पापा यहां बहुत धुआं है मैं क्या करूं... लखनऊ अग्निकांड के बीच अंदर फंसे शहजान ने पिता से की थी ये आखिरी बात, सुनकर रो देंगे

Mohammad Shahzan Emotional Story: लखनऊ अग्निकांड में जानकीपुरम के मोहम्मद शहजान और बालागंज के अब्दुल रहमान की मौत से परिवार टूटे. बायोमेट्रिक लॉक और बंद छत के कारण दम घुटने से हुई मौत, परिजनों ने लगाए गंभीर आरोप.

Mohammad Shahzan Emotional Story

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आशीष श्रीवास्तव

24 Jun 2026 (अपडेटेड: 24 Jun 2026, 07:49 PM)

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Mohammad Shahzan Emotional Story: लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत हो चुकी है. जानकीपुरम के रहने वाले 18 साल के मोहम्मद शहजान की मौत ने उनके पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है. शहजान अपने माता-पिता की इकलौती संतान और तीन बहनों के इकलौते भाई थे. हाल ही में डिप्लोमा पूरा कर ट्रेनिंग शुरू करने वाले शहजान ही परिवार के इकलौते कमाने वाले थे. हादसे के वक्त उन्होंने अपने पिता को फोन कर मदद की गुहार लगाई थी. लेकिन इस हादसे में उनकी दर्दनाक मौत हो गई. 

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रुमाल बांधकर मौत से लड़ता रहा शहजान

शहजान के पिता ने रोते हुए उस खौफनाक मंजर को याद किया जब बेटे का आखिरी फोन आया था. शहजान ने घबराते हुए कहा था 'पापा, यहां बहुत ज्यादा धुआं हो गया है, मैं क्या करूं? कुछ दिख नहीं रहा.' पिता ने ढांढस बंधाते हुए उसे मुंह पर रुमाल बांधने और बाथरूम की तरफ जाने की सलाह दी. पिता और परिजन मात्र 10 मिनट में मौके पर पहुंच गए. लेकिन इमारत के आगे लगी भीषण आग और धुएं ने रास्ता रोक रखा था. पिता अस्पताल में जब शहजान के शव से मिले तो उसके मुंह पर वही रुमाल बंधा हुआ था. दम घुटने के कारण शहजान हमेशा के लिए सो चुका था.

बायोमेट्रिक लॉक और बंद छत बनी काल

परिजनों और चश्मदीदों का आरोप है कि जिस थ्री-डी ऑफिस में बच्चे काम और ट्रेनिंग कर रहे थे वहां सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ हो रहा था. ऑफिस का दरवाजा या तो फिंगरप्रिंट (बायोमेट्रिक) से खुलता था या कार्ड से. बिजली कटने और गैस फैलने के बाद वह लॉक हो गया. इतना ही नहीं तीसरी मंजिल से छत पर जाने वाले रास्ते पर तीन-तीन ताले लटके हुए थे. अगर छत का दरवाजा खुला होता तो बच्चे ऊपर भागकर अपनी जान बचा सकते थे.

2 घंटे बाद पहुंची NDRF, कटर की जगह हथौड़े का इस्तेमाल

परिजनों ने फायर ब्रिगेड और एनडीआरएफ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि फायर कर्मी सिर्फ सामने से पानी डाल रहे थे. जबकि धुएं को बाहर निकालने के लिए किसी वैक्यूम या एग्जॉस्ट तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया. हादसे के ढाई घंटे बाद NDRF की टीम मौके पर पहुंची. आधुनिक कटर मशीनों के दौर में भी टीम हथौड़ों से दीवार तोड़ रही थी. अगर समय रहते कटर से दीवार काट दी जाती या पीछे का दरवाजा तोड़ दिया जाता, तो बच्चों को सुरक्षित निकाला जा सकता था.

अब्दुल रहमान के घर भी पसरा मातम, 3 महीने पहले ही हुई थी शादी

इसी अग्निकांड का एक और शिकार बालागंज के आरिया निवासी अब्दुल रहमान हुए. अब्दुल भी अपने घर के इकलौते कमाने वाले थे. उनके पिता पैरालिसिस से पीड़ित हैं और मां किडनी स्टोन व बीपी की मरीज हैं. महज तीन महीने पहले ही अब्दुल की शादी हुई थी. अब्दुल की आदत थी कि वह दोपहर में खाना खाने से पहले अपनी मां को फोन करते थे. हादसे वाले दिन भी उन्होंने मां को फोन कर कहा 'अम्मा, खाना खा लिया है और अब नमाज पढ़ने जा रहा हूं.' नमाज पढ़कर लौटने के कुछ ही देर बाद यह हादसा हो गया. शाम को जब सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर आई तब परिवार को इस हादसे का पता चला.

मुआवजा नहीं इंसाफ और सरकारी नौकरी की मांग

पीड़ित परिवारों का साफ कहना है कि सरकार द्वारा घोषित 5 या 7 लाख रुपये का मुआवजा उनके बच्चों का विकल्प नहीं हो सकता. शहजान और अब्दुल के माता-पिता बूढ़े और लाचार हैं. परिवारों ने मांग की है कि इस अवैध और असुरक्षित बिल्डिंग को एनओसी देने वाले अधिकारियों और मालिक पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो. भविष्य में ऐसी कोचिंग या ऑफिसों में अनिवार्य रूप से इमरजेंसी एग्जिट  सुनिश्चित की जाए. पीड़ित परिवार की पढ़ी-लिखी बेटियों को सरकारी नौकरी दी जाए ताकि उनका बुढ़ापा सुरक्षित हो सके.