यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) के नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में मचे सियासी घमासान के बीच कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर विस्तार से एक पोस्ट किया है. दिग्विजय सिंह ने सिलसिलेवार ढंग से उन पॉइंट्स को सामने रखा है, जो इस विवाद की वजह बन गए हैं. उन्होंने अपने पोस्ट में दावा किया है कि कैसे संसदीय समिति की सिफारिशों की अनदेखी की गई और किन फैसलों ने जनरल कैटेगरी और आरक्षित वर्ग के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है.
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पायल तड़वी और रोहित वेमुला का केस है इन नियमों का बैकग्राउंड
दिग्विजय सिंह ने पोस्ट की शुरुआत इन नियमों के बनने की पृष्ठभूमि से की है. उन्होंने बताया कि पायल तड़वी और रोहित वेमुला जैसे छात्रों के साथ हुई घटनाओं और उनकी माताओं के लंबे संघर्ष के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद मोदी सरकार और यूजीसी हरकत में आए थे. इसके चलते फरवरी 2025 में 'UGC इक्विटी रेगुलेशन' का ड्राफ्ट तैयार किया गया था.
नियमों को मजबूत बनाने के लिए समिति ने दी थीं जरूरी सिफारिशें
दिसंबर 2025 में शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने विस्तार से एक रिपोर्ट जारी की थी. इस समिति ने सर्वसम्मति से यूजीसी के ड्राफ्ट नियमों की समीक्षा की और इन्हें और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए कुछ अहम सिफारिशें दी थीं. दिग्विजय सिंह ने उन 5 प्रमुख सिफारिशों (A से E) का जिक्र किया है:
1. OBC वर्ग को शामिल करना (सिफारिश A): समिति ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 15(5) के तहत ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसलिए जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए.
2. दिव्यांगता (सिफारिश B): भेदभाव के एक प्रमुख आधार के रूप में दिव्यांगता को भी इन नियमों में स्पष्ट रूप से जगह दी जानी चाहिए.
3. इक्विटी कमेटी का गठन और प्रतिनिधित्व (सिफारिश C): ड्राफ्ट नियमों में 10 सदस्यों की इक्विटी कमेटी का प्रावधान था, जिसमें केवल एक अनिवार्य महिला सदस्य और एससी/एसटी समुदाय से एक-एक सदस्य की बात कही गई थी. समिति ने सिफारिश की कि इसे बढ़ाकर 50% किया जाना चाहिए (एससी, एसटी और ओबीसी के लिए तय आरक्षण के अनुसार) ताकि निर्णय प्रक्रिया प्रभावी और निष्पक्ष हो सके.
4. भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा (सिफारिश D): समिति ने सुझाव दिया था कि 2012 के नियमों की तरह ही नए नियमों में भी उन घटनाओं या व्यवहारों की एक विस्तृत सूची होनी चाहिए जिन्हें भेदभाव माना जाएगा. इसके बिना, यह पूरी तरह संस्थान के विवेक पर निर्भर होगा कि वह किसी शिकायत को सही मानता है या गलत.
5. सार्वजनिक प्रकटीकरण और मानसिक स्वास्थ्य (सिफारिश E): नियमों में यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि उच्च शिक्षा संस्थान हर साल जातिगत भेदभाव के मामलों का सार्वजनिक खुलासा करें, फैकल्टी के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम चलाएं और छात्रों को कानूनी व मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करें.
यूजीसी ने क्या माना और क्या ठुकराया?
दिग्विजय सिंह ने पोस्ट में दावा किया है कि जनवरी 2026 में जब यूजीसी ने अंतिम नियम जारी किए तो उसने संसदीय समिति की कुछ सिफारिशों को तो मान लिया लेकिन कुछ को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया.
यूजीसी ने ओबीसी, दिव्यांगता और सार्वजनिक प्रकटीकरण (सिफारिश A, B और E) से जुड़ी बातों को तो स्वीकार कर लिया, लेकिन सिफारिश C (कमेटी में 50% प्रतिनिधित्व) और सिफारिश D (भेदभाव की विस्तृत सूची) को ठुकरा दिया. सांसद ने स्पष्ट किया कि भेदभाव की घटनाओं की सूची न बनाना ही भविष्य में नियमों के दुरुपयोग का कारण बन सकता है.
झूठी शिकायत और सजा का प्रावधान यूजीसी का अपना फैसला: सिंह
इस विवाद का सबसे बड़ा पॉइंट झूठी शिकायत पर मिलने वाली सजा से जुड़ा है. दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि ड्राफ्ट नियमों में एक अलग प्रावधान था जो छात्रों को भेदभाव के झूठे मामले दर्ज करने के लिए दंडित करता था. लेकिन यूजीसी ने अपने अंतिम नियमों में इस सजा वाले प्रावधान को हटा दिया. दिग्विजय सिंह के अनुसार, यूजीसी ने यह कदम अपने विवेक से उठाया है इसका संसदीय समिति की सिफारिशों से कोई लेना-देना नहीं था.
