Opinion: डीजे की धुन, बाइक का काफिला और सोशल मीडिया की रील्स के बीच कांवड़ यात्रा का बदलता स्वरूप, क्या यही है नई पीढ़ी की शिवभक्ति?
कांवड़ यात्रा आज एक नए कलेवर में हमारे सामने है. परंपराएं वही हैं, हरिद्वार, गोमुख और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर शिवालयों में अर्पित करना और निभाया भी वही जा रहा है, लेकिन परिदृश्य बदला है.
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Opinion: कांवड़ यात्रा आज एक नए कलेवर में हमारे सामने है. परंपराएं वही हैं, हरिद्वार, गोमुख और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर शिवालयों में अर्पित करना और निभाया भी वही जा रहा है, लेकिन परिदृश्य बदला है. डीजे की धुन पर थिरकते युवा, हाईटेक सजावट से लदी कांवड़ें, बाइकों के काफिले और मोबाइल कैमरों में कैद होते पल प्रति पल. यह नया परिदृश्य है. इसे देखकर कुछ लोग यात्रा के नए स्वरूप पर सवाल उठाते हैं. उन्हें यह ठीक नहीं लगता, लेकिन क्या वाकई उनकी आपत्ति सही है? गहराई से देखें तो यह आस्था की अभिव्यक्ति का ऐसा कायाकल्प है जो वर्तमान पीढ़ी को आस्था से जोड़कर कांवड़ यात्रा की नई तस्वीर हमारे सामने रखता है. शिव महादेव इसलिए है क्योंकि वे समय के हर रूप को आत्मसात करते हैं. वे आदियोगी भी हैं और नटराज भी. संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी. जिस देवता का स्वभाव ही परिवर्तनशीलता और सर्वव्यापकता है, उसकी भक्ति का स्वरूप भी हर युग में बदलता रहा है. वैदिक काल में रुद्र की उपासना जिस रूप में होती थी, वह भक्ति काल में शिव भजनों और कीर्तनों में बदल गई. आज इक्कीसवीं सदी में जब डिजिटल तकनीक हमारे जीवन के हर कोने में प्रवेश कर चुकी है, तो भक्ति की अभिव्यक्ति भी उसी माध्यम से हो रही है, जो इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है. डीजे की धुन पर ‘बम भोले’ के जयकारे लगाना दरअसल उसी उल्लास और समर्पण का विस्तार है, जो पहले ढोल-मंजीरों और लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त होता था.
