी गठबंधन का वोट शेयर 44% के आसपास ही दिख रहा है.
2024 का लोकसभा चुनाव विधानसभा में क्यों नहीं दोहर सकता?
मनोज सिंह के मुताबिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदाता का फैसला अलग-अलग आधार पर हो सकता है. लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे और प्रधानमंत्री के नेतृत्व जैसे कारक ज्यादा प्रभाव डालते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय समीकरण और राज्य की राजनीति ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.
उनका कहना है कि 2024 में बीजेपी को यूपी में नुकसान सिर्फ PDA के कारण नहीं हुआ था. बीजेपी के अपने कोर वोट में भी कुछ स्तर पर टूट हुई थी. क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन से बीजेपी को आम तौर पर कुछ अतिरिक्त वोट मिलते हैं और पार्टी उस आधार पर चुनावी बढ़त बना सकती है.
सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने वोट ट्रांसफर की चुनौती
मनोज सिंह के आकलन में सपा-कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती वोट ट्रांसफर की है. उनका तर्क है कि कांग्रेस का वोट हर विधानसभा सीट पर इतना मजबूत नहीं है कि वह सपा को बड़े स्तर पर अतिरिक्त सीटों का फायदा दिला सके.
उनके मुताबिक बड़ी संख्या में ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां कांग्रेस को 2% से ज्यादा वोट नहीं मिला. इसलिए मानना आसान नहीं है कि कांग्रेस का पूरा वोट समाजवादी पार्टी के पक्ष में चला जाएगा.
दूसरी तरफ सपा के पास यादव और मुस्लिम वोट का मजबूत आधार माना जा रहा है, लेकिन कुर्मी और कोरी जैसे ओबीसी समूहों में सपा को अभी वैसा समर्थन मिलता नहीं दिख रहा, जैसा 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को मिला था.
ब्राह्मण वोट पर भी बीजेपी और सपा की नजर
सर्वे पर बातचीत के दौरान ब्राह्मण वोट को लेकर भी सवाल उठा. मनोज सिंह का कहना है कि ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी की चर्चा पहले भी चुनावों के दौरान होती रही है, लेकिन इसका मतलब नहीं है कि पूरा ब्राह्मण वोट समाजवादी पार्टी की ओर चला जाएगा.
उनके मुताबिक अगर बीजेपी से ब्राह्मण मतदाता दूर होता है तो उसका रुख सीधे सपा की तरफ जाने के बजाय दूसरे विकल्पों की ओर भी हो सकता है. उन्होंने कहा कि बीजेपी के लिए यूजीसी से जुड़े मुद्दे का असर ग्रामीण इलाकों के उन परिवारों में दिख सकता है, जिनके बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं.
दलित वोट सपा के लिए अब भी बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में दलित वोट को लेकर भी मनोज सिंह ने सपा के सामने चुनौती बताई. उनका कहना है कि सपा को दलित वोट सीधे मिलने की बजाय कांग्रेस के जरिए उसका फायदा मिल सकता है, लेकिन इसके लिए कांग्रेस को विधानसभा स्तर पर दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की ठोस रणनीति बनानी होगी.
उनके मुताबिक ग्रामीण इलाकों में कुछ दलित मतदाताओं के बीच सपा को लेकर अभी भी भरोसे की कमी है, इसलिए सिर्फ किसी एक मुद्दे के आधार पर मान लेना सही नहीं होगा कि बीजेपी का वोट बड़े पैमाने पर सपा की तरफ चला जाएगा.
अभी चुनावी तस्वीर अंतिम नहीं
मनोज सिंह ने माना कि सर्वे के आंकड़े अंतिम नतीजे नहीं हैं. उनका सर्वे 31 अगस्त तक के फीडबैक पर आधारित है. इसके बाद बीजेपी और समाजवादी पार्टी का चुनाव अभियान किस दिशा में जाता है, इसका असर आगे के आंकड़ों पर पड़ सकता है.
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