क्या हैं सामान्य वर्ग के विरोध के दो मुख्य कारण?
दिग्विजय सिंह ने अपनी पोस्ट में उन कारणों का भी विश्लेषण किया है जिसकी वजह से सामान्य वर्ग के छात्र सड़कों पर हैं. उनके अनुसार विरोध के दो मुख्य केंद्र हैं:
1. झूठी शिकायतों का डर
सामान्य वर्ग के छात्रों और फैकल्टी का मानना है कि झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान हटने से उनके खिलाफ फर्जी मामले दर्ज हो सकते हैं. दिग्विजय सिंह ने फिर दोहराया कि इसे हटाने का निर्णय अकेले यूजीसी का था.
2. श्रेणियों का बंटवारा
नियमों में केवल एससी, एसटी और ओबीसी को ही भेदभाव झेलने वाली श्रेणियों में रखा गया है. सामान्य वर्ग के छात्रों का तर्क है कि उन्हें बाहर रखकर यूजीसी यह संदेश दे रहा है कि केवल वही जातिगत भेदभाव करते हैं. दिग्विजय सिंह ने बताया कि सामान्य वर्ग को इस सूची में शामिल न करने का फैसला भी यूजीसी का ही था. संसदीय समिति ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की थी.
'अब इस मुद्दे का समाधान यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय के हाथ में'
कांग्रेस सांसद ने अपनी पोस्ट के अंत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होंने लिखा कि अगर यूजीसी भेदभाव के कृत्यों और उदाहरणों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर देता (जैसा कि संसदीय समिति ने सिफारिश D में कहा था) तो इससे न केवल आरक्षित वर्ग के छात्रों की सुरक्षा मजबूत होती बल्कि नियमों के दुरुपयोग और फर्जी मामलों की संभावना भी खत्म हो जाती. सिंह ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, "अब इस मुद्दे का समाधान करना पूरी तरह से यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय के हाथ में है."
यूजीसी के जिन नए नियमों पर हुआ बवाल उसकी क्रोनोलॉजी समझिए
1. नियमों की जरूरत रोहित वेमुला (2016 में आत्महत्या) और पायल तड़वी (2019 में मौत) जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों से पड़ी. जहां जातिगत भेदभाव का आरोप था. 2019 में इन छात्रों की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की जिसमें 2012 के UGC नियमों को अपर्याप्त बताकर मजबूत तंत्र की मांग की गई. जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को मजबूत तंत्र बनाने का निर्देश दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और स्टेकहोल्डर्स को सुझाव देने की छूट दी थी.
2. UGC ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फरवरी 2025 में 'University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2025' का ड्राफ्ट जारी किया. यह पब्लिक फीडबैक के लिए था. ड्राफ्ट में मुख्य रूप से SC/ST छात्रों पर फोकस था. फर्जी शिकायतों पर सजा का प्रावधान था. और OBC को शामिल नहीं किया गया था. अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को ड्राफ्ट फाइनलाइज करने की अनुमति दी.
मुख्य विशेषताएं: भेदभाव की परिभाषा, शिकायत निपटाने के लिए कमिटी, लेकिन बैलेंस्ड अप्रोच (जैसे फर्जी शिकायतों पर सजा).
3. ड्राफ्ट को संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Education, Women, Children, Youth and Sports) के सामने पेश किया गया जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने की. समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा की, बैठकें कीं, और सर्वसम्मति से सुझाव दिए. समिति ने OBC छात्रों को जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल करने, विकलांगता को आधार बनाने, इक्विटी कमिटी में SC/ST/OBC सदस्यों की संख्या बढ़ाने (कम से कम 50%), भेदभाव के स्पष्ट उदाहरण देने, वार्षिक रिपोर्ट, संवेदनशीलता ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की.
4. 8 दिसंबर 2025 को समिति की रिपोर्ट संसद में पेश की गई. रिपोर्ट में ड्राफ्ट को मजबूत बनाने के 5 मुख्य सुझाव थे: (A) OBC को शामिल करना, (B) विकलांगता को आधार बनाना, (C) कमिटी में SC/ST/OBC की 50% भागीदारी, (D) भेदभाव के स्पष्ट उदाहरण/परिभाषाएं, (E) रिपोर्टिंग, ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता. समिति ने फर्जी शिकायतों पर सजा हटाने की सिफारिश नहीं की थी.
5. UGC ने 13 जनवरी 2026 को अंतिम नियम अधिसूचित किए. इनमें समिति के सुझाव A, B और E को माना गया (OBC और विकलांगता शामिल, रिपोर्ट/ट्रेनिंग अनिवार्य). लेकिन C (कमिटी में प्रतिनिधित्व) और D (स्पष्ट परिभाषाएं) को ठुकरा दिया. UGC ने खुद फर्जी शिकायतों पर सजा का प्रावधान हटा दिया, जो ड्राफ्ट में था लेकिन समिति ने नहीं कहा था. नियमों में अब इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमिटी, 24x7 हेल्पलाइन, इक्विटी स्क्वाड आदि अनिवार्य हैं.
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