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5 से 15 सेकेंड में UP-SI का पेपर सॉल्व करने वाले कैंडिडेट पर हुई थी FIR, जेल से लौटने के बाद बनेंगे दरोगा?

यूपी पुलिस SI भर्ती 2020-21 में बड़ा मोड़ आया है. हाईकोर्ट के फैसले के बाद भर्ती बोर्ड ने विवादित अभ्यर्थियों की प्रक्रिया शुरू करने का नोटिस जारी किया. आखिर किस आधार पर लगा था नकल का शक और अब आगे क्या होगा?

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UP Police SI Recruitment Case
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने यूपी पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती 2020-21 के विवादित मामलों में बड़ा कदम उठाया है. कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि केवल संदेह के आधार पर किसी अभ्यर्थी का करियर बर्बाद नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा सरकार की अपील खारिज किए जाने के बाद, भर्ती बोर्ड ने सरेंडर करते हुए इन अभ्यर्थियों की डीवी-पीएसटी प्रक्रिया शुरू करने का आधिकारिक नोटिस जारी कर दिया है.
 

क्या था पूरा विवाद और सीआरएल (CRL) रिपोर्ट?

यह मामला साल 2020-21 में आई 9534 पदों की दरोगा भर्ती परीक्षा के लिखित परीक्षा (CBT), डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और PST चरण पास कर चुके अभ्यर्थियों से जुड़ा है. अंतिम चरण यानी फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट (PET) से ठीक पहले परीक्षा एजेंसी की कैंडिडेट रिस्पांस लॉग (CRL) रिपोर्ट निकाली गई जिसमें छात्र के परीक्षा देते समय की हर सेकंड की गतिविधि दर्ज होती है.

भर्ती बोर्ड के अनुसार, कई अभ्यर्थियों ने गणित और सामान्य ज्ञान के कठिन सवाल महज 5 से 15 सेकंड में हल कर लिए थे. बोर्ड ने इसे अनयूजुअल मानकर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से नकल का शक जताया जिसके बाद धड़ाधड़ एफआईआर दर्ज हुईं, गिरफ्तारियां हुईं और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़े फर्जीवाड़े का दावा किया गया.

अदालती लड़ाई और फैसलों का सफर

न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की अदालत ने सरकार और भर्ती बोर्ड की कार्रवाई को गलत ठहराते हुए कहा कि कानून में 'कितना भी मजबूत संदेह, सबूत की जगह नहीं ले सकता.' कोर्ट ने यह भी तर्क दिया कि परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग न होने के कारण रैंडम गेस (तुक्का) या अच्छी तैयारी संभव है. कोर्ट ने 3 महीने के भीतर इनकी प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया था.

सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ सरकार खंडपीठ में गई जहां न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरुपमा चतुर्वेदी की डिवीजन बेंच ने अपील खारिज कर दी. कोर्ट ने दोहराया कि बिना पुख्ता सबूत के केवल टाइमिंग चार्ट के आधार पर अभ्यर्थियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

अब आगे क्या और उठ रहे सवाल?

हाईकोर्ट के इस फैसले को आए हुए एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है. एक तरफ जहां इस बात की सराहना हो रही है कि शक के आधार पर रोके गए योग्य अभ्यर्थियों को न्याय का अवसर मिलेगा. वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ रहा है कि हर मामले को अदालतों में चुनौती देने वाली सरकार इस बार सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों नहीं कर रही है.

